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बाल साहित्य (नाटक) :गायब होती छाया-प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह

बाल साहित्य (नाटक) :गायब होती छाया-प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह

बाल साहित्य (नाटक) :गायब होती छाया

-प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह

बाल साहित्य (नाटक) :गायब होती छाया-प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह
बाल साहित्य (नाटक) :गायब होती छाया-प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह

पात्र

तीली : लोमड़ी
घंटी : बन्दर
शैलू : बन्दर
नाला : जंगली कुत्ता
दिवाकर : भालू का बच्चा

स्थान : जंगल

(जंगल में एक रास्ता। तीली लोमड़ी गिटार बजाती और गाने जाती हुयी चली जा रही है। गीत के स्वर हैं। )

तीली : (गीत )
भाग रहा है अपना जंगल ,
मिट गए कई निशान ।
अब है संकट हम पर छाया ,
गायब होती छाया।

(तीली के पीछे पीछे बन्दर भालू , हिरन आदि के बच्चे चल रहे हैं। उनमे कौतूहल है , यह जानने की जिज्ञासा है की क्या हो रहा है। अचानक बन्दर शैलू आ जाता है। )

शैलू : अरे तीली बहन , कहाँ जा रही हैं , आप ?

तीली : (खड़ी होकर शैलू को घूरती है। कुछ बोलती नहीं है। फिर गण गाते हुए चलने लगती है। शैलू उनके पीछे पीछे ही चलने लगता है। तालियां बजता हुआ। )
गायब होती छाया ,
गायब होती छाया।
नहीं समझते तुम सब देखो ,
आये दिन जो आते हैं ,
ये लिए जाल बंदूक हितैषी ,
नहीं जानते भाई लोगों ,
तुम इनकी कुछ माया ,
गायब होती छाया।

(शैलू अचानक कूद कर सामने आ जाता है। रास्ता रोककर कूदने लगता है। तीली चुपचाप खड़ी हो जाती है। शैलू कूद रहा है। वह गाता भी है। )
शैलू : अब समझे हम बहन कुल्हाड़ी !

घंटी : (हा -हा- हा ) शैलू भाई , ये बहन कुल्हाड़ी नहीं हैं ! ये तो तीली बहन हैं।

शैलू : ( खुश होते हुये)अरे चुप , मई कोई कुल्हाड़ी बहन को थोड़े ही कुछ कह रहा हूँ। मैं तो कुल्हाड़ी की बात कर रहा हूँ।

दिवाकर : अच्छा , शैलू चाचा कुल्हाड़ी की बात कर रहे हैं !

(तीली दिवाकर की ओर देखती है , मुस्कराती है और उसके सिर पर हाथ फेरती है। दिवाकर खुश हो जाता है। शैलू बहुत खुश लगता है। )
तीली : शैलू भी गण गाता है। मुझे बहुत अच्छा लगा यह जानकार !

शैलू : बहन , मैं सिर्फ अपने लिखे गीत गाता हूँ। आपको मालूम है ये बात ?

तीली : अरे वो तो बहुत अच्छा ! …..वैसे मैं रूकती नहीं , लेकिन आज हम सब लोग (बच्चों को सम्बोधित करते हुये ) गीत गायेंगे!। और जानते हो बच्चो , शैलू का लिखा गीत !

शैलू : अरे वाह , बहुत ख़ुशी हो रही है , मुझे ! अवश्य ! ये लीजिये मेरा गीत। (अलाप शुरू कर देता है। )

तीली : भाई रुक , थोड़ा रुक। नियम तो सुन ले।

शैलू : ( मुस्कराते हुये ) नियम यह है की गीत हमारे भावों को लेकर हो। हम पर्यावरण के गीत गायें। अपने जंगल , अपनी हवा , अपने पानी , अपने वन समुदाय की रक्षा के गीत !

नाला : हाँ -हाँ , भौं -भौं ! ऐसा नहीं क्यों !

