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 छत्तीसगढ़ी कहानी: मोर गाँव के माटी चंदन – डॉ.अशोक आकाश 

 छत्तीसगढ़ी कहानी: मोर गाँव के माटी चंदन – डॉ.अशोक आकाश 

छत्तीसगढ़ी कहानी: मोर गाँव के माटी चंदन

– डॉ.अशोक आकाश

जवानी के दिन कइसे गुजरगे पता नइ चलिस, एकक दिन तोला मासा बरोबर लागथे। बिहनिया उठते साठ तियार होके काम में जाना, संझा थक हारके आना, खाना अउ सुत जाना। महीना पूरे त पगार 

लेवतखानी सोंचे ला परे कि कइसे अतिक जल्दी एक महीना पूरगे। अइसने सालों साल बीतत जिनगी खुवार होगे। परिवार पालई-पोसई लइका मनके पढ़ई लिखई शादी बिहाव, अइसे तइसे जिनगी बुलकगे, उमर पूरगे, नौकरी ला पुरोके घर आयके बेरा लंघियात आगे।

          जिनगी बड़का शहर में किराया के घर में गुजारत बीतिस। परिवार के पालन पोषण के सरी जिम्मेदारी निभावत सकलाय रुपिया ला धरके गॉंव आयके सोचेंव, त बाई अउ बहू बेटा मन शहर में रेहे के जिद करदिन। मरेके पहिली मोर गॉंव ला देखे के सुध दिन रात लामे राहय। बाई चित्तू अउ नाती रिसू ला मना भुरियाके ऊँकरे संग मोर गॉंव के चंदन माटी के दरसन के सौभाग्य  मिलीस । मोटर ले मोटरा झोला धरके उतरत आँखी ले ऑंसू टप्पले गिरके कांक्रीट के सड़क में मोती छन्न ले बरोबर बगरगे। आज गजबे दिन के अगोरा में मोर गॉंव ला देखेके सुख मिलीस। 

          अदक जवानी में गॉंव ला छोड़के सोनहा भविष्य के लालच में नौकरी करेबर निकलगे रेहेंव। पेट बिकाली में इंहॉं ले उंहॉं भटकत लइका मनला पढ़ावत शहर मन मा किराया के घर में जिनगी ढरकगे। गॉंव ला छोड़के जायके पीरा मन में समाय राहय, फेर नौकरी के संसो में कभू गॉंव आयके बेरा नइ लहुटिस। परिवार के कतको अकन बोझा बोहे, लोग लइका नाती नतुरा के सबे जिम्मेदारी निभावत, घरू समान डोहारत आखरी बेरा अपन जनम भुईंयॉं में आयके सुख के बरनन करई बड़हेच मुसकिल बुता आय। 

        मोर डोकरा देहें मा नवा लहू के उबाल आगे हे, फुरती अमागेहे, तन मन में नवॉं जोश जागगेहे। गॉंव के गली मुहल्ला संगी संगवारी हाँसी ठट्ठा सबे एकक करके आँखी के आघू झलके ला धरलिस। नौकरी करके कतको रुपिया कमायेंव, धन परिवार के कतको मजा उड़ायेंव फेर गॉंव में गुजारे बचपना के एकक ठन किस्सा आज सुरता आवथे। जब शहर मा रेहेंव गॉंव के सुध आ जावत रीहिस तब मने मन में सोंचत राहँव मरे के पहिली मोर गॉंव एक पइत जरूर जाहूँ। मोर गाँव के चंदन माटी माथ में जरूर लगाहूँ। आज मोर वो सपना पूरा होगे। 

          मोटर मा बइठे सोंचत रेहेंव, मुरारी बड़ेददा तो अब नई जीयत होही, जेनहा चरबज्जी नंदिया में डुबकके नहाय अउ पीपर पेड़ के खाल्हे के शिवलिंग में पानी चढ़ाके हर हर गंगे गावत बेरा पंगपंगायके नेवता रोजके देवय। तेमा कभू कभू हमूँमन संघर जावन। महांजन, सदाराम, जालम, गंगाराम अउ बनवारी बबा के चीलम चॉवरा के बैटका मा संझा बिहने के हँसी मजाक में जिनगी के बड़ सुग्घर संदेशा राहय । चकमक पथरा अउ फुंड़हर पोनी ला ठोंकके सिपचाय नरियर बुच के आगी ला चीलम अउ तेंदू पाना के चोंगा में भरतखानी डोकरा मनके कान में पीपर पाना के तुतरू बजाके ओमन ला बेंझवा के मजा लेवई लइकुशहा मति में हमर मनके बड़का मजाक रीहिस, जेकर उहू मन मजा लेवय। सबे सियनहा मनके छोटे मोटे बुता मानइ हमर मनके जिम्मे राहय। 

