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Surta – 2018 से हिंदी और छत्तीसगढ़ी काव्य की अटूट धारा।

आलेख महोत्‍सव: 13. राष्ट्रीय चेतना में साहित्यकारों का योगदान-शंकर लाल माहेश्वरी

आलेख महोत्‍सव: 13. राष्ट्रीय चेतना में साहित्यकारों का योगदान-शंकर लाल माहेश्वरी

-आलेख महोत्‍सव-

राष्ट्रीय चेतना में साहित्यकारों का योगदान

आजादी के अमृत महोत्‍सव के अवसर पर ‘सुरता: साहित्‍य की धरोहर’, आलेख महोत्‍सव का आयोजन कर रही है, जिसके अंतर्गत यहां राष्‍ट्रप्रेम, राष्ट्रियहित, राष्‍ट्र की संस्‍कृति संबंधी 75 आलेख प्रकाशित किए जाएंगे । आयोजन के इस कड़ी में प्रस्‍तुत है-श्री शंकर लाल माहेश्‍वरी द्वारा लिखित आलेख ” राष्ट्रीय चेतना में साहित्यकारों का योगदान’।

गतांक- भारतीय संस्कृति-राष्ट्रीय एकता का स्रोत

राष्ट्रीय चेतना में साहित्यकारों का योगदान

-शंकर लाल माहेश्वरी

राष्ट्रीय चेतना में साहित्यकारों का योगदान-शंकर लाल माहेश्वरी
राष्ट्रीय चेतना में साहित्यकारों का योगदान-शंकर लाल माहेश्वरी

राष्ट्रीय चेतना में साहित्यकारों का योगदान

इक्कीसवीं सदी का जीवन –

इक्‍कीसवीं सदी में मानव का जीवन विभिन्‍न विकृतियों के बीच श्‍वास ले रहा है । इस संदर्भ में श्री लक्ष्‍मीनारायण रंगा के कथन रेखांकित किया जा सकता है –

‘इक्कीसवीं सदी का जीवन वैश्वीकरण, साइबर क्राइम, मुक्त बाजार प्रणाली, बाजारवाद, उपभोक्ता प्रवृत्ति, साम्प्रदायिक संकीर्णता, राजनैतिक विकृतियों, भ्रष्टाचार, अनाचार, उग्रवाद, आतंकवाद, असुरक्षा, मानवीय मूल्यों का अवमूल्यन, राष्ट्रीय चरित्र का अभाव, धार्मिक और आध्यात्मिक भावनाओं में गिरावट, अनैतिकता को बढ़ावा, मूल्यहीन शिक्षा का दुष्प्रभाव, सांस्कृतिक विद्रूपता, पर्यावरण प्रदूषण, भौतिकवाद, आदि मरीची भावों के बीच विकसित हो रहा है।’’

-लक्ष्मीनारायण रंगा

साहित्य सृजन की आवश्यकता –

समाज की ऐसी विकृतियों की अवस्था में इस प्रकार के साहित्य सृजन की आवश्यकता है जो नई चेतना जगा सके। मानव मन में संवेदनाओं का समावेश कर पथराए मानव मन को पिघला कर युगानुकूल मानव की संरचना कर सके। आज मनुष्य मात्र को आत्म चिंतन की आवश्यकता है। वर्तमान परिपेक्ष्य में जो साहित्य लोकतन्त्र के अधिकारों और कर्तव्यों की महत्ता का प्रतिपादन कर मानवीय व नैतिक गुणों के उत्थान हेतु मानव मस्तिष्क को झकझोर दे, उसे नया कुछ करने की प्रेरणा प्रदान करे। साम्प्रदायिक सद्भाव की दिशा में आगे कदम बढ़ा सके । भटके हुए युवाओं को नई राह दिखा सके। पाश्चात्य विचारों से मुक्ति प्रदान कर भारत माँ के प्राचीन गौरव को लौटा सके। संचार साधनों का उत्तरदायित्व गहराई से समझ कर राष्ट्रीय एकता, साम्प्रदायिक सद्भाव, अपराधीकरण पर नियन्त्रण तथा लोकहितकारी योजनाओं से संलग्न होकर राष्ट्र व समाज को नई दिशा दे सके। साहित्य साधक अपने रचनात्मक कौशल का परिचय देते हुए ऐसे ज्योति स्तम्भ का कार्य निरुपण करे जो व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होने में संबल प्रदान कर सके।