(सभी लोग हंसने लगते हैं। )
दिवाकर : देखो नाला भी अपनी कविता सुनाने लगा।

तीली : बहुत अच्छी पंक्तियाँ हैं ,नाला की !

शैलू : वाह !
हाँ -हाँ , भौं -भौं !
ऐसा नहीं क्यों !

घंटी : अब नाला की पंक्तिया न पढ़ो , अपनी पंक्तियाँ बोलो , शैलू !

शैलू : घंटी तुम बीच में ही बजने लगे। थोड़ा ठहरो तो ! मेरी बात का अर्थ बिना समझे…

तीली : कुछ नहीं , कोई बात नहीं। तुम लोग समय नष्ट न करो , शैलू भाई।

शैलू : जी , बिलकुल ! ये रहा मैं , ये रहे मेरे गीत !

जंगल कटते रहते हैं यूँ ,
मिटते रहते चिन्ह हमारे।
खतरे में अब लगता जीवन ,
दिखे अँधेरा घिरता अक्सर ।
आये दिन शिकार को आते ,
चोरी कर लकड़ी ले जाते ।
जंगल उजड़ रहा है भाई ,
चलो प्रतिज्ञा करें अभी यूँ ,
इन्हे बताएं हम सच्चाई।
सभी के समवेत स्वर : वाह वाह ! बहुत अच्छा गीत ! भावों से भरा हुआ !

तीली : सच्चाई क्या !

शैलू : वन से ही तो उनका जीवन
मेरा जीवन , सबका जीवन।
सभी के समवेत स्वर : वाह वाह ! हम जरूर रक्षा करेंगे। अवश्य करेंगे ! रक्षा करेंगी अपने वन की। हम समझायेंगे मनुष्यों को , आने दो इस बार !

तीली : अच्छा ठीक है , चलो एक बार शैलू के गीत को समवेत स्वर में गाते हैं !

सभी के समवेत स्वर में गीत :
जंगल कटते रहते हैं यूँ ,
मिटते रहते चिन्ह हमारे।
खतरे में अब लगता जीवन ,
दिखे अँधेरा घिरता अक्सर ।
आये दिन शिकार को आते ,
चोरी कर लकड़ी ले जाते ।
जंगल उजड़ रहा है भाई ,
चलो प्रतिज्ञा करें अभी यूँ ,
इन्हे बताएं हम सच्चाई।
(सभी के चेहरों पर विजयी भाव हैं )


—- समाप्त —-

-प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह
(प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह लखनऊ विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर हैं। वे अंग्रेजी और हिंदी लेखन में समान रूप से सक्रिय हैं । फ़्ली मार्किट एंड अदर प्लेज़ (2014), इकोलॉग(2014) , व्हेन ब्रांचो फ्लाईज़ (2014), शेक्सपियर की सात रातें(2015) , अंतर्द्वंद (2016), चौदह फरवरी(2019) , चैन कहाँ अब नैन हमारे (2018)उनके प्रसिद्ध नाटक हैं । बंजारन द म्यूज(2008) , क्लाउड मून एंड अ लिटल गर्ल (2017) ,पथिक और प्रवाह(2016) , नीली आँखों वाली लड़की (2017), एडवेंचर्स ऑफ़ फनी एंड बना (2018),द वर्ल्ड ऑव मावी(2020), टू वायलेट फ्लावर्स(2020) उनके काव्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने विभिन्न मीडिया माध्यमों के लिये सैकड़ों नाटक , कवितायेँ , समीक्षा एवं लेख लिखे हैं। लगभग दो दर्जन संकलनों में भी उनकी कवितायेँ प्रकाशित हुयी हैं। उनके लेखन एवं शिक्षण हेतु उन्हें स्वामी विवेकानंद यूथ अवार्ड लाइफ टाइम अचीवमेंट , शिक्षक श्री सम्मान ,मोहन राकेश पुरस्कार, भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार एस एम सिन्हा स्मृति अवार्ड जैसे सोलह पुरस्कार प्राप्त हैं ।)

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