        गउरी गउरा जगावत गउरा गीत अउ भगवान शंकर के बरात में आशाराम, सालिक, जालम, महासिंग, हीरा, जैपाल भैया संग बिहऊ अउ रामसिंग भॉंटो के सरी बेवस्था ऊपर पारखी नजर देखेके लइक राहय। देवारी तिहार में गोबर्धन खुंदायबर जावत डांग-डोरी के आगू आगू में देवता झूपत भगत मनला बिदबिदावत चमारसिंग बइगा के लट्टी नजरे नजर में झूलथे। राउत, ठेठवार मनके एकले बढ़के एक दोहा पारई, काछन चढ़ई सबे अइसे लागथे जइसे कालिच के बात आय। गंगाराम, अधीन, जीराखन, रतीराम, नरायन, खेदू , हिरदे, मदन, मंशा ठेठवार अउ डेरहा शिवभजन, मकुंद, लुड़गू अउ भुवन राउत मनके कौड़ी गूंथे बेशभूषा, पेड्री के आतले घुंघरू अउ फद-फदले अंजाय काजर, माड़ी दिखत धोती, लाल, हरियर, पींयर पगड़ी अउ छिटही बूंदी बंगाली का कहिबे देखेच देखेला भाय । महादेव भाँचा अउ जंगलू भैया के फटाका तो झन पूछ भुईयॉं ले अगास तक सबे देखैया मन कान बोजे देखते रहि जाय। पेलिक पेला बिगर देवारी तिहार देवारी कस नइ लागे। शीतला मैया में बइठे जोत जवारा  में माता सेवा गावत लादू , सतउ, चमरा कलार, रिखी, थनवार, दशरथ कका, अगरहिज, बल्दू राजाराम, डुगरू, देवार बबा अउ सोमनाथ, दुलारू भॉंटो के झूल-झूलके  ढोल, झॉंझ, मंजीरा बजावत माता सेवा, होली में फाग गीत अउ कुहकी मारके घूम-घूमके डंडा नाच ला का कहिबे तन मनला मगन करदेय। अइसने दशरहा बर रामलीला में राम दरबार मा सजे लछमन सीता हनुमान बनैया गोबल्ली, बंशी, अंजोरी, चुटू, रमेशर अउ शंकर भगवान बनैया मोर बड़े भैया के सौंहत भगवान के मूरती आजोले नइ भुलावथे। राम लीला के  गुमान अउ तुलसी भैया सन बियास में बैठे किरपा भैया के एहा ….. के सूर कान में गूंजत रहिथे, जेला देखेबर एतराब भरके मनखे मन बोरा धर -धरके आगू-आगू में जघा पोगराय बइठे राहय। भस्कइन डोकरी के झूम-झूमके *श्री राम आरती होवन लगे, भगवान आरती होवन लगे* गवई हा अइसे लागथे जइसे अभिनेच के बात हरे, जोक्कड़ बनके पेट रमंज रमंजके हॉंसे बर गुलाल, शोभा, भुवन संग अउ दुशियन भैया के कमाल के जोड़ी रिहीस हे। जगत भैया के रावन के दहाड़़ अउ परी बने ओकर बेटा गोपाल  के सुन्दरई आज तक नइ भुलाय हे। 

          गनेश पाख में रामधुनी गावत शिवराम दर्जी अउ ओकर रागी चेतन भैया के रो रोके शीत बसंत अउ सरवन कुमार के कथा सबे गॉंव भरके मनला रोवा डरे। अउ कतको रुपिया चढ़ावा में पपा डरे 

