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आलेख महोत्‍सव: 14. राष्ट्रीय एकता के साधक तत्व – तुलसी देवी तिवारी

आलेख महोत्‍सव: 14. राष्ट्रीय एकता के साधक तत्व – तुलसी देवी तिवारी

-आलेख महोत्‍सव-

राष्ट्रीय एकता के साधक तत्व

आजादी के अमृत महोत्‍सव के अवसर पर ‘सुरता: साहित्‍य की धरोहर’, आलेख महोत्‍सव का आयोजन कर रही है, जिसके अंतर्गत यहां राष्‍ट्रप्रेम, राष्ट्रियहित, राष्‍ट्र की संस्‍कृति संबंधी 75 आलेख प्रकाशित किए जाएंगे । आयोजन के इस कड़ी में प्रस्‍तुत है-श्रीमती तुलसी देवी तिवारी द्वारा लिखित आलेख ” राष्ट्रीय एकता के साधक तत्व’।

गतांक- राष्ट्रीय चेतना में साहित्यकारों का योगदान

राष्ट्रीय एकता के साधक तत्व

– तुलसी देवी तिवारी

आलेख महोत्‍सव: 14. राष्ट्रीय एकता के साधक तत्व - तुलसी देवी तिवारी
आलेख महोत्‍सव: 14. राष्ट्रीय एकता के साधक तत्व – तुलसी देवी तिवारी

संस्कृति और सभ्यता का उद्भव काल और राष्‍ट्रीय भावना की उत्‍पत्‍ती-

संस्कृति और सभ्यता के बाल्यकाल में जब जनसंख्या वृद्धिमान् थी लोग संसाधनों पर अधिकार जमाने के लिए आपस में लड़ने लगे थे। इन आपसी युद्धों में जन-धन की हानि देख कर उन्होने संगठित होकर कबीलों में रहना प्रारंभ किया। संसाधनों के बटवारे के संबंध में कुछ नियम बनाये गये, अपने कबीले का पहचान चिन्ह निश्चित किया गया। एक कबीले के लोग अपनी प्रथाओं परंपराओं, रुढ़ियों आदि की रक्षा के लिए अपनी जान भी दाँव पर लगाने की भावना से अनुप्रणित होने लगे । अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति एवं यशाकांक्षा के कारण लोग दूसरे कबीलों पर आक्रमण करके उनकी धन सम्पत्ति, उनकी भूमि आदि जीत कर वहाँ अपने लोगों को बसाने लगे। आगे चलकर गाँव, जनपद, कस्बा, नगर , महानगर बसते चले गये, जिनमें एक ही संस्कृति के लोग आपसी भाई चारे के साथ एक परिवार की तरह आपसी प्यार और विश्वास से निवास करने लगे, वहां की भूमि पर उनका पूर्ण अधिकार होता गया। राज-काज संभालने वाला व्यक्ति उनके ही बीच का होता था, बनने वाले सारे विधान वहाँ के आमजन के हितों के रक्षक होते थे। ऐसे जन अपनी भूमि, अपनी संस्कृति के लिए जो अपनापन अनुभव करने लगे वह राष्ट्रीय भावना थी, जिससे प्रेरित होकर अनेक वीरों ने अपनी जान होम दी, उनकी शहादत ने देश को और मजबूत डोर से बांध दिया है।

विविधताओं का अनुपम उदाहरण भारत देश-

आदिकाल से ही हमारा देश विविधताओं का अनुपम उदाहरण रहा है। प्राकृतिक रूप से इसकी सीमा अन्य देशों से अलग है। उत्तर में नगाधिराज हिमालय, सतर्क प्रहरी के समान देश की रक्षा में सन्नद्ध हैं तो पुर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब सागर की खाड़ी और दक्षिण में हिन्द महासागर जैसे निरंतर भारत माता के चरण पखारता रहता है। इस प्रकार प्रकृति ने ही हमारी सीमा का निर्धारण कर दिया है जिसके परिणाम स्वरूप इस सीमा के अन्दर निवास करने वाले लोग एक दूसरे से आन्तरिक एक्य अनुभव करते हैं। अथर्ववेद में भगवान् से प्रार्थना की गई है कि -ईश्वर! हमें ऐसी बुद्धि प्रदान करे कि हम परिचित अपरिचित,सबके प्रति सद्भावना रखें।

आर्यावर्त, भारतखण्‍ड, जंबू द्वीप,हिन्दुस्तान, इंडिया, भारतवर्ष के नाम से विश्व में ख्याति प्राप्त अपना देश प्राकृतिक रूप से कहीं पर्वतीय,कहीं मैदानी, कहीं पठारी, तो कहीं घने जंगलों से आच्छादित है। निवास स्थान के अनुकूल, भाषा,खान-पान, रीति-रीवाज, आदि का विकास होना स्वाभाविक ही था, जो अक्सर राष्ट्रीय जीवन में गतिरोध उत्पन्न किया करता रहता है ।

