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आज के दौर की कविताएं-पिनाक वीरेन्द्र कुमार पटेल

आज के दौर की कविताएं-पिनाक वीरेन्द्र कुमार पटेल

आज के दौर की कविताएं

आज के दौर की कविताएं

-पिनाक वीरेन्द्र कुमार पटेल

आज के दौर की कविताएं-पिनाक वीरेन्द्र कुमार पटेल
आज के दौर की कविताएं-पिनाक वीरेन्द्र कुमार पटेल

1. भूख

कहीं पेट की किसी कोने में
बैठा रहा करता है
यह भूख
निगल जानें को
सारे भोजन को पचाने में
और गलाने में
सहसा तड़पती हुई
पेट की ज्वार अग्नि
कहती हैं
मरे हुए मस्तिष्क से
की अब कुछ तो डाल
नहीं तो
रहा न जाएगा
इस भूख से मारा जाऊंगा।
सारी दुनिया को
जरा हटके देखा की
एक बार की भूख
सही नहीं जाती
वे कैसे जीवित होंगे
जो हमेशा भूखे पेट
जिन्दगी गुजारा करते हैं
और
एक रोटी की तलाश में
घर घर जाकर भीख मांगा करते हैं
जरा पेट को रहम न आया
की अंतिम यात्रा तक
बनी रहती है ये भूख
न जाने कब खत्म होगी
लोगों की यह भूख।।

2.कभी घर बना लिया होता

अरे!
कभी घर बना लिया होता,
जिन्दगी में किसी को
हमसफ़र बना लिया होता,
किसी के दिल में जगह बना लिया होता,
अमीरी -गरीबी के फासले मिटा दिया होता,
मेरे भारत वर्ष को स्वर्ग बना दिया होता,
ज़मीन पर चल के देखों
पानी में लड़ा न होता,
बड़े पैमाने में धरती पर बारूद न बिछाते,
आज जहां पर कीटाणु, विषाणु और अणु न होते,
जो मानव मनुष्यता न भूली होती,
तो प्रकृति विकराल रूप न लेती
अगर बनाना चाहते हो तो इंसानियत जिंदा रखों दिलों में
किसी के लिए घर बना लिया होता…

3.नया जमाना आया है

एक मां कह रही है
अपने बच्चे से की तुम जल्दी उठा सोया करो,
नित्य योगासन प्राणायाम किया करो
मोबाईल मे ज्यादा न लगे रहो,
पुस्तकों भी थोड़ा खोला करो,
खाना पीना समय में कर लो,
अपनों की बीच भी बैठा करो,
बड़ों को आदर सम्मान दिया करो।
अब बच्चा मां से कहने लगा
ये नया जमाना आया है
जो तुम कह रही हो,
अब ना ऐसा जिया जायेगा,
समय न सोया ना उठा जाएगा,
क्योंकी बिना मोबाईल के ना रहा जाएग

4.क्रमिक विकास 

जिक्र नहीं है
फिक्र नहीं है
कवायद तेज हो गई
मुवाइजे लेश हो गई
खो गई परिणीती और
खो गई इंसानियत
बची की बची रह गई
एक क्रमिक विकास।
विकास यात्रा
पर शव यात्रा
दफ़न हैं लोगों का वजूद
और
बची रह गई है
राजनीतिक पापड़ बेलने को
कवायत होना चाहिए
इंसानियत जिंदा रहे।।
मुझे सफ़र करना है
लम्बा
लेकिन कोई कार्रवाई चाहिए
सिफारिस नहीं
सुनवाई चाहिए
गुजरे ज़माने के
गड़े मुर्दे उखड़ना
छोड़ दो
नहीं तो सब मुर्दे हो जायेंगे।।
विकास रैली में
शामिल वहीं लोग
होते है जिन्होंने
अपने होने या ना होने का कोई
गम नहीं
चाहें पढ़ा लिखा हो
या अनपढ़ या अंगूठा छाप
छोड़ दो
पहले लिस्ट में शामिल वे नहीं
गरीब शामिल हुए करते थे
आज अमीरों की बारी है
क्रमिक विकास फ़िर
क्रमिक विकास…