सहित्यकार की सीख बड़ी सार्थक सिद्ध हुई है –

साहित्यकार को ऐसे समर्थ और ऊर्जावान रचना शिल्पी के रुप में प्रस्तुत होना चाहिए जो देश की दशा दिशा का गंभीर आकलन कर उसे प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए दिशा बोध प्रदान कर सके। समाज और राष्ट्र को एक नवीनतम आयाम देने का समय आ गया है। साहित्यकार अपने शिल्प द्वारा समर्पित भाव से समाज को सुसंगठित और संस्कारित करने में अपनी भूमिका का निर्वहन करें। आज वैचारिक क्रान्ति की आवश्यकता है। जब जब भी समाज में मूर्छा उत्पन्न हुई, नकारात्मक सोच का प्राधान्य हुआ, बदलती परिस्थितियों में देशवासी बदलाव नहीं ला सका, समय के साथ कदम नहीं मिला सका तो सहित्यकार की सीख बड़ी सार्थक सिद्ध हुई है।

सद्साहित्य द्वारा विचारवान व्यक्तियों का जन्म होता है –

प्राचीन काल में राजा महाराजाओं को सुशासन संचालन हेतु और बिगड़े राजकुमारों को आदर्शवान बनाने हेतु मित्र लाभ, हितोपदेश, नीति कथाएं, जातक कथाएं, पंचतन्त्र की कहानियाँ, चाणक्य नीति, नीति शतक तथा विदुर नीति आदि ग्रंथों का तत्कालीन साहित्य साधकाें ने समाजगत आवश्यकताओं को ध्यान रखते हुए साहित्य का सृजन किया था। जिससे सोई जनता में जागरण उत्पन्न हुआ और एक सामयिक परिवर्तन की लहर दृष्टिगत हुई। सद्साहित्य द्वारा विचारवान व्यक्तियों का जन्म होता है जो रुढ़ियों के विरुद्ध मानसिकता दिखाते हुए समाज में व्याप्त न्यूनताओं को उखाड़ फैंकने में सक्षम होता है।

प्रेरक साहित्य सृजन की आवश्‍यकता-

यदि आज के उदीयमान सहित्यकारों ने अपने प्रेरक साहित्य सृजन की दिशा में कदम नहीं बढ़ाये तो सामाजिक समरसता, राष्ट्रप्रेम, श्रमनिष्ठा , पारिवारिक सामन्जस्य, वैचारिक परिवर्तन और सुसंस्कारों के सृजन से कोंसों दूर रह जायेंगे। यदि सही समय पर सही मार्गदर्शन व दिशाबोध रचना शिल्पियों द्वारा नहीं मिला तो बहुत पिछड़ जायेगें और पीछे रह कर दौड़कर भी मंजिल प्राप्त नहीं कर पायेंगे अतः साहित्यकारों को त्वरित गति से समय के साथ सही दिशा में अपनी रफ्तार तेज करनी चाहिए।

‘ विचारवान व्यक्ति वह होता हैं जिसने मस्तिष्क को इस तरह विकसित कर लिया है कि वह जो चाहता हैं उसे हासिल कर सकता है ।”

नेपोलियन

सद्साहित्‍य से ही कुलषित भावनाओं का दमन हो सकता है-

ईष्या, द्वेष, छल, कपट, दुष्कर्म, बेईमानी, भ्रष्टाचार, जीवन मूल्यों में गिरावट व्यक्ति के भटकाव के कारण है। उसे सही मार्ग का अनुसरण करने के लिए वह साहित्य उपलब्ध नहीं हुआ जिसके पारायण से वह स्वयं को सद्मार्ग पर अग्रसर कर सके। आज तोता मैना और लैला मजनूं की कहानियाँ सार्थक नहीं हैं अब जीवन में आमूल चूल परिवर्तन लाने वाला चौटिला साहित्य चाहिए। सद्साहित्य के पठन द्वारा मानव मन की कलुषित भावनाओं का दमन हो सकता हैं तथा उत्पीड़न व अनाचारों से मुक्ति प्राप्त कर सकता है।

‘‘ जिस प्रकार प्रेम आलसी और निकम्मे मनुष्यों को सुधार देता हैं उसी प्रकार सद् साहित्य जीवन में महान परिवर्तन कर देता हैं। चरित्रगत दुर्बलताओं को इस प्रकार दूर कर देता है मानो किसी दैवी शक्ति ने जीवन में प्रवेश किया हो। व्यक्ति मन के अंदर की फूहड़ता और अव्यवस्थाओं तथा कुटिलताओं को हराकर सुव्यवस्था और सद्भावना को स्थापित कर देता है जिससे अकर्मण्य मनुष्य भी कर्मठ बन जाता है और भटका हुआ प्राणी सन्मार्ग पर अग्रसर होने लगता है। ’’

