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आज़ादी के अमृत महोत्सव पर 21 कवितायेँ -प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह

आज़ादी के अमृत महोत्सव पर  21 कवितायेँ -प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह

आज़ादी के अमृत महोत्सव पर 21 कवितायेँ

-प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह

आज़ादी के अमृत महोत्सव पर 21 कवितायेँ
आज़ादी के अमृत महोत्सव पर 21 कवितायेँ

आज़ादी के अमृत महोत्सव पर 21 कवितायेँ

1.महाकुम्भ

श्रेष्ठ तीर्थ यह देव रूप
जीवन सानन्द सरल,
शीतल जल की भक्ति,
भक्ति भावना ले श्रद्धालु ,
बोल रहे हर गंगे ध्वनि ।
मोक्षदायिनी के प्रवाह में
संस्कृति का स्वच्छ , धवल दर्पण ,
भावों में है व्यक्त यहाँ
आस्था पर सब कुछ अर्पण ।
प्रतिदर्श सभी समुदायों का ,
गान सभी भावों का,
उन्नत भारत की संस्कृति का
है घोष नगर गावों का ।
यह महाकुम्भ धरती पर
श्रेष्ठ तीर्थ यह देव रूप
यह त्याग ,तपस्या अर्पण का
पूजा श्रद्धा का व्यक्त रूप ।
गान सभी भावों का,
उन्नत भारत की संस्कृति का
है घोष नगर गावों का ।

2.सद्भाव यहाँ , समभाव यहाँ

मिटटी की खुशबू आषाढ में
यहाँ प्रकृति का प्रेम दिखती ,
फसलें फिर आह्लादित होकर
प्रकृति प्रेम का गीत सुनाती ,
नदियों की कल कल धारायें
कितने नाद यहाँ बिखरायें
और संस्कृति के मूल्यों ने
कितने भाव यहाँ सुलझाये।
यहाँ भाव विस्तार अनोखे
कितने लोग यहाँ चल आये।
सद्भाव यहाँ , समभाव यहाँ ,
करुणा ,शांति मिलाप यहाँ ,
भारत भूमि हमारी ,
भारत भूमि हमारी ।

3.शीत संजोकर ले आयी है

शीत संजोकर ले आयी है
उलझी और पुरानी यादें
बचपन में जलते अलाव
फिर चर्चा , कथा और गाथायें।
गावों में घंटों बैठक ,
आग किनारे चौपालों में ,
देश और दुनिया की बातें ,
किस्से धरम करम के।
प्रतिवर्ष शीत ऋतु आते ही
संस्कृति का गाथा क्रम चलता
ठिठुरन होती पाला पड़ता
पर विचार क्रम कभी न रुकता।
भारत की गाथा गाता ,
ग्राम नगर विस्तारों का
सन्देश सुनाता , शीत काल आता।

4. यह नमन क्षेत्र , यह कीर्ति क्षेत्र

यहाँ बात मन की आज़ादी
यहाँ पंथ विश्वास स्वतंत्र ,
यहाँ हज़ारों जीवन शैली
है सशक्त अपना गणतंत्र।

हमने यहाँ विविधता में
है अपनी शक्ति जानी ,
भारत के हर अवयव ने
राष्ट्र शक्ति की ठानी।

यहाँ हज़ारों भाषायें ,बोली शैली ,
संस्कार यहाँ पर गढ़े गये
चिंतन दर्शन मनन हुये
जन्म पूर्व से जीवन पर्यन्त।

यह भारत भूमि सजल भी है ,
सक्षम है यह समृद्धि कोष ,
यह नमन क्षेत्र , यह कीर्ति क्षेत्र
यह उर्वर विचार परिक्षेत्र।

5. यह भारत भूमि अनूठी

वर्षा में जन – मानस खुश हो
राग मल्हार सुनाते ,
और शीत में आग किनारे ,
जन मन जीवन दर्शन गाते।
यहाँ ग्रीष्म में यात्रायें ,
देशाटन कितने मंगलपर्व ,
यह भारत भूमि अनूठी
इसके कण कण में चमके हर्ष।

यहाँ सभी मौसम समुचित हैं,
यहाँ सभी संस्कृतियां घुलतीं।
यह हर्ष भूमि यह कर्म भूमि ,
यह स्वर्ग रूप यश भूमि।

6.भारत की धरती पर

यहाँ वीर गाथायें ,
यहाँ करुण गाथायें।
शांत भाव में चर्चा कितनी ,
कितनी श्रृंगार कथायें।

हर पल रंगत , हर पल चर्चा
भारत की धरती पर
यह उत्कर्ष सिखाती।
जीवन में सामंजस्य यहाँ
धर्म अर्थ संग काम मोक्ष के
जीवन के हर पहलू पर
कितनी रोचक मीमांसायें
यहाँ सजल गाथायें ,
यहाँ मृदुल गाथायें।