राष्‍ट्रीय भावना का बीजारोपण-

अथर्व वेद में राष्‍ट्रीय भावना-

ज्ञान के आगार विश्व पिता के मुख से निःसृत वेद भगवान् ने कहा-

जनं विभ्रतीबहुधा विवाचसं नानाधर्माण पृथिवी यथौकसम्।
सहस्रं धारा द्रविणस्यमें दुहां ध्रवेव धेनुरनपस्फुरंतिं। – अथर्व वेद

अर्थात राष्ट्र में विभिन्न जातियों, धर्मो , सम्प्रदायों, विविध भाषाओं और रीति-रीवाजों के लोग रहते हैं यद्यपि उनके व्यक्तिगत हित होते हैं तथापि राष्ट्रहित के लिए एक जुट होकर एक साथ रहना चाहिए, जैसे गौ माता चुपचाप खड़ी होकर अपने थनों से सहस्र धाराओं से दूध देती है, वैसे ही हमारी धरती माता समान रूप से अपनी सभी संतानों को अन्न, जल,खनिज के रूप में विविध धातुएँ रत्न आदि देकर पोषण करती है । जब हम एक माँ की संतान हैं तो फिर भेद-भाव और अलगाव कैसा?

ऋग्वेद में राष्‍ट्रीय भावना-

देश में उपस्थित उच्च’ निम्न की भावना का उपचार करते हुए ऋग्वेद उद्घोष करता है-

अज्येष्ठासो अकनिष्ठासएते सम भ्रातरो वावृधुः सौभगाय।
युवा पिता स्वपारुद्र एषां सुदुधा पृश्निःसुदिना मरुद्भयः।

भावार्थ यह है कि ईश्वर के सामने कोई छोटा या बड़ा नहीं होता सभी मनुष्य समान होते हैं अतः सभी मनुष्यों को भाई – भाई की तरह रहना चाहिए, और सम्मिलित प्रयास से ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए उन्नति करनी चाहिए।

वैदिक संस्‍कृति में राष्‍ट्रीय भावना-

हमारी वैदिक संस्कृति राष्ट्रीय एकता की भावना के बीज बोती, उसके पुष्पित- पल्लवित होने योग्य वातावरण तैयार करती रही है। वैदिक युग हमारे देश का स्वर्णयुग कहा जाता है । उस काल में देश ने वैज्ञानिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक उन्नति के शिखर स्पर्श किये।

जैन बौद्ध धर्म में राष्‍ट्रीय भावना-

समय के साथ वैदिक धर्म में कुछ अवांछित तत्व प्रभावशाली होते गये,जिनके परिहार के लिए वैदिक धर्म की प्रतिक्रिया स्वरूप ईसा पूर्व 599 ईस्वी में भारत भू पर जन्म लेकर महावीर स्वामी ने जैन धर्म और 543 ईसा पूर्व में गौतम बुद्ध ने बौद्ध धर्म की स्थापना करके प्रजा का मार्ग दर्शन किया। ये दोनों ही धर्म समकालीन थे और दोनो ने ही सत्य अहिंसा अस्तेय ब्रह्मचर्य आदि के साथ ही राष्ट्रीय एकता सुदृढ़ करने पर बल दिया क्योंकि एकता के बिना देश की अस्मिता को बनाये रखना असंभव है और राष्ट्र के बिना जन की कहाँ गति है?

चूंकि दोनो धर्मों के प्रर्वतक राजपुत्र थे इसलिए इन्हें सत्ता का समर्थन ही नहीं सहयोग भी प्राप्त हुआ। अनेक राजपुत्र ने राष्ट्र की रक्षा के लिए धारण की गई तलवार त्याग कर कौपीन धारण कर लिया। जगह-जगह चैत्य और बिहार बनाये गये जिनकी कलात्मकता आज भी आश्चर्य चकित करती है। इनके निमार्ण में राजकोष रिक्त हुआ, प्रजा पर अनावश्यक कर का बोझ बढ़ गया। राजा के चयन में भिक्षओं का प्रभाव बढ़ जाने से अयोग्य शासक सिंहासन पर बैठने लगे जिन्हें संघ के संकेत पर विदेशी आक्रांताओं का भव्य स्वागत करके उनसे दया की आशा करनी पड़ती। देश ही नहीं विदेशों में भी बौद्ध मत का प्रचार प्रसार हुआ। संघ में महिलाओं के प्रवेश से ये चैत्य और बिहार अनाचार के अड्डे बन गये, महात्मा बुद्ध ने मूर्ति पूजा के विरोध में नया धर्म चलाया था किंतु उनके जीवन काल में ही बौद्ध धर्म की एक शाखा ने महात्मा बुद्ध की प्रतिमा का पूजन प्रारंभ कर दिया। आगे चल कर बिहार तंत्र-मंत्र हठ योग भैरवी तंत्र के केन्द्र बन कर प्रजा के जीवन को भ्रमजाल में फंसाने लगे। वैदिक धर्म की बड़ी अवनति हुई इस काल में । बौद्ध धर्म और वैदिक धर्म में पारस्परिक द्वेष और भेद- भाव चरम पर था अन्य सम्प्रदाय वाले भी नये- नये वितंडे खड़े किये रहते थे।