-रास बिहारी

राष्ट्रीय मूल्यों के प्रति सजगता पैदा करना साहित्यकार का दायित्व –

शब्द शिल्पी द्वारा सृजित साहित्य विश्व की मूल्यवान धरोहर होती है। सहित्य शब्द का तात्पर्य सत्य का अनुसरण करता हुआ जन जन के कल्याण के लिए साहित्य सृजन करे। साहित्य के द्वारा ही रचनाकार अपना संदेश जनजन तक पहुंचाने का प्रयास करता है। शांत मस्तिष्क करुणामय हृदय का आमुख हैं और उसका परिणाम सत्कर्म है। मुनष्य को सत्य एवं आचरण में धर्मजीवी होना चाहिए। अध्यात्म-अमृत का पान कर मानव लोकोपकारी बनता है। वह सत्यम्, शिवम् और सुन्दरम् का पोषक होता है। उसमें जन कल्याण की भावनाओं का उद्गम होता है। व्यक्ति सभ्य एवं सुसंकृत बनता है। करुणा, दया, मैत्री, उदारता, त्याग, सहिष्णुता, सहयोग, श्रम और कल्याण की भावना से परिपूर्ण होकर समाज सेवा में संलग्न हो जाता है। अतः ऐसे साहित्य को विकसित किया जाए जो मनुष्य की भावनाओं को आलोड़ित कर सके। आज कथनी और करनी में एकरुपता नहीं होने से सिद्धान्त और आचरण में बड़ी खाई उत्पन्न हो गई है। हम ज्ञानी बन गये, जानकारियाँ बढ़ गई किन्तु सद्गुणों का विकास नहीं हो पाया। विश्व बंधुत्व की भावना तिरोहित हो गई अतः राष्ट्रीय मूल्यों के प्रति सजगता पैदा करना साहित्यकार का दायित्व है।

साहित्‍यकारों की उपादेयता-

मानव मात्र में सत्य के प्रति निष्ठा और असत्य के प्रति तिरस्कार के भाव में जागृत हो सके, सर्वे भवन्तु सुखिनः के सूत्र का अनुसरण कर सकें। अतिथि देवो भवः की भावना बलवती हो सके, भौतिकवादी सोच से छुटकारा मिले, संस्कार, सद्भाव, आचार व्यवहार, सहृदयता, सहयोग और सहानुभूति आदि गुणों का अभाव हो गया है। आज का जन प्रतिनिधि भटक गया है। दम्भ और अंहकार से परिपूर्ण है। उसका वाणी संयम नष्ट हो गया है। राष्ट्र के प्रति समर्पण भाव समाप्त हो गया है। नेतृत्व की क्षमता नहीं है। वह स्वार्थी और शोषक बन गया हैं। आज सूचना तन्त्र भी निर्बल हो गया हैं, प्रशासन पंगु हो गया हैं। भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन गया है तथा साम्प्रदायिकता देश के लिए अभिशाप बन गई है। जब समाज और राष्ट्र अपने मार्ग से भटकने लगता है तो साहित्यकार की ललकार ही उसे गलत मार्ग को छोड़ सही मार्ग का अनुसरण करने में सहयोगी होती हैं। एक ऐसा भी समय था जब तत्कालीन राजस्थान के राजा महाराजाओं में प्राण फूँकने वाले उन चारण कवियों को नहीं भुलाया जा सकता जिन्होंने अपनी ओजस्वी भाषा व तेजोमय वाणी से उन्हें राजमहलों से बाहर निकाल रणभूमि में तलवार थमाने का कार्य किया। यह चारण साहित्य का ज्वलंत उदाहरण हैं। चारण कवियों ने आश्रय दाताओं की कीर्ति, युद्ध कला, गर्वोक्तियां तथा वीरता पूर्ण कार्य कलापों का चित्रण किया हैं। वह चारण साहित्य उस समय की ज्वलंत समस्याओं के समाहार हेतु उपयोगी सिद्ध हुआ। वह पूरा कार्यकाल डॉ. रामकुमार वर्मा और डॉ. पियर्सन ने आदिकाल को ‘‘चारण काल’’ के नाम से संबोधित किया है। चन्दबरदाई का नाम आज भी जन जन के मन को आदांलित करता हैं। वर्तमान काल में मुंशी प्रेमचन्द्र, मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर, प्रेमघन, प्रताप नारायण मिश्र, राधाकृष्ण दास आदि के साहित्य ने भी पाठक को उत्प्रेरित किया है। शिवाजी महाराज के समय में साहित्य सेवा की दृष्टि से कवि भूषण का विशेष योगदान रहा है।