         सुरता के बादर में ननपन के घटे सबे चीज मन घुमड़त रीहिस। पानी बादर में माते चिखला गली, आठ-पाठ पूरा में नंदिया में तउंरई , जाड़ में चना खेत रखवारी करत अंगेठा अउ भूर्री तापई, कोठार बियारा में बेलन अउ गाड़ा के झाला बनाके सुतई, गरमी में डोमटा उपकतले नंदिया में डुबकई, तेवर घाम में आमा, अमली टोरई, गंगा अमली झर्रई,। मार पालथी मारके बासी खावत अमारी भाजी के संग गोंदली मिरी अउ नून के सुवाद  मरत ले नई भुलाय। कातिक महीना भर छुट्टी के दिन धान सीला बीनके गोड़ में रमंजके केंवटिन मुर्रा अउ भोक्का लाड़ू खवई, संगवारी मनके धुर्रा माटी में सनाय मैलाहा हॉत गोड़, चिरहा हाप पेंट में कबड्डी खेलई, गेंडी चढ़ई, रेस-टीप, डंडा-पिचरंगा, चंदा-बिल्लस, फोदा, गिल्ली-डंडा, हँसी ठिठोली , झगरा- लड़ई, पटकिक-पटका, पढ़ैया संगवारी मन संग बचपना के सबे खेल के एकक फोटू सौंहत दीखत रीहिसे, सोंचत रेहेंव जैसने गॉंव मा गोड़ मँड़ाहूं, मोर गॉंव के भुँइंयॉं में घोलंड जहूँ, हॉंत गोड़ वइसने सना जही, जइसने बचपना में सनाय राहय। कंडेक्टर  हा जब कोहंगाटोला वाले मन उतरो भैया कीहिस त मेंहा सपना ले झकनकाके जागेंव, लकर धकर उतरते साठ मोर गॉंव के माटी ला माथा में लगायबर हाँथ ला लमायेंव त लाल लाल माखुर वाले पाउच के ताजा ताजा थूक ला देखके आत्मा घुरघुरागे, मोर गॉंव के चंदन माटी में घोंडे के सबे सपना छरियागे त नाती टूरा अउ बाई के संग देखैया गॉंव वाले  मनके संघरा खी-खी,खी-खी हँसई ले लजा के हॉंत ला सकेल लेंव।  चारो मूँडा गॉंव ला देखके भरोसा नइ होवत रीहिस के इही मोर गॉंव हरे, परसार बरोबर लामीलामा प्रायमरी स्कूल टूटके ओकर जघा मा राशन दुकान बनगेहे, जेमेर फोकट में चॉंवुर लेवैया मनके मेला लगेहे, बगल मा कला मंच तेकर आघू बड़ेजन टीना के छतरी बने हे जेमा बड़ लम्हरी लोहा के एंगल जेमा दस पंदरा ठन पंखा भनन-भनन चलथे अउ ओकर खाल्हे में माढ़े कुर्सी मन में एको झन बइठइया नइ हे। 

        सरी मोटरा ला धरके छोटे भाई रग्घू घर पहुंचेन, हमनला देखके भाई बहू बड़ खुश होगे, पैलगी करिन तहॉंले सुख दुख खेती खार घर दुवार के गोठ करत चहा पानी पीयत जेवन के बेरा होगे। घर में खुशी के चहल पहल देखे के लइक रीहिस। संझा घरोघर छानी ले उठत धुआं, चनन-चनन साग भाजी भुंजई, बघारई के सोंध, गाय बछरू बैला मनके घॉंघरा, घंटी, खड़पड़ी के बजई मोला अब्बड़ सुग्घर लागिस । रतिहा घरोधी राहेर दार लाखड़ी भाजी संग सिंघी भॉटा के लपेटा, अथान संग पसोवा भात, अंगरी चॉंट चॉंट के खायेंव। 

            बियारी के बाद खोर डाहर छोटे भाई संग घूमेला निकलगेंव। मेंहा जानत रेहेंव मोर बाई चित्तू ला मोर गॉव एकोकनी बने नइ लागथे, नाक मुहूं सिकोड़त ओकर मन मा गॉव बर नफरत ला मेंहा जानत रेहेंव, फेर  ओला भी एक बेर मोर जनम भुईंयॉ ला देखाना रीहिसे। गॉव गली घूमके बॉचे संगवारी मन संग मिलके जब घर आयेंव, त मोर बाई चित्तू हा घर के बाहिर परछी के ऑट में मुहूं फुलोय बइठे राहय। 

में हा पूछेंव_ तें कइसे बाहिर में बइठे हस? 

वो कीहिस_ तोला का करना हे! तोर साध तो पूरा होवथे ना अपन गॉव आयके। 

में केहेंव_  का के दुख हे तोला? 

वो कीहिस – ‘तें इहँचे रेहे रा हमन काली घर जाबो  कइसे रिसू’

        संग में आये पॉंच साल के नाती ओकर गोदी में बैठे, तोपाय अँछरा ला टारके कीहिस_ ” हाव दादी हमन इहॉं नइ राहन,  काली घर जाबो।”

में एक्कनी गुसियाके केहेंव _ काबर अइसन काहथस?

काबर नइ कहूं, पोरपिर-पोरपिर गाय बैला गोबर करथे, बछरू नरियाथे, बस्सई अउ घंटी घॉंघरा में हमर नीन्द नई परे, हमन काली जाबो घर। 

वो एक्के सॉंस में अपन अंतिम फैसला सुना दीस। ओकर सरी फैसला पथरा के लकीर होथे में जानथों, जेला कहिथे तेकर ले माशा भर टस के मस नइ होय। जतिक मया में ओला समझाबे ओतका ओकर रिस बाढ़त जाथे । ए दारी में सोंच डारे रेहेंव, वो जाही ते जाय मोर गॉंव के माटी चंदन आय मेंहा मोर माटी महतारी ले दुरिहा नइ जॉंव।

              लेखक

          डॉ.अशोक आकाश 

       ग्राम कोहंगाटोला बालोद 

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