तर्क और विश्वास यहाँ हर पहलू पर ,
ध्येय और चिंतन की बातें हर पहलू पर।
हैं प्रत्यक्ष विश्वास सभी इस धरती पर
जीव जगत आत्मा की चर्चा अद्भुत ,
इस धरती पर।

7.राष्ट्र की संतान हम

अमृत सुवासित राष्ट्र की
अमृतमयी संतान हम ,
राष्ट्र की अतुलित धरोहर ,
देखते स्वाभिमान संग।
इस देश ने दर्शन दिये ,
कौशल दिये विज्ञान भी ,
ज्ञान का तो स्रोत है ,
सम्पूर्ण धरती के लिए।
राष्ट्र की पहचान हम ,
राष्ट्र की संतान हम
राष्ट्र का चिंतन हमेशा ,
हम बढ़ायें पूर्ण मन से
राष्ट्र का तो मान अब।

8.भारत भूमि वैभवशाली

विस्तृत है हर पटल उजाला
देश हमारा गौरवशाली ,
अनंत काल से इसकी गाथा
ऋषियों , मुनियों ने फैलायी।
आविष्कारों से ले दर्शन तक ,
हर क्षेत्र लिये अवदान हज़ारों ,
कहते हैं जब कभी जरूरत
पड़ी विश्व को आदि समय से
भारत का ही नाम पुकारा ,
है अनंत विश्वास विश्व को।
भारत के बंधुत्व भरे भावों पर
चमक रहा हर पटल उजाला ,
भारत भूमि वैभवशाली
देश हमारा गौरवशाली।

9.विश्व प्रेम की संस्कृति

रहें कहीं भी अवनि तल पर
रहे जागृत यश भारत का
भारत के गौरव विशाल का
भारत के हित का , मन का।
राष्ट्र भूमि के भाव सजाकर
हों नयी नयी वल्लरियाँ विकसित
नित प्रतिदिन संस्कृति मूल्यों का ,
रहे चले क्रम चलता प्रतिदिन।
कहीं रहें हम धरती पर ,
राष्ट्र रखें केन्द्रक सा हर दम ,
विश्व पटल पर छा जायें ,
विश्व प्रेम की संस्कृति लेकर ,
जो भारत में है शाश्वत उर्जित।

10.राष्ट्र प्रेम के अनंत पुंज

राष्ट्र प्रेम के अनंत पुंज
नित प्रतिदिन रहें प्रकाशित ,
कैसा भी हो तिमिर घना
या कहीं कुहासा रोपित।

जीवन का हर पग भर दृष्टि
संस्कृति ने कितने प्रतिमान बनाये
उन्हें धवल रख , पुंज मात्र रख
हम चलें निरंतर उर्जित।

सहस्त्र -सहस्त्र वर्षों से
है अपनी दृष्टि आलोकित
हमने मानवता हित चिंतन रत
विश्व किया सर्वदा प्रकाशित।

11.यह भीष्म प्रतिज्ञा का आँगन

यह राणा का भारत
यह गौरवशाली भूभाग हमारा ,
आतातायी को धुल चटाता ,
यह यश परिक्षेत्र हमारा।
ऋषियों मुनियों का यह तपस्थल ,
यांत्रिक विद्वज्जन के कौशल ,
जीवन के हर पहलू पर
सार्थक चिंतन , सम्यक चिंतन।
यह गौरवशाली भारत
बंधुत्व प्रेम का कार्यस्थल।
यह राणा प्रताप का भारत ,
यह राम कृष्ण , पांडव की धरती
यह भीष्म प्रतिज्ञा का आँगन।
यह गौरवशाली भारत
बंधुत्व प्रेम का कार्यस्थल।

12.उड़ा जो यश अपरिमित

यह उड़ा जो यश अपरिमित
यह राष्ट्र के शुभ कार्य
एक उर्जित खंड यह
विश्व में है दीप्त यह प्रतिमान।

शौर्य हो , निष्ठा , समर्पण ,
त्याग, कौशल , ज्ञान के हों भाव ,
कोटि फैली यहाँ लड़ियाँ ,
सन्देश भी अभिप्राय।

एक अविरल नीर धारा ,
दीप्त शब्दों में लिपि ,
इस राष्ट्र को शत शत नमन
इस राष्ट्र को प्रणाम।

13.हम भारतवासी

उत्तर से दक्षिण तक फैले
हर पग पर हैं तीर्थ हमारे
कितनी- कितनी गाथाओं को
लेकर चलते लोग हमारे।