साहित्य समाज की प्रगति की आधारशिला –

उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द के उपन्यास वस्तुतः गाँधीवादी युग की झलक प्रस्तुत करते हैं उनका कोई भी पात्र संघर्ष से विचलित नहीं होता और उनमें वे समाज की विकृतियों पर प्रहार करते रहे हैं। उनका साहित्य डूबते हुए को संबल प्रदान करने वाला है। कबीर, जायसी, सूर, तुलसी आदि संत कवियों ने अपनी जीवन शैली और साधना से हताश हिन्दू समाज को आलंबन प्रदान किया था। साहित्य समाज की प्रगति की आधारशिला प्रस्तुत करता हैं। साहित्य मानव जीवन को परिष्कृत कर उसे सही दिशा में गतिमान करता है। सशक्त और सजग साहित्य समाज का पथ प्रदर्शक होता है। देश और समाज के निर्माण में साहित्यकार का बहुविध तथा असीमित सहयोग होता है। वे पंरपरा के वटवृक्ष का सहारा लेकर प्रगति के फूल बिखेरते हुए समाज व राष्ट्र का मार्ग प्रशस्त करता है। साहित्य सूर्य किरणां की भाँति समाज में चेतना का संचार करता हैं। ज्ञान के अंधकार को दूर कर समाज को आलोकित करता है। साहित्य ही राष्ट्र की सांस्कृतिक गरिमा को अक्षुण्य बनाये रखता है। साहित्यकार का दायित्व हैं कि वह ऐसे साहित्य का सजृन करे जिससे नागरिक अपने अधिकार व कर्तव्य तथा न्यायिक व्यवस्था से परिचित होकर जागरुक बन सके।

साहित्‍यकारों का साहित्‍य धर्म-

जब देश में मुसलमानों का राज्य प्रतिष्ठापित हुआ उस समय जनता अत्याचारों से त्रस्त थी। देव मंदिरों को गिराना, महापुरुषों को अपमानित करना और साम्प्रदायिकता फैलाना आदि कुकृत्यों से जन जीवन दुखी था। उस समय हमारे संत कवियों ने साहित्य सृजना से समाज को एक नई दिशा प्रदान की थी। संत कबीर ने तो खंडित समाज को एक सूत्र में बाँधनें का अथक परिश्रम किया तथा भावात्मक एकता स्थापित करने में सफल रहे। आधुनिक काल में भारतेन्दू हरिश्चन्द्र के प्रादुर्भाव से आधुनिक भाव धारा का विकास हुआ। सामयिक साहित्य में सामाजिक कुरीतियों का उद्घाटन, अंग्रेजो के विरुद्ध जनमत निर्माण तथा राष्ट्रभक्ति, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, शिक्षा का प्रचार प्रसार आदि के साथ राष्ट्रीय चेतना का उदय हुआ। इस समय के साहित्यकारों ने जनमानस में राष्ट्रीय भावनाओं को जागृत करने का महत्वपूर्ण कार्य किया और अपने साहित्य धर्म का निर्वाह किया।

शिक्षा में बौद्धिक साहित्‍य की आवश्‍यकता-

आज सूचना क्रान्ति का युग है। दूरदर्शन व इंटरनेट के माध्यम से सामयिक व श्रेष्ठ कथा कहानियों से परिपूर्ण आलेखों से जन शिक्षण प्राप्त हो सकता है। अतः कथाकारों को देश हित में ऐसी चित्र कथाएं तैयार करनी चाहिए जो उपयोगी व प्रेरक हों। विशेषतः शिक्षण संस्थाओं में जहाँ नई पीढ़ी की पौध तैयार हो रही है वहाँ यदि प्रेरणादायी और जीवन मूल्यों की उत्प्रेरक पुस्तकों का उपयोग हो तो भावी नागरिक का बौद्धिक स्तर विकसित होगा। देश का विकास भी तभी संभव है जब प्रत्येक नागरिक सुशिक्षित हो सके।