आदि शंकराचार्य द्वारा देश की एकता और सांस्‍कृतिक महत्‍व का प्रतिपादन-

धर्म की रक्षा हेतु ईश्वर ने अवतार लेने की बात बार- बार कही है, वह मिथ्या नहीं है। इस बार वे केरल के आलावाई नदी के तटवर्ती ग्राम कलादी में शंकर के नाम से जन्में। शिव गुरू पिता और विशिष्टा माता की संतान जिनका जन्म शंकर भगवान् की कृपा से हुआ और नाम भी शंकर ही रखा गया था। यह 508 ईसा पूर्व की बात है, अत्यंत प्रतिभा सम्पन्न शंकर ने आठ वर्ष की अल्पायु में संपूर्ण वेदों का अध्ययन करके उनमें दक्षता प्राप्त कर ली। वे वेदान्त के अनुयायी बने। वेदान्त अर्थात वेदों के रहस्य । वे अद्वैतवाद अर्थात –

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मौव नापरः।

अर्थात ब्रह्म ही सत्य है जगत मिथ्या है और जीव ब्रह्म से भिन्न नहीं है।

उन्होंने देश की एकता और सांस्कृतिक अखंडता के महत्व को समझा। और बौद्ध धर्म के प्रभाव से लोगों को निकालने के लए दिग्विजय पर निकले । जगह-जगह शास्त्रार्थ करके देश भर के प्रकांड विद्वानों को पराजित किया, इनमें वेद रहस्य मर्मज्ञ कुमारिल भट्ट और अलौकिक विद्वान मंडन मिश्र तथा उनकी पत्नी भारती देवी भी शामिल थे। आचार्य शंकर ने अपने विचारों से मानव विचारों की धारा ही बदल दी। और ब्राह्मणवाद अथवा वैदिक धर्म की ध्वजा को उँचे आकाश पर फहरा दिया।

मठ और धाम का राष्‍ट्रीय एकता में योगदान-

आचार्य शंकर युग द्रष्टा थे,वे भरतवर्ष को एक राष्ट्र इकाई मानते थे। उन्होंने देश को काश्मीर से कन्याकुमारी तक एक सूत्र में बांधने के उद्देश्य से देश के चारों दिशाओं में मठों की स्थपना की और प्रत्येक व्यक्ति के लिए चारों धाम की यात्रा करने का नैतिक कर्तव्य निर्धारित किया। ताकि सभी जन भावात्मक रूप से जुड़े रहें। , इनमें उत्तर में ज्योर्तिमठ जो हिमालय पर्वत के मध्य बदरिकाश्रम में स्थित है, कर्नाटक राज्य और आदिवाराह देवता हैं , पूर्व में गोवर्धन मठ जो पूर्वी समुद्र तट पर जगन्नाथपुरी में है और इसके देवता जगन्नाथ स्वामी हैं । पश्चिम में शारदामठ है यह पश्चिमी समुद्र तट पर द्वारिकापुरी में स्थित है, और इसके देवता सिद्धेश्वर महादेव हैं ।

इन चार मठों की स्थापना एक युगान्तरकारी सांस्कृतिक क्रांति थी। ये वेदान्त के प्रचारक तो थे ही इसके अतिरिक्त उनका उद्देश्य राष्ट्रीय एकता की नींव डालना था उन्होंने लोंगों को समझाया कि वे सभी सम्प्रदाय जिनके हिन्दू अनुयायी हैं वैदिक धर्म से ही निकले हैं, अतः वे एक के ही अनेक स्वरूप हैं,उन्होंने शैव,शाक्त और वैष्णव पंथ में आपसी सहिष्णुता स्थापित की ताकि इनमें टकराव न हो। भारत की प्रादेशिक , जातिगत,भाषागत रहन- सहन, वेशभूषा खान-पान रीति- रीवाज की विविधता जगजाहिर है किंतु इन तीर्थों में आकर वे भावनात्मक रूप से जुड़ जाते हैं, व्यक्ति जहाँ कुछ दिन रहता है वहाँ के लोगों के सम्पर्क में आना स्वाभाविक हो जाता है, एक दूसरे को समझना, उनकी बोली भाषा में बातें करना और अपना भी कुछ प्रभाव छोड़ना अन्तःक्रिया के रूप में होता है जिसका प्रभाव आदमी में सदा जीवित रहता है । बद्रीनाथ मंदिर से लगभग चालीस किलोमीटर दूर ज्योर्तिमठ में प्रतिदिन लगभग आधे िंक्वंटल चावल का भोग लगता , वहाँ सभी जाति वर्ग के लोग एक पंक्ति में स्वेच्छा से बैठ कर प्रसाद पाते हैं ।

