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छत्‍तीसगढ़ी लोक विधा-‘करमा’-सुरेश कुमार रावत

छत्‍तीसगढ़ी लोक विधा-‘करमा’-सुरेश कुमार रावत

करमा ले परिचय-

हमर छतीसगढ़ ह कतको गीत नाच अउ साज ले सजे हे इहि परंपरा म करमा नृत्य घलो बहुतेच परसिध हबे। करमा एक तरह ले मनखे के जिनगी के करम भाग ले उपजे हे, काबर कि हमर सियान मन पहली जब कमाय-धमाय बर खेती खार म जाय त उकर करा कोनो मनोरंजन के साधन नई राहत रहिस तब ओमन अपन थकान ल दूर करेबर गीत गुनगुनावे आउ अपन किस्मत ल सहराय कि हे भगवान जेन काम-बूता हमन करत हन  तेकर फल ल अच्छा देबे। कतकोंन सियान मन एक तरफ बताथे कि धीरे धीरे लोगन म प्रचलन बढ़त गीस तहाँ ले ईहा एक अलग रूप ले लिस। त दूसर तरफ यहां कोनो  कथा में आधारित हाबे। पहिली के सियान मन प्रकृति ल देवता के रूप म देखय त पेड़ जईसे करन, साल, सगोन, बर, पिपर, कउहा, सरई, साजा म कुल देव ईस्ट देव के वास जानय ते पाके ओमन एखर पूजा पाठ करय। 

करमा कइसे पैदा होइस, येखर किस्‍सा-

कहूँ कहूँ सुने म आथे कि राजा करमसेन रिहिस तेंन ह धन-धान्य ले संपन्न रहिस ओखर समृद्धी ला देख के पड़ोसी राजा मन हमला करके ओखर राज पाठ ल छीन लिस त बियाकुल होके ओहा करन पेड़ करा गीस त ईहा भगवान ल गोहराईस त भगवान के किरपा ले ओखर राज़ पाठ वापस मिल गीस तब ले राजा ह रैय्यत के जवान टुरि टूरा मन ल पूजा म शामिल कर दिस तबले ये परंपरा के रूप म फैलगे।

करमा जिंनगी के आधार आय-

कर्मा केवल एक नाच गान नोहय येहर जिनगी के आधार आय। ये गीत अउ नाच मे लोक परंपरा छुपे हाबय जईसे की–

  1. मोला जावन दे न रे अलबेला मोर अटेक बेरा होंगे मोला जावन दे ना। 
  2. साटी रे साटी बगई साटी उदल राजा घोड कुदावय बाजय घाटी। 
  3. उड़ती चिरैय्या ल गोली म टिपे रे। 
  4. सेवा मे अकेली आयेव सेवा म अकेली आयेव न  शिव के मंदीर के दुवार सेवा म अकेली आयेव न “

ऐसने कतकोन कर्मा गीत हे जेन्हा मनखे के जिनगी ल आगु चलाय मे सहायक हाबे ।

करमा के संबंध करम ले हे-

जब लोगन मन करम करय  त मेहनत के हिसाब से फल के प्राप्ति नई होवाय त अपन भाग (करम) ल सहरावय पहलीच बतायेव कि करमा ह करम आधारित हे काबर् कि करम करना अपन हाथ हे अउ फल देना उपर वाले के हाथ म हे त हमला सीरिफ करम म ध्यान देना है। खेती खार के निंदाई कोडाइ बुआई ,टोराइ, मिन्जे कोड़े के समय मनोरंजन के साधन ह परब विशेष के रूप लेवत गीस अउ धीरे धीरे लोक म रच बस गे तब  ले ये हा सरलगहा चलत आवत हाबे, एकर सुरुवात कब ले होय हे ये कहना मुश्किल हे, फिर भी बुता काम ले ही येकर उत्पति माने जथे। 

करमा के पहनावा-

कर्मा नृत्य म कोनो बाहरी साज सजावट के जरूरत नई हे जेन स्थानीय क्षेत्र म उपलब्ध रईथे तेन ह सिंगार रूप म धारण करथे।   धोती, कुर्ता, पागा लुंगी, कलगी, लुगरा, पोलखर, पहुँची, सुता, हरैय्या, बाहकर, कहे के मतलब जेन ल दिनचर्या म बहुरथे तेंन ह ये नृत्य म सिंगार के काम आथे। 

करमा नाचे के ढंग-

 मांदर, मंजरी, झांझ, मंजीरा, टीमकी, त कहु कहु बासुरी मोहरी घलो वाद्य यंत्र मे शामिल रेथे। गोल घेरा म , कतार म आगु पिछु, आजु, बाजू, सुविधा के हिसाब ले ये नृत्य ल करे जथे। जदातार बजैया मन के सामने म नचैया मन रेथे। लड़की अउ लड़का मन के अलग अलग कतार होथे। जोड़ी जोड़ी घलो नाच्थे कहे के मतलब जगा अउ परब के अनुसार  नृत्य ल कोनो भी वर्ग के मन एमा शामिल रीथे। फेर आदिवासी गोंड, मुडिया, ऊराव, देवार, भईहार, मन ले येखर सुरुवात माने गेहे। आदिवासी मन के येहा खास धरोहर हरे।