‘‘न पढ़ने वालों से वे श्रेष्ठ है जो पढ़ते हैं। पढ़ने वालों से वे श्रेष्ठ है जो पढ़े हुए का स्मरण रखते है। स्मरण रखने वालों से वे श्रेष्ठ हैं जो पढ़े हुए का अभिप्राय समझते है और उनसे भी वे श्रेष्ठ हैं जो पढ़े हुए के अनुसार आचरण करते हैं। ’’

-मुन स्मृति

समसामयिक परिस्थितियों के अनुरुप ही विषय वस्तु का समावेश –

एक साहित्यकार के द्वारा ऐसी कृति का निर्माण हो जिससे पठित सामग्री का अनुसरण कर आचरण सुधार के लिए उत्प्रेरित हो जाए। साहित्य की विविध विधाओं में निबन्ध, कविता, नाटक, एकांकी, बोध कथा, संवाद, रेखाचित्र, व्यंग्य लेख, उपन्यास तथा क्षणिकाएं विशेष रुप से प्रचारित हैं। अतः समसामयिक परिस्थितियों के अनुरुप ही विषय वस्तु का समावेश विभिन्न विधाओं में प्रस्तुत किया जाए। कवि सम्मेलनों का भी सामाजिकों के लिए विशेष महत्व है अतः कवि अपनी प्रेरणादायी कविताओं के माध्यम से जागरण उत्पन्न कर सके, ऐसा उन्हें सुनिश्चित करना चाहिए।

वर्तमान परिपेक्ष में आंतकवाद, नक्सलवाद, माओवाद, सीमाओं का अतिक्रमण, पर्यावरण प्रदूषण, मानवाधिकारों का क्षरण, दुष्कर्म ,अनाचार, घरेलू हिंसा, सांस्कृतिक प्रदुषण, जनसंख्या विस्तार, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, हत्या,लूटपाट आदि ज्वलंत समस्याएं समाज में व्याप्त हैं। इसके साथ ही सामाजिक रुढ़ियां भी जन जीवन को प्रभावित कर रही है। जिनमें दहेजप्रथा, मृत्युभोज, बालविवाह, शादी समारोह में दिखावा आदि कुप्रथाओं से जन जीवन त्रस्त है। अतः इन सब पर नियन्त्रण भी आवश्यक है। ‘‘ साहित्यकार को सकारात्मक सोच के साथ अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए प्रबल इच्छा शक्ति, अथक परिश्रम,पारदर्शिता तथा सकारात्मक सोच के साथ अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन करना चाहिए तभी समाज का हित होगा।

साहित्यकारों का विशेष दायित्व-

वर्तमान में समूचा देश आतंकी गतिविधियों से पीड़ित है। पुलवामा का आतंकी हमला इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। पूर्व में भी देश पर कई आतंकी हमले हो चुके हैं और असहाय लोगों को मौत का मुँह देखना पड़ा हैं। ऐसी विषम परिस्थिति में हमारे देश के सैनिकों ने दुश्मनों को मुँह तोड़ जवाब देकर जिस तरह देश के नागरिकों को सुरक्षा प्रदान की है वह स्तुत्य है। आज देश पर जहाँ बाहरी आतंकियों का संकट मण्डरा रहा है वहीं आतंरिक उग्रवादी, नक्सलवादी, पत्थरबाज और माओवादियों के द्वारा सुरक्षा को भी खतरा पैदा हो गया है। ऐसी विषम परिस्थिति में साहित्यकारों का विशेष दायित्व हैं कि हमारे वीर जवानों का मनोबल बढ़ सके और सेना दुगुने उत्साह के साथ दुश्मनों से मुकाबला कर सके ऐसी साहित्य सामग्री का सृजन करना चाहिए तथा प्रत्येक नागरिक में राष्ट्रीय भावना को दृढ़ता प्रदान करने के साथ ही वीर जवानों को संबल प्रदान कर सके।

जिन वीर सैनिकों ने अपने प्राणों की आहूति देकर राष्ट्र रक्षा का महत्वपूर्ण कार्य किया हैं उन शहीद परिवारों की सुरक्षा, रोजगार, चिकित्सा, शिक्षा तथा जीवन यापन में देश वासियों का सहज सुलभ योगदान मिल सके ऐसी प्रेरणा साहित्यामृत से प्राप्त हो साथ ही तात्कालिक ज्वलंत समस्याओं के निराकरण में देशवासी तत्परता व समर्पण भाव से योगदान देने के लिए कटिबद्व हो सके।