5.चौराहे पर

दस्तक दे चुका है
जीवन में
हार और जीत दर्ज कर
भागम भाग भरी जिन्दगी
में आखरी सांस तक
बैचेन कर देती हैं
और
सन्नाटे लाकर खड़ा कर देती
हर चौराहे पर
एक व्यक्ति सुरक्षा घेरा बना
खड़ा रहता है
और
रुक जानें को कह रहा
फिर भी
अनजान पथ में लोग
भागते हुए
सहसा टकरा जाते हैं
हर चौराहे पर
सभ्यता संस्कृति को छोड़
अपनी नई दुनिया
बुन लिए
खड़े हो गए
पथ पर अग्रसर
मानव से दानव
इंसानियत से हैवानियत
कर्म से कुकर्म
के भागी बन गई
चौराहे पर
इस पथ पर अग्रसर हो
आज सारे चौराहे पर खड़ा
सुनसान सड़क पर विचार कर रहा
और कह रहा कि
मौत आएगा सबको
एका एक बार
फिर लोग घूमेंगे
उल्लू सीधा करने को
इन चौराहे पर।

6.इस पथ पर

बहुत सारी अनजान पथ में
सलीके सीखे जीने के
मगर जीवन की अनचाही
इच्छा ने एक
क्रमिक विकास की गति को
रोक दिया है
और
अनचाहे पथ पर ढकेल दिया है
ना जाने ओ कौन-सी रास्ते हैं
जिन्हें इंसान जीवन भर तलाशता है
उन अनछुए पहलुओं को
और
चलता रहता है
इस पथ पर…..
इस पथ पर…

7.सन्नाटा

कई दिनों के बाद
सड़क पर सन्नाटा छाया है
बाग बगीचों में भी
गार्डन की बेरुखी
बाजारों में तेजी से सन्नाटे ने
एकाएक घर कर लिया है
और सारे जहां के बच्चों ने
घर में सो गए हो
प्रतीत होता है कि
ये सन्नाटा मौत के सौदागर
के आने से हुए
चहल कदमी में है
इस मौत ने सब श्मशान भूमि में
परवर्तित किया है
जैसे कई सालों से
इंतजार में था
की कब सन्नाटा छाये
इस जिन्दगी में
बस सन्नाटा है

8.बस चार कंधे चाहिए

जीवन को बेहतर बनाने में
सदियों लग गई
मगर जीवन ज्यों का त्यों
रह गया
सारे कटुता
मिटाकर जीते हैं लोग
रिश्ते नाते, कुटुम्ब, परिवार
के पास जाने को
की मरने से पहले कोई
चार कंधे चाहिए मुझे
इस मौत से पहले
केवल चार कंधे बस चाहिए
इस मौत से पहले
क्या मालूम था
की
कोई इस तरह दस्तक देंगी
जिन्दगी में शून्य हो गए
सारे रस्ते पे
एक अनजान सी
लग रही है
जिंदगी
बस चार कंधे चाहिए
मुझे
मौत से पहले।।

9.निर्जीव

लगता है कि अब यहां
निर्जीव ही बसे हैं
और
मर चुकी है इंसानियत
कहीं दफ़न हो गई है
आस्था
लगता है जहा में अब
कोई मंजिल ही नहीं है केवल
मौत
ने ही पसार लिया है दुनिया को
और बिखेर दिया है शमशानों में
कतार
बस कतार लगी है
लगता है मानव केवल मिट्टी में
मिलने
आ गए धरा पर
अब सब निर्जीव
अब सब निर्जीव…..

-पिनाक वीरेन्द्र कुमार पटेल

वीरेन्द्र कुमार पटेल की 3 कवितायें

One response to “आज के दौर की कविताएं-पिनाक वीरेन्द्र कुमार पटेल”

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    Sanskar Chandrakar

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