1857 सोना खान (लेखक आशीष सिंह ठाकुर) छत्तीसगढ़ की अस्मिता और स्वतंत्रता संग्राम का अमर दस्तावेज- डुमन लाल ध्रुव
राष्ट्र में छत्तीसगढ़ की अस्मिता अखंड है, छत्तीसगढ़ का यह अस्तित्व-बोध हमारे लिए अमृत है। इस भाव को मूर्त रूप देती है लेखक श्री आशीष सिंह ठाकुर की ऐतिहासिक और शोधपरक कृति “1857 सोना खान” जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम अध्याय में छत्तीसगढ़ की भूमिका को रेखांकित करती है। यह कृति “आजादी के अमृत महोत्सव” के अवसर पर स्वतंत्रता, स्वाभिमान और शहीदों की गाथा को नए संदर्भों में प्रस्तुत करती है।
“1857 सोना खान” न केवल एक ऐतिहासिक दस्तावेज है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता सेनानियों की वीरगाथा का जीवंत स्वर है। कृति में नारायण सिंह, वीर सुरेंद्र साय और हनुमान सिंह जैसे क्रांतिकारियों के योगदान को स्वर्ण अक्षरों से अंकित करने का प्रयास किया गया है जो प्रायः भारतीय इतिहास की मुख्यधारा में उपेक्षित रहे हैं।
यह पुस्तक 1857 की क्रांति की स्थानीय स्वरूप को सामने लाती है, जहां सोना खान, सरगुजा, कोंडागांव, सारंगढ़, रायगढ़, रायपुर से लेकर बस्तर तक क्रांति की चिंगारियां धधक रही थीं।
इस कृति में जमींदार नारायण सिंह का चित्रण विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिन्होंने ब्रिटिश अत्याचार और कर वसूली के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूंका। उनकी फांसी केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं थी, बल्कि वह छत्तीसगढ़ी अस्मिता के लिए पहला सार्वजनिक बलिदान बन गई।
नारायण सिंह की शहादत को लेखक ने केवल ऐतिहासिक संदर्भों में नहीं, बल्कि एक लोकगाथा और प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत किया है।
संबलपुर के वीर सुरेंद्र साय जो ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध निरंतर संघर्षरत रहे, उन्हें लेखक ने छत्तीसगढ़ के सीमांत क्रांतिकारी के रूप में शामिल किया है, जो समूचे पूर्वी भारत में विद्रोह की लौ को प्रज्ज्वलित किए हुए थे।
बस्तर, जो अपनी विशिष्ट आदिवासी संस्कृति और आत्मबलिदान के लिए प्रसिद्ध है। वहां की भूमिगत चेतना और प्रतिरोध की रणनीतियां भी पुस्तक में उल्लिखित हैं।
लेखक श्री आशीष सिंह ठाकुर ने हनुमान सिंह जैसे गुमनाम नायकों को भी इतिहास के पटल पर उचित स्थान दिया है। ग्राम्य स्तर पर हुए संगठित विद्रोह, पैदल सेनाओं, परंपरागत अस्त्रों, और लोकशक्ति के आधार पर लड़ी गई लड़ाई को लेखक ने अत्यंत संजीदगी से अभिव्यक्त किया है।
“1857 सोना खान” केवल एक इतिहास पुस्तक नहीं है। यह वर्णनात्मक, भावनात्मक और विचारधारा प्रधान भाषा शैली में रची गई ऐसी कृति है जिसमें छत्तीसगढ़ की मिट्टी, वीरता और आत्मगौरव की महक है। लेखक की साहित्यिक दृष्टि और ऐतिहासिक प्रमाणिकता पुस्तक को अत्यंत पठनीय बनाती है। उदाहरण के लिए, लेखक श्री आशीष सिंह ठाकुर ने जब सोना खान की भूमि को “शहीदों की धरती” कहकर संबोधित करते हैं, तब वह केवल एक स्थान का उल्लेख नहीं करते, बल्कि एक मूल्य और चेतना के केंद्र की स्थापना करते हैं।
वहीं लेखक श्री आशीष सिंह ठाकुर ने इस कृति को ‘आजादी के अमृत महोत्सव’ को समर्पित कर यह स्पष्ट कर दिया है कि यह सिर्फ अतीत का लेखा नहीं, बल्कि भविष्य के लिए प्रेरणा है। यह पुस्तक आज की पीढ़ी को यह संदेश देती है कि स्वतंत्रता केवल राजनैतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, भाषाई और सामाजिक अस्मिता की रक्षा का संकल्प भी है।
कृति 1857 सोना खान छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक अस्मिता, वीरता और आत्मगौरव का घोषपत्र है। लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि छत्तीसगढ़ केवल खनिज, जंगल और पर्वत की भूमि नहीं, यह शहीदों की कर्मभूमि है, जिसने आज़ादी के संघर्ष में अपनी अमूल्य आहुति दी।
“1857 सोना खान” एक ऐसी ऐतिहासिक साहित्यिक कृति है जो छत्तीसगढ़ के आत्मबोध, बलिदान और स्वाभिमान की अमिट गाथा कहती है।
लेखक आशीष सिंह ठाकुर ने इस कृति के माध्यम से छत्तीसगढ़ को न केवल भारत के स्वतंत्रता संग्राम की परिधि में लाया है, बल्कि उसे केंद्र में स्थापित किया है। यह पुस्तक हर उस पाठक के लिए अनिवार्य है जो जानना चाहता है कि भारत के महान स्वतंत्रता संग्राम में छत्तीसगढ़ की क्या भूमिका रही, और क्यों सोना खान की वीरता आज भी अमर है।
– डुमन लाल ध्रुव
मुजगहन धमतरी (छ.ग.)
पिन – 493773
मोबाइल -9424210208





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