आदि काल से हर दिन हम सब
कुछ मानक गढ़ते ही आये
हर कार्य हमारा मूल्य परक
सबने ही इतिहास बनाये।

जीवंत विश्व हित दृष्टि हमारी
संस्कृति भाव समग्र भरे ,
जागृत कण कण में प्रकृति हमारी
अपनी लिये विरासत हम भारतवासी ।

14.सृष्टि सृजन है इसी धरा से

प्रतिदिन ही कितने आमेलन
आशावादी भाव हमारे ,
जीवन में हमने रंग भरे
भाव , त्याग करुणा से प्रेरित ,
भारत भूमि श्रेष्ठ हमारी।

सृष्टि सृजन है इसी धरा से
इसी धरा से संस्कृति फैली
बन सुवास उन्नत भावों की
इतनी भाव विमायें फैलीं।
तर्क यहाँ सिद्धांत बने
दर्शन की वल्लरियाँ फैलीं।
जीवन दृष्टि जीव दृष्टि के
परम सत्य के कितने दर्शन।
जीवन उद्गम से लेकर
अवसान घड़ी तक ,
भारत भावों के अंतर्गत ,
कितने कितने लिये प्रयोजन
सम्यक हर पल लिये प्रयोजन ।

15.जहाँ धरा पर समरसता है

जहाँ धरा पर समरसता है
जहाँ प्रेम की अविरल धारा ,
पग पग पर यश गाथायें ,
करुणा ,श्रद्धा , ऊर्जा निर्मल,
उस श्रेष्ठ राष्ट्र की हम संतति
हम भारतवासी।

धरती पर जीवन के आदि चरण से
जहाँ सभ्यता उन्नत विकसित ,
जहाँ शस्त्र संग शास्त्रों की
शिक्षा दीक्षा की पद्यति विकसित
वह वंदनीय भारतभूमि
हम भारतवासी।

भारत की शक्ति से हम हैं ,
हम राष्ट्र श्रेष्ठ की एक कोशिका ,
चलें सदा यह भाव संजोकर
रखें संजोकर यही प्रवज्या।

16.जय भारत जय जननी के स्वर

जहाँ प्रकृति के उभय पक्ष
दें स्थिर खुशहाली का दर्शन ,
जहाँ परस्पर गले मिल रहे ,
प्रयत्न और आशा के स्वर ,
वह भारत की धरती
वहां शांति प्रयोग निरंतर
जय भारत जय जननी के स्वर ,
जय भारत , जय राष्ट्र प्रखर स्वर।
जिस पर कितने नाद स्वयं ही
प्रकृति सुनाती रहती यूँ ही ,
जहाँ मरुस्थल में भी कितनी
ऊर्जा दिखती शाश्वत स्थिर ,
वह भारत की धरती
सतत सृजन की भूमि उर्वरा।
जय भारत जय जननी के स्वर।
जय भारत जय राष्ट्र प्रखर स्वर।

17.तू योद्धा था तू योद्धा रह

तू योद्धा था तू योद्धा रह
ये भ्रामक रूपक तोड़ मोड़
राष्ट्र मना तू स्थिर रह
डैने अपने देख जरा
पंजे अपने देख तीक्ष्ण
तू गरुड़ श्रेष्ठ है बढ़ता जा।

पराक्रम कौशल दिखला दे तू
ये भूखे चमगादड़ लटके
अंधियारों के ये स्नेही
इनको है प्रकाश का भ्रम
ये चाहें जग को अपने सा
अपने को जरा बचाता जा ।
कर लक्ष्य विहित
संधान जरा,
बस आगे आगे बढ़ता जा
गरुड़ श्रेष्ठ, तू बढ़ता जा
नभ है तेरा , बल है तेरा
कौशल पराक्रम दिखलाता जा।

गीता का तू ज्ञान देख
सम्यक चिंतन बना गति
कर्म योग से हो प्रेरित
सत पथ पर तू बढ़ता जा ।

अंधियार चतुर्दिक दिखता है
संशय में राष्ट्र चीखता है
संशय के ये भाव त्याग
तन मन से तू बढ़ता जा।

नभ का विस्तार तेरा आंगन
कदम बढ़ा फैला डैने
तू कर स्वर गर्जित फिर कर तू स्वर
कर उड़ान, तू उड़ता जा !