गंगोत्री से लाया गया गंगाजल रामेश्वरम् में चढ़ना महान् पुनीत कर्तव्य है और जगन्नाथ पुरी में खरीदी गई छड़ी द्वारिकाधीश को अर्पित करना परम आवश्यक माना जाता है । तत्कालीन समय में ये पीठ जितने महान् लक्ष्य की प्राप्ति के लिए स्थापित किये गये थे उतने ही आज भी उपयेगी हैं, जब विघटनकारी शक्तियाँ देश को बांटने के नाना प्रयत्न कर रहीं हैं ।

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उनके विषय में सत्य ही कहा है-’’वे ऐसे व्यक्ति थे जो काश्मीर से कन्याकुमारी तक सारे हिन्दुस्तान को अपना कार्य क्षेत्र मानते थे और उसमें सांस्कृतिक एकता का अनुभव करते थे। वे समझते थे कि हम बाहरी रूप से चाहे जितने भिन्न हों आंतरिक रूप से एक ही भाव से अनुप्राणित हैं।’’

आचार्य चाणक्‍य और राजा चन्‍द्रगुप्‍त का राष्‍ट्रीय एकता में योगदान-

आचार्य शंकर अपने कार्य को और विस्तारित करना चाहते थे किंतु 32 वर्ष के अल्प जीवन में बहुत कुछ करना रह गया जिसे ईसा पूर्व 375 ईसा पूर्व जन्मे विष्णुगुप्त ने मूर्तरूप दिया। हिमालय से सागर पर्यन्त देश को एक सूत्र में बांधने के उद्देश्य से उन्होंने चन्द्रगुप्त मौर्य नामक एक बालक को प्रशिक्षित किया। मगध के विलासी शासक धननंद का वध करवा कर एक विशाल सेना संगठित की, उस समय मकदुनिया के शासक सिकंदर के आक्रमण हो रहे थे, वह विश्व विजय हेतु अपने देश से एक विशाल सेना लेकर निकला था। भारत के सीमावर्ती शासक उसे आगे बढ़ने का मार्ग दे रहे थे, इनमें तक्षशिला के शासक आंभी का नाम बड़ी लज्जा से लिया जाता है । चाणक्य ने चंद्रगुप्त को भारत का सम्राट बनाया और स्वयं महामंत्री बनकर देश को एक सूत्र में पिरोने का दुस्तर कार्य करके दिखा दिया। इस महत् लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उन्हें अपने देश के ही राजाओं से कई युद्ध लड़ने पड़े । उनके सामने राष्ट्रीय एकता का महान् उद्देश्य था। उन्होंने साम, दाम दंड भेद की सारी नीतियों का प्रयोग करके इसे प्राप्त किया।

आधुनिक काल के महान् कवि ’जयशंकर प्रसाद ने अपने नाटक ’ चंद्रगुप्त में लिखा-

’’ हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती,
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती।’’

स्‍वतंत्रता संग्राम का राष्‍ट्रीय एकता में योगदान-

मुगलों के आक्रमण, उनके धार्मिक अत्याचार, देशी राजाओं की अहिंसा वृत्ति, आपसी रंजिश राष्ट्रीय भावना से अधिक अपने छुद्र अभिमान को महत्त्व देने के कारण देश और देशवासी दुरावस्था को प्राप्त हुए। व्यापारी बनकर आये अंग्रेज भारत के स्वामी बन गये और प्रकृति ,द्वारा निर्मित भारत वर्ष ब्रिटिश उपनिवेश बन कर रह गया। राजे-महाराजे, किसान मजदूर ,पंडित पुजारी अर्थात सभी वर्गों के लोग अपमान पूर्ण जीवन जीने के लिए विवश हो गये। अपने देश का कच्चा माल ब्रिटेन के कारखानों में तैयार होकर बाजार में बिकता और हमारे कामगार बेरोजगार बैठे अपने भाग्य पर रोते रहते ।