करमा के प्रचलित शैली-

छत्तीसगढ़ मे कर्मा के कई शैली प्रचलन म हाबे, तिर तिखार के पड़ोसी जिला जैसे मंडला म घलो ये ह प्रचलित हाबे –

माड़ी करमा-

माड़ी करमा बस्तर अंचल  के अबूझमार् म दंडामि माड़िया जनजाती द्वारा करे जथे ये ह बिसेस रूप ले माईलोगीन मन के नृत्य हरे, बाजा, गाजा के अभाव रेथे एला पाता करमा भी कैथे एला सामाजिक परब या शुभ कार्य के समय करे जथे। ये हा नंदवात् हे एमा नायिका ह नायक करा बाजार ले साज सिंगार के सामान ल मँगाथे। 

भुइहारि करमा-

एला बिलासपुरीहा करमा घलो कैथे काबर् की भुईहार जनजाति ईहि जिला म निवास करथे। कार्तिक महिना म धरम देवता के  परब म करे जथे। ईकर  मान्यता हे की धरम देवता ह करम पेड़ म रेथे तेकरे सती पूजा अर्चना ले जिनगी के निस्तारी धान – धान्य, फूल- फल ले जीवन सुखमय होथे फसल काटे के समय घलो ये नृत्य ल करे जथे। भुईहार कर्मा म मांदर के ताल लय म आकर्षक गीत के साथ साथ नृत्य करे जथे। 

देवार करमा-

घुमंतू जाती के रैन बसेरा भुइय्या जाती देवार हरे ये मन तम्बू तान के रेथे अउ एक जगह ले दूसर जगह घूम घूम के तीज तिहार के अवसर म गाँव गाँव म नृत्य करथे गाथे बजाथे। हरेलि, पीटर, पाख, छठ्ठि, बरही, जंवारा, होली, बर बिहाव के समय म उत्साह बढ्ढावत मनोरंजन करथे। देवार कर्मा ल देवार मन बैसाख के अक्ति (अक्षय तृतीया) ल शुभ मान के ये बखत नृत्य करथे। देवार जाती मन के बद आकर्शक होथे खिनवा, बाली, टिकलि, गला म हर्मल सुरा, मोती माला, बाह म नाग मोरी, हाथ म हरैया चूड़ी, कमर मे करधन, अउ पाऊँ म बिछिया माईलोगन मन पहिरथे त पुरुष मन धोती कुर्ता ,साफारि, चुड़ा, पहिन् थे, एकर संगीत ह मनमोहक होथे। लोगन मन बर्बस खिचे चले आथे।

करमसैनी करमा-

राजा करमसेन के कथा म आधारित कर्मा हरे ओखर राज पाठ लुटे के बाद फेर मिले ले ओखर परजा मन गुनगांन करत गाथे बजाते अउ नाचथे। 

गोंडी करमा-

गोंड जाती मन के दुवारा करे जाने वाला कर्मा हरे। 

पहाड़ी करमा-

पर्वत पठार, जंगल- झाड़ी, म राइहैय्या जनजाती मन ये कर्मा ल जीवित रखे हाबे। गाजा- बाजा, पारंपरिक रेथे। 

बिरम करमा-

पांच भाई के एक दुलउरिंन बहिनि के जीवन चरित्र ले आधारित कर्मा हरे जैसे बिछोह के पीड़ा ल देवार जाती के मन करमा मे वेदना के सुग्घर गीत। गोड के उपजाति गावत- गावत नाच्थे त लोगन मन ये बिरह रस डूबके आनंद लेथे। 

तलवार करमा-

कलगी ल मुड़ी म बांधे हे मनमोहक ढंग ले कतार म प्रस्तुत करे जथे ये ह घलो तेज़ पसंद  करे जथे। देखत देखत लोगंन मन नई आघाय।

कलसा करमा –

मुड़ म मटकी  राख के लचकात एक दूसर के हाथ के इशारा ले करे जाने वाला कर्मा नृत्य हरे।ये कर अलावा लचकी करमताल, जैसे कटकोंन कर्मा नृत्य होथे फेर एक दर्जन ल पर्मुखता बताथे।ये तरह ले एक जाती समूह के नई होके पुरा समाज के नेतृत्व करैय्या नृत्य हरे।

करमा के देश-विदेश म ख्‍याती-

आज के समे म कैय्यो लोकगायक, लोकनर्तक, वादक है जेन मन कई तरह ले गा बजाके अऊ नाच के एला जगाय हाबे जेन ह हमर छत्तीसगढ़ के साथ -साथ देश -विदेश म बगरगे हाबय।

 -सुरेश कुमार  रावत
 परसवानी( हिरमी)
  सिमगा (बलौदाबाजार) छ  :ग 493195 
मो 9691352455

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2 responses to “छत्‍तीसगढ़ी लोक विधा-‘करमा’-सुरेश कुमार रावत”

  1. Surta Avatar
  2. cdsharma Avatar
    cdsharma

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