18.सबरंग वैश्विकता हमारी

देखिये सबरंग वैश्विकता हमारी
देखिये राष्ट्र की स्वर्णिम धरोहर।

गर्व करिये राष्ट्र का ये महा वैश्विक धरातल
सोचिये इस राष्ट्र की क्षमता अप्रतिम।

ह्रदय के , इस राष्ट्र के ये पुत्र मानस
इस राष्ट्र पे है वंश इनका रहा पुष्पित।

ये हमारे पुष्प गण, ये हमारे बीज शैष्ठव
ये प्रकारांतर प्रदेशों में यशोजय कर रहे

ये हमारे शक्ति रूपक , ये हमारी कीर्ति हैं
ये ह्रदय में लिए थाती आँधियों के दीप हैं।

अश्वमेघी रुधिर भर ये वायु जल नभ में निरंतर
देश के वर्चस्व को इस देश के सन्देश को
कर्तव्यरत रह सर्वदा करते प्रतिष्ठित राष्ट्र को।

देखिये सबरंग वैश्विकता हमारी
गर्व करिये राष्ट्र की स्वर्णिम धरोहर।

19.आज़ादी के महायज्ञ में

यहाँ किसानों , मजदूरों ने
कर्मकार , कर्मशीलों ने
आज़ादी के महायज्ञ में
सम्यक अपनी समिधा डाली।

गावों गावों की पगडंडी
शहरों के हर चौराहे ,
आज़ादी की कथा कह रहे
आख्यान हृदय में रखे संजोये।

आज़ादी के स्तम्भों से ,
सीखें नितप्रति हम मूल्यों को ,
कैसे जीवन की आहुति दे
नव भारत के रूप बनाये।

स्वातंत्र्य समर इतिहास नहीं ,
यह अमरप्रेरणा की थाती है ,
यह हमको क्षमताओं की ,
आत्मशक्ति की बात बताती।

20.महादेश गौरव

हैं अनंत जलराशि लिये,
सीमाओं पर तीन उदधि ,
लिये हरीतिमा लहराती है ,
धरती वन कानन सुन्दर।

पावन जल से समृद्ध नदियां ,
राष्ट्र शिराओं सी स्थापित ,
भारत माँ की संसृतियाँ ,
महादेश गौरव से उर्जित ।

संस्कृतियों के उदय बिंदु से
कहीं न जाने कितने आगे ,
इस धरती पर मणिरूप रहा
आर्यावर्त हमारा स्थित।

इसके रज रज में आख्यानक
शौर्य , सत्य , करुणा , दर्शन के ,
शब्द ध्वनित है इसके सम्यक
ब्रह्माण्ड के विस्तृत हर कोने में।

यह राष्ट्र हमारा , हम इसके
हम इसके आदर्शों से प्रेरित ,
इसके प्रतिमानों से पोषित
इसके ही उर में स्थित।

21.हम अपनी थाती को देखें

हम स्वतंत्र तो हुये
पुराना अपना गौरव पाया ,
सदियों से जो छिना हुआ था ,
वह अपना वैभव पाया।
किन्तु रहेगा झिलमिल ही वह
यदि करें न हम उसका विश्लेषण
कितने कितने रूपों को
अरि ने कैसे रूप बनाया।

हम अपनी थाती को देखें ,
अपनी गौरव गरिमा देखें ,
इस महादेश के मूल्यों को
फिर से आगे बढ़ता देखें।

कवि परिचय-

प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह लखनऊ विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर हैं। वे अंग्रेजी और हिंदी लेखन में समान रूप से सक्रिय हैं । फ़्ली मार्केट एंड अदर प्लेज़ (2014), इकोलॉग(2014) , व्हेन ब्रांचो फ्लाईज़ (2014), शेक्सपियर की सात रातें (2015) , अंतर्द्वंद (2016), चौदह फरवरी (2019),चैन कहाँ अब नैन हमारे (2018)उनके प्रसिद्ध नाटक हैं। बंजारन द म्यूज(2008) , क्लाउड मून एंड अ लिटल गर्ल (2017),पथिक और प्रवाह (2016) , नीली आँखों वाली लड़की (2017), एडवेंचर्स ऑव फनी एंड बना (2018),द वर्ल्ड ऑव मावी(2020), टू वायलेट फ्लावर्स(2020) प्रोजेक्ट पेनल्टीमेट (2021) उनके काव्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने विभिन्न मीडिया माध्यमों के लिये सैकड़ों नाटक , कवितायेँ , समीक्षा एवं लेख लिखे हैं। लगभग दो दर्जन संकलनों में भी उनकी कवितायेँ प्रकाशित हुयी हैं। उनके लेखन एवं शिक्षण हेतु उन्हें स्वामी विवेकानंद यूथ अवार्ड लाइफ टाइम अचीवमेंट , शिक्षक श्री सम्मान ,मोहन राकेश पुरस्कार, भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार, डॉ राम कुमार वर्मा बाल नाटक सम्मान 2020 ,एस एम सिन्हा स्मृति अवार्ड जैसे सत्रह पुरस्कार प्राप्त हैं ।

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