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बाल साहित्य (नाटक): प्रकृति राग-प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह

बाल साहित्य (नाटक): प्रकृति राग-प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह

बाल साहित्य (नाटक): प्रकृति राग

-प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह

बाल साहित्य (नाटक): प्रकृति राग-प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह
बाल साहित्य (नाटक): प्रकृति राग-प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह

पात्र

विशाली : गिलहरी
रोपा : बच्चा
मण्डूका : मेढक

(वृद्ध गिलहरी विशाली एक गीत गा रही है। आस पास बहुत से पशु पक्षी आ जाते हैं। सब सुनने लगते हैं। विशाली गिटार भी बजा रही है। गीत के स्वर हैं -)

चलने लगा पवन झकझोर
जहाँ रुके हो रहो सुरक्षित
जंगल में भी वर्षा शोर।
चार माह की होगी वर्षा
होगा जान मन हरषा -हरषा
पवन की देखो पकड़े डोर
चलने लगी वृष्टि झकझोर।

रोपा : वृष्टि क्या होती है , चाची ?

विशाली : वृष्टि का मतलब वर्षा होती है बच्चे।

रोपा : अरे वृष्टि का अर्थ वर्षा और वर्षा का अर्थ वर्षा , ये क्या विशाली चाची ?

विशाली : बच्चों , ऐसे शब्द को पर्यायवाची शब्द कहते हैं। पर्यायवाची शब्द !

रोपा : पर्यायवाची शब्द , अच्छा चाची जी ।

विशाली : आपको स्कूल में नहीं पढ़ाया गया आपकी पुस्तक में तो हिन्दी के पर्यायवाची शब्द भी दिये गये हैं। आपकी शिक्षक ने पढ़ाया भी होगा।

रोपा : हाँ पढ़ाया तो है शायद।

विशाली : बेटा , ये पढ़ने लिखने में शायद कैसा ? पढ़ाई में शायद नहीं लगाना चाहिये।

रोपा : नहीं नहीं चाची जी , बिलकुल ठीक कह रही हैं आप … मेरा कोई वैसा मतलब नहीं रहा।

विशाली : हाँ हाँ बेटा जानते हैं हम , आप बहुत अच्छे बच्चे हो !

रोपा : ( थोड़ा सा शरमा जाती है। ) धन्यवाद चाची जी।
(विशाली रोपा के मन की स्थिति समझ जाती है। और बात को बदलने का प्रयास करती है। )

विशाली : चलो , आपको ऋतू गीत सुनाते हैं।

(रोपा ख़ुशी से उछल पड़ती है। )
रोपा : (कूदती हुयी ) : हाँ -हाँ चाची जी। हाँ सुनाइये।

विशाली : लेकिन एक शर्त है बेटा , आप भी हमारे साथ गाओगे !

रोपा : क्यों नहीं आंटी , क्यों नहीं। यह तो मेरा सौभाग्य है।

विशाली : अच्छा ठीक है। बेटा जरा मेरा गिटार उठाना।

(रोपा गिटार उठा कर देती है। )
रोपा : ये रहा आंटी , ये रहा आपका गिटार… सुन्दर सा प्यारा सा गिटार ! (मुस्कराती है । )

विशाली : सुंदरवन से मंगवाया था इसे। हाँ अब यह न पूछना की सुन्दर वन कहाँ है। (दोनों हँसते हैं। ) अपनी भूगोल की पुस्तक में खोज लेना।

रोपा : जी , जरूर। मेरी शिक्षक भी कह रही थीं , की प्रश्नों के उत्तर स्वयं खोजने से बुद्धि का विकास होता है।

विशाली : तभी तो कहा। नहीं तो कह देते बंगाल में है सुंदरवन।

रोपा : (हंसती है ) चाची , आपने तो कह दिया ! (हँसते हुये) आपने बता दिया सुंदरवन कहाँ है !

विशाली : (मुस्कराते हुये ) कोई बात नहीं , कोई बात नहीं। फिर भी देख लेना आप। बच्चा ही तो है मेरा रोपा ! कैसे भी हो हर बच्चे को ज्यादा से ज्यादा बातें सीखनी चाहिये।

रोपा : जी

विशाली : ठीक है , अब हम दोनों गायेंगे ,साथ साथ !

रोपा : जी चाची जी !