उस समय के साहित्यकारों ने जनता को उसके बल, शौर्य और स्वर्णिम इतिहास का स्मरण कराया और सन् 1857 में समूचा राष्ट्र एक होकर रणभूमि में उतर आया। फिर चाहे वह मंगल पांडे हों लक्ष्मीबाई, नाना साहेब या अजीजन बाई , सबका उद्देश्य एक था, देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराना ,भले ही युद्ध में विजय न हो सकी किंतु राष्ट्रीय एकता की जो मशाल प्रज्ज्वलित हुई उसके आलोक में सब कुछ स्पष्ट नजर आने लगा। आगे संगठन की शक्ति बढ़ती गई । महात्मा गांधी ने राष्ट्रीय एकता की समझाइस देते हुए कहा-’’हम हिन्दुस्तानी एक थे और एक हैं।”


’’ राष्ट्र का अर्थ यह नहीं कि हमारे बीच कोई मतभेद नहीं था। हमारे लोग एक दूसरे की भाषा सीखते थे औेर उनके बीच कोई भेद नहीं था। जिन दूरदर्शी महापुरूषों ने सेतुबंध रामेस्वर,जगन्नाथपुरी,हरि,द्वार और ,द्वारिका की यात्रा ठहराई वे जानते थे कि ईश्वर भजन घर बैठे भी होता है लेकिन उन्होंने सोचा कुदरत ने हिन्दुस्तान को एक बनाया इसलिए वह एक राष्ट्र होना चाहिए।। इसलिए उन्होंने अलग- अलग स्थान तय करके लोगो को एकता का विचार इस तरह दिया कि जिस तरह दुनिया के किसी भी देश में नहीं दिया जाता होगा।

’महात्मा गांधी वांगमय से’

धार्मिक ग्रन्‍थों और साहित्‍यों का राष्‍ट्रीय एकता में योगदान-

इसी प्रकार बाइबिल, कुरान, गुरूग्रंथ साहेब, सत्यार्थ प्रकाश स्वामी विवेकानंद जी का साहित्य, श्री रामकृष्ण परम हंस, स्वामी रामतीर्थ , सुब्रह्मण्य भारती आदि ने भी राष्ट्र की एकता को मजबूत करने के लिए साहित्य की रचना की। विश्व कवि रविन्द्रनाथ ठाकुर कहते है–भारत अठारह भाषाओं में बोलता है परन्तु चिंतन एक है। जिस प्रकार शरीर के विभिन्न अंगों के काम अलग-अलग हैं किंतु किसी के महत्त्व को कम करके नहीं आंका जा सकता। ठीक उसी तरह सामाजिक व्यवस्था में सभी वर्णों की स्थिति है। वे मिल जुल कर अपने- अपने योगदान के आधार पर एकसूत्र में बंधे हुए हैं जो स्नेह,सौहाद्र और सहअस्तित्व का वातावरण उत्पन्न करने में सहायक सिद्ध होते हैं।

भारतीय संविधान राष्‍ट्रीय एकता का स्रोत-

सभ्यता के विकास के साथ पीढ़ी दर पीढ़ी जो कुछ हमारे पूर्वजों ने अनुभव किया उसे अपने शिष्यों के द्वारा अगली पीढ़ी को हस्तांंरित किया। जिससे हमारे विचार निर्मित होते एवं परिपक्व होते गये और जब हमारा देश स्वतंत्र हुआ तब राष्ट्रीय एकता के विचार को जन-जन के हृदय में स्थापित करने के उद्देश्य से कई ऐसे प्रयास किये गये जो अनायास ही देशवासियों को भावनात्मक रूप से अभिन्न बनाते हैं, इनमें सर्व प्रथम हम अपने संविधान की ओर दृष्टि डालेंगे जिसकी प्रस्तावना में ही धोषणा कर दी गई है कि भारत सब प्रकार से एकता के सूत्र में आवद्ध है-

”हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न,समाजवादी पंथ निरपेक्ष,लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए,तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक,आर्थिक,और राजनीतिक न्याय,विचार ,अभिव्यक्ति,विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा, और राष्ट्र की एकता और अखंडता,सुनिश्चित कराने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित,और आत्मार्पित करते हैं।’’