‘‘शब्द के संवाद से शिव, ब्रह्ना और इन्द्र की शक्ति प्राप्त हो सकती है व्यक्ति का पिछला जीवन चाहे जैसा भी रहा हो शब्द संवाद द्वारा वह वांछित दिशा में उन्मुख हो सकता है। ’’

-गुरु नानक

यदि साहित्यकार सजगता पूर्वक निष्पक्ष भाव से समसामयिक अव्यस्थाओं और विसंगतियों का पर्याप्त आकलन कर अपनी लेखनी उठाने का संकल्प संजोयेगा तो अवश्य सफलता मिलेगी।

‘‘संसार में सभी भले कार्य संकल्प से पूरे होते हैं जिसमें संकल्प की शक्ति नहीं वह संसार में सुकार्य नहीं कर सकता इसीलिए वैदिक ऋषियों ने भी यही याचना की थी कि हमारे हृदय में कल्याणकारी संकल्प हो जिससे हम निरन्तर आत्म कल्याण के साथ लोक कल्याण कर सकें।’’

– आचार्य गणेशदास

समर्पण भाव की आवश्‍यकता-

‘‘ रचनाकार की सफलता जिस ताले में बन्द है वह दो चाबियों से खुलता हैं। एक सकारात्मक सोच और दूसरा दृढ़ इच्छा शक्ति। यदि कोई भी ताला बिना चाबी के खोला गया तो आगे उपयोगी नहीं होगा। अतः साहित्यकार को सजगता पूर्वक राष्ट्रीय चेतना के लिए समर्पण भाव से योगदान देना चाहिए।

-शंकर लाल माहेश्वरी
पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी
पोस्ट- आगूँचा
जिला- भीलवाड़ा(राजस्थान)
मो- 9413781610

लेखक का परिचय

श्री शंकर लाल माहेश्वरी एक वयोवृद्ध वरिष्‍ठ चिंतक लेखक हैं । आपका जन्‍म 18 मार्च 1936 को हुआ । आपके पिता जी का नाम स्व. श्री मिश्री लाल काबरा है । आप एम.ए. बी.एड साहित्य रत्न की शिक्षा अर्जित की है । आप आगूचा जिला-भीलवाडा( राजस्थान) कू मूल निवासी हैं । 10 वर्ष निजी संस्‍था में और 26 वर्ष तक शिक्षा विभाग में शासकीय सेवक के रूप सेवा प्रदान करते हुए जिला शिक्षा अधिकारी में 31 मार्च 1994 को सेवानिवृत्‍त हुए हैं । आपने माध्यमिक शिक्षाबोर्ड द्वारा संचालित सैकण्डरी कक्षाओं की अनिवार्य हिन्दी के लिए एकांकी सुषमा का सम्पादन किया है । ‘‘यादों के झरोखे से’ शीर्षक से आपकी कृति प्रकाशित हुआ है । आपको विभिन्‍न सम्मानों से विभूषित किया गया है जिसमें कुछ इस प्रकार है –

  • जिला यूनेस्को फेडरेशन द्वारा हिन्दी सौरभ सम्मान प्राप्त।
  • विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ भागलपुर (बिहार) विद्यावाचस्पति की उपाधि से विभूषित।
  • साहित्य मण्डलनाथ द्वारा, राजस्थान द्वारा साहित्य भूषण की उपाधि से सम्मानित।
  • राष्ट्रीय साहित्याचंल शिखर सम्मान 2019।
  • ऊँ नमशिवाय मिशन ट्रस्ट द्वारा ‘‘साहित्य सरोजिनी’’ उपाधि से सम्मानित।
  • ब्रिटिश वर्ल्ड रिकार्ड में महाप्रभजी की कविता का अंकन।

आलेख महोत्‍सव का हिस्‍सा बनें-

आप भी आजादी के इस अमृत महोत्‍सव के अवसर आयोजित ‘आलेख महोत्‍सव’ का हिस्‍सा बन सकते हैं । इसके लिए आप भी अपनी मौलिक रचना, मौलिक आलेख प्रेषित कर सकते हैं । इसके लिए आप राष्‍ट्रीय चिंतन के आलेख कम से कम 1000 शब्‍द में संदर्भ एवं स्रोत सहित [email protected] पर मेल कर सकते हैं ।

-संपादक
सुरता: साहित्‍य की धरोहर

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