विशाली : अच्छा बता वर्षा के बाद कौन सी ऋतु आयेगी !

रोपा : ठण्ड

विशाली : वैसे ऋतुएँ छह होती है ; शरद, शिशिर, शीत , हेमंत , बसंत , ग्रीष्म , वर्षा। लेकिन हम तीन ही मुख्य रूप से जानते है , और इन्हे मौसम कहते है।

रोपा : जी , जाड़ा , गर्मी , बरसात।

विशाली : शीत ऋतु , ग्रीष्म ऋतु , वर्षा ऋतु ! ऐसे बोलो मेरे बच्चे !

रोपा : जी

विशाली : तो ये गीत होगा ग्रीष्म ऋतु पर।

रोपा : आपने ने अभी अभी वर्षा पर गया था।

विशाली : तभी तो !

रोपा : जी -जी !

विशाली : तो मेरे संग गाओ।

(अचानक मण्डूका मेढक कूदता हुआ चला आता है। )
मण्डूका : आंटी हम भी , आंटी हम भी गायें ? मेरे पास एक छोटी ढोल भी है। (ये देखो )

(रोपा और विशाली दोनों हंसने लगते है। )
विशाली : हाँ -हाँ , क्यों नहीं , चल तू ढोल बजाना और गाना भी।

तीनो के समवेत स्वर :

ग्रीष्म ऋतु आयेगी ,
जब बसंत रूठ कर जायेगा ,
ग्रीष्म ऋतु आयेगी।
किरणें होंगी तेज़ सूर्य की ,
धरती ताप बढ़ायेगी।
पानी अमृत बन जायेगा
ग्रीष्म ऋतु आयेगी !

(अचानक मण्डूका रोने लगता है। )
विशाली : क्या हुआ ? बड़ा प्यारा बच्चा है मण्डूका !

रोपा : जी चाची , मण्डूका भैया यूँ ही रोने लगा !

मण्डूका : (सुबकते हुये) ग्रीष्म से बहुत डर लगता है आंटी।

विशाली : अरे इसमें रोने का क्या ? डरने की बात नहीं है मौसम से। मौसम के अनुसार अपने को ढलने की जरूरत है हमें , बच्चो।
मण्डूका : ठीक है आंटी ! वैसे आंटी ,मैं डर के मारे नहीं रोया , आप लोगों से बिछुड़ने के डर से रोने लगा। गरमी के मौसम में हम लोगों को हाइबरनेशन में जाना पड़ता है।

विशाली : कोई बात नहीं बेटे। सबके लिए प्रकृति ने कुछ न कुछ बनाया होता है।

(मण्डूका मुस्कराता है। )
विशाली : (रोपा से ) अब ये न पूछना , हाइबरनेशन क्या होता है। (तीनों हंसने लगते है। )

समाप्त

-प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह


(प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह लखनऊ विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर हैं। वे अंग्रेजी और हिंदी लेखन में समान रूप से सक्रिय हैं । फ़्ली मार्किट एंड अदर प्लेज़ (2014), इकोलॉग(2014) , व्हेन ब्रांचो फ्लाईज़ (2014), शेक्सपियर की सात रातें(2015) , अंतर्द्वंद (2016), चौदह फरवरी(2019) , चैन कहाँ अब नैन हमारे (2018)उनके प्रसिद्ध नाटक हैं । बंजारन द म्यूज(2008) , क्लाउड मून एंड अ लिटल गर्ल (2017) ,पथिक और प्रवाह(2016) , नीली आँखों वाली लड़की (2017), एडवेंचर्स ऑफ़ फनी एंड बना (2018),द वर्ल्ड ऑव मावी(2020), टू वायलेट फ्लावर्स(2020) उनके काव्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने विभिन्न मीडिया माध्यमों के लिये सैकड़ों नाटक , कवितायेँ , समीक्षा एवं लेख लिखे हैं। लगभग दो दर्जन संकलनों में भी उनकी कवितायेँ प्रकाशित हुयी हैं। उनके लेखन एवं शिक्षण हेतु उन्हें स्वामी विवेकानंद यूथ अवार्ड लाइफ टाइम अचीवमेंट , शिक्षक श्री सम्मान ,मोहन राकेश पुरस्कार, भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार एस एम सिन्हा स्मृति अवार्ड जैसे सोलह पुरस्कार प्राप्त हैं ।)

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