राष्ट्रीय एकता के साधक तत्व –

राष्‍ट्रीय प्रतीक-

प्राचीन काल में जो भूलें हुईं और जिनके परिणाम स्वरूप एक लंबे समय तक देश पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा रहा, वैसा अब कदापि न होने पाये इस उद्देश्य से कुछ राष्ट्रीय प्रतीक निर्धारित किये गये हैं। जिन्हें विधि सम्मत बनाया गया है उनके प्रयोग के कुछ नियम बनाये गये है जिनकी अवलेना अपराध की श्रेणी में आती है। सिद्ध होने पर दंड का प्रावधान है। ये प्रतीक इस बात का ध्यान रखकर स्वीकारे गये है कि वे भारतीय संस्कृति से किस कदर जुड़े हुए हैं या स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी क्या भूमिका रही है या वर्तमान और भविष्य में भरतीय जनमानस में उस वस्तु की कितनी पैठ है या होगी। राष्ट्रीय प्रतीक वास्तव में राष्ट्रीय गौरव के सूचक हैं और राष्ट्र के समान ही वंदनीय भी हैं, ये हमारी स्वतंत्र अस्मिता के साक्षी हैं। इनके सम्मान के लिए बड़े से बड़ा त्याग किया जा सकता है।

हमारे राष्ट्रीय प्रतीकों में पहले नंबर पर हम अपने संविधान को रखते हैं जिसमें लिखे कानून और नियमों के आधार पर देश वासियों का जीवन संचालित होता है। हमारे देश में कानून को सर्वोपरि स्थान प्राप्त है, यह एक विस्तृत और लिखित संविधान है। विश्व के सारे संविधानों की अच्छी- अच्छी बातें इसमें शामिल हैं यह कड़ा और लचीला दोनो है। समय के अनुसार प्रजा के हित में इसमें संशोधन होते रहते हैं किंतु संशोधन बिल पास होने के लिए सदन में उपस्थित सांसदों के दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। प्रक्रिया एकदम सरल नहीं हैं। अभी- अभी हमारे देश में कुछ संशोधन हुए हैं जिनकी मांग बहुत पहलें से उठ रही थी एक तो तीन तलाक को गैरकानूनी मानने का संशोधन और दूसरा काश्मीर से धारा 370 हटाकर उसे भी अन्य राज्यों के समान सारे अधिकार देने का संशोधन। यह हमे इकहरी नागरिकता देता है, जाति भेद या लिंग भेद के बिना सभी को अवसर की समानता देना इसकी विशेषता है।

हमारा राष्ट्र ध्वज तिरंगा-

1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद भी सन् 1905 तक अपना झंडा न होने के कारण सभा आदि के समय युनियन जैक ही फहराया जाता था। , परंतु सभी चाहते थे कि हमारा अपना झंडा होना चाहिए। अनेक परिवर्तनों और सुधारों के बाद 22 जुलाई सन्1947 को तिरंगा अपने वर्तमान् स्वरूप में हमारी संविधान सभा के द्वारा स्वीकार कर लिया। इसके लिए प्रस्ताव पेश करते हुए पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था- ”यह ध्वज साम्राज्यवाद या किसी के ऊपर किसी के प्रभुत्व का सूचक नहीं है, यह न केवल हमारी स्वाधीनता का बल्कि देखने वाले समस्त व्यक्तियों की स्वाधीनता का प्रतीक है। यह ध्वज जहाँ कहीं भी जायेगा चाहे वहाँ हमारे मंत्री या राजदूत रहते हों या नहीं, बल्कि दूर समुद्र पर जहाँ जहाँ हमारे जहाज इसे लेकर जायेंगे वहाँ- यह संदेश देगा कि कि भारत विश्व के सभी देशों के साथ मैत्री चहता है। और स्वाधीनता के लिए प्रयासरत देशों की मदद करना चाहता है। हमारा ध्वज हमारी राष्ट्रीय एकता का प्रबल आधार स्तंभ है इसे हाथ में लेकर इसके सम्मान के लिए असंख्य वीर आजादी की बलिवेदी पर चढ़ गये आज भी हमारी सेना इसे उठाये शत्रु पर प्रलय बन कर जब टूट पड़ती है तब शत्रु के भागने के लिए जमीन नहीं बचती। सभी राष्ट्रीय पर्वों पर देश के सभी हिस्सों में तिरंगा झंडा फहराया जाता है। यह हमारे गौरव पूर्ण अतीत, के साथ ही मातृभूमि की हरितिमा, शांति प्रियता और देश के लिए बलिदानी भाव का प्रतीक है।

राष्ट्रगीत-

वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का दर्जा प्राप्त हैं, इसकी रचना बांग्ला उपन्यासकार बंकिमचंद्र चटर्जी ने सन् 1874 में की थी, बंग दर्शन में छपने के बाद इसकी लोकप्रियता ऐसे बढ़ी कि लेखक स्वयं हैरान रह गये। आगे अपने उपन्यास आनंदमठ में इसे शामिल कर लिया फिर तो यह गीत स्वातंत्र्य समर का महामंत्र बन गया। इसे गाते हुए देश भक्त हँसते- हँसते फाँसी का फंदा चूमने लगे। देश की आजादी के पश्चात् जन गण मन के समकक्ष ही इसे भी स्थान दिया गया। इसमें हमारी भारत माता की वंदना की गई है। हर भारतवासी इसका आदर करता है यह राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने वाला अमोघ ग्रन्थि बंधन है।

राष्ट्रगान –

गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर रचित ’जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता’ हमारा राष्ट्रगान है। इसकी रचना सन् 1911 में हुई । 24 जनवरी सन् 1950 को इसे भारत का राष्ट्रगान स्वीकार किया गया। यह हमारे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है और पूरे देश को एक सूत्र में ग्रंथित करने वाला है। हमारे सारे प्रदेशों में राष्ट्रीय पर्वों पर इसे विधिवत् गाया जाता है । देश का हर व्यक्ति इसके सम्मान में इसके बजते अथवा गाना प्रारंभ होते ही अपने आसन से उठ कर खड़ा हो जाता है। यह हमें राष्ट्रीय एकता के अमिट संस्कार देता है।

अशोक चिन्ह –

ऐसे ही और भी जो हमारे राष्ट्रीय प्रतीक हैं वे हमारी एकता को सशक्त करते हैं, जैसे –हमारा राष्ट्रचिन्ह- अशोक चिन्ह, जिसमें तीन सिंहों की मूर्तियाँ दिखाई देती हैं वस्तुतः ये चार हैं किंतु पीछे होने के कारण हर ओर से तीन नजर आती हैं यह हमारे संपूर्ण राज कार्यों तथा उनसे संबंधित वस्तुओं एवं स्थानों पर प्रयुक्त होने के साथ ही हमारे राष्ट्र की सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतिनिधित्व करता है। यह हमारे देश की पूर्ण स्वतंत्र अस्मिता का प्रतीक है। जिस पट्टी पर सिंहों की मूर्तियाँ अवस्थित हैं उसके बीच में चौबीस शलाकाओं वाला एक चक्र है जिसके दाहिनी ओर बैल और बाईं ओर घोड़ा बना हुआ है। इसे हमारे तिरंगे झंडे के मध्य में स्थान प्राप्त हुआ है। इसमें जीवन के सदैव गतिशील होने का संदेश है जिसे सारनाथ के अशोक की सिंह वाली लाट से लिया गया है।

राष्‍ट्रीय पर्व-

हमार राष्ट्र पक्षी मयूर है तो राष्ट्रपशु सिंह है राष्ट्रीय पुष्प कमल है तो राष्ट्रीय पर्व 15 अगस्त 26 जनवरी और तीस जनवरी है। इन त्यौहारों को देश के प्रत्येक भाग में एक ही तरीके से मनाया जाता है झंडा फहराना, राष्ट्रगान , राष्ट्रगीत का गायन शहीदों को नमन, गौरव पूर्ण इतिहास का कथन श्रवण, देश की स्वतंत्रता और अखंडता की रक्षा का संकल्प लेना आवश्यक होता है। ये त्यौहार हर भारतीय को हमेशा याद दिलाते रहते हैं कि हम एक ही वृक्ष के अंग हैं, हमारी शाखाएं भले ही आकाश में फैल रहीं हों जड़ एक ही है जिसका नाम भारत वर्ष है। हमारा राष्ट्रमंत्र है ’सत्यमेव जयते तथा ’श्रम एव जयते’

हमारी संघ राज्य भाषा हिन्दी-

यह राष्ट्रीय एकता की जड़ों को अपने प्रेमरुपी अमृत से सींच कर अमर बेल की तरह अपने सभी बच्चों को एक दूसरे के साथ गूंफित करके रखती है। हिन्दी संस्कृत की दुहिता है,इसके बहुसंख्य शब्द संस्कृत से ही आते हैं, चूंकि संसार की सभी भाषाएं संस्कृत की बेटियाँ हैं इसलिए हिन्दी को समझना और बोलना सभी के लिए सरल और उसका व्यवहार अपनत्व भरा है। हिन्दी सभी भाषाओं के शब्दों को अपनाती है इसलिए भी सब को अपनी जैसी लगती है । मुगलकाल में हिन्दी राज-काज की भाषा रह चुकी है इसलिए भी इसकी पहुँच देश के सभी हिस्सों तक है। यह भले ही राष्ट्रभाषा के पद पर नहीं हैं परंतु यह हमारे संघराज्य की राजभाषा है,विश्व में इसके बोलने वालों की संख्या दूसरे नंबर पर है। इसके लिए ही भारत में राष्ट्रभाषा का सिंहासन खाली पड़ा है। अन्य सारे तत्वों से बढ़कर हिन्दी भाषा राष्ट्रीय एकता को मजबूत करती है क्योंकि एक भाषा वाले क्षेत्र में जाति, धर्म, लोकाचार भले ही भिन्न- भिन्न हो भाषा एक ही होती है , अपनी भाषा से व्यक्ति का इतना लगाव होता है कि किसी अजनबी के मुँह से अपनी भाषा का एक शब्द सुनकर ही आदमी को वह जन्म-जन्म का मित्र लगने लगता है। हमारी हिन्दी भाषा के पंडे पुरोहित सारे तीर्थों में मिलते हैं, इसी प्रकार परिवहन वाले , व्यापारी वर्ग पुलिस विभाग के लोग, हिन्दी जानते हैं और उसका यथोचित व्यवहार भी करते हैं।

भारतीय सेना-

हमारी सेना में हर प्रान्त हर धर्म जाति और हर समुदाय के लोग रहते हैं,उनका एक ही उद्देश्य होता है देश की रक्षा । सेना में सभी एक परिवार की भाँति रहते हैं । प्राकृतिक आपदा हो या युद्धकाल शत्रु से रक्षा करते समय न तो दाढ़ी देखी जाती है न हीं शिखा जनेउ, क्रॉस, या कच्छ, कड़ा कृपाण ,कंघा,और केश देखे जाते है , विपत्ति में फँसा हर भारतीय सेना से सुरक्षा पाने का अधिकारी है। हमारी सेना हमारी एकता का आधार स्तंभ है।

राष्‍ट्रीय एकता के अन्‍य प्रमुख साधक तत्‍व-

राष्ट्रीय एकता के साधक तत्वों में सबसे महत्वपूर्ण हैं यहाँ के लोग, जिनके हृदयों में अपनी मातृभूमि से प्रेम का अजस्र सोता निरंतर बहता रहता है, जीवन को सरल बनाने वाले सारे काम मुसलमान करते है, जैसे हिन्दुओं के देवी देवताओं की मूर्तियाँ बनाना, पंडाल आदि बनाना, तीर्थों में घोड़े की सवारी करा कर यात्रियों को मंदिर तक पहुँचाना, सभी व्यापारों में सक्रिय भागीदारी निभाना आदि। वैसे ही हिन्दु का बीमार बालक मौलवी की फूंक से ठीक होता है, हिन्दुओं के खेतों की कास्त मुसलमान करते हैं । ईद, बकरीद या मुहर्रम के समय हिन्दू अपने मुसलमान भाइयों के वाहन की सुरक्षा के लिए स्टेंड खोलते हैं । होली- दीवाली में रंग और फटाकों की दुकाने मुस्लिम भाई लगाते हैं। एक जगह के रहने वाले एक ही भूमि का अन्न खाते हैं और एक ही जल सा्रेत का जल पीते हैं । सभी धर्मों में कहा गया है कि ईश्वर एक है सारे मनुष्य एक ही पिता की संतान हैं तो आपस में भाई – भाई ही हुए न…ऽ ? जब भी हमारे देश में कुछ विपरीत होता है, किसी न किसी स्वार्थी तत्व के द्वारा किया गया अपराध होता है, अंग्रेजों ने राज्य के लिए हमें बांटा और लड़ाया , मुहम्मद अलि जिन्ना ने प्रधान मंत्री बनने के लिए देश का बंटवारा कराया । अब भी ऐसे तत्व सक्रिय होते रहते हैं जो हमारी सरकार, सेना, गुप्तचार विभाग, सजग नागरिकों के सद्प्रयास से मुँह की खाकर औंधे मुँह जमीन पर गिर पड़ते हैं । बँटवारे के बाद भी जिस देश के लोंगों को बाँटा न जा सका उस देश की एकता सदा सर्वदा अखंड ही रहेगी। इसमे रंच मात्र भी संदेह नहीं है।

-तुलसी देवी तिवारी

आलेख महोत्‍सव का हिस्‍सा बनें-

आप भी आजादी के इस अमृत महोत्‍सव के अवसर आयोजित ‘आलेख महोत्‍सव’ का हिस्‍सा बन सकते हैं । इसके लिए आप भी अपनी मौलिक रचना, मौलिक आलेख प्रेषित कर सकते हैं । इसके लिए आप राष्‍ट्रीय चिंतन के आलेख कम से कम 1000 शब्‍द में संदर्भ एवं स्रोत सहित तथा स्‍वयं का छायाचित्र [email protected] पर मेल कर सकते हैं ।

-संपादक
सुरता: साहित्‍य की धरोहर

अगला अंक- आखिर कब रोशन होगा गरीब का घर….? 

2 responses to “आलेख महोत्‍सव: 14. राष्ट्रीय एकता के साधक तत्व – तुलसी देवी तिवारी”

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