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धर्मेन्‍द्र निर्मल के छत्‍तीसगढ़ी व्‍यंग्‍य-बाढ़ ले आये बढ़वार

धर्मेन्‍द्र निर्मल के छत्‍तीसगढ़ी व्‍यंग्‍य-बाढ़ ले आये बढ़वार

बाढ़ ले आये बढ़वार

धर्मेन्‍द्र निर्मल के छत्‍तीसगढ़ी व्‍यंग्‍य -बाढ़ ले आये बढ़वार
धर्मेन्‍द्र निर्मल के छत्‍तीसगढ़ी व्‍यंग्‍य -बाढ़ ले आये बढ़वार

छत्‍तीसगढ़ी व्‍यंग्‍य-

बाढ़ ले बढ़वार

असाड़ बुलक गे सावनों निकलइया हे लपरहा बादर हा घुम घुम के भासन दे दे के रहि गे। बिजली घलो दू चार घॅव मटमटाइस । किसान मुहू फारे उप्पर डाहर ल देखत बोमियावत हे – गिर भगवान गिर। उप्पर वाले भगवान ह भुइया के भगवान ल फेर एक घव बेकुफ बना दिस। बेकुफ का बनाए बर लगही किसाने खुद बेकुफ हे। सरकार ह बोर कोड़वाय के मसीन निकाल देहे। मरहा खुरहा किसान के नान मुन डोली डांगर खेत खार ल खनके नाहर बना दे हे त तुम उप्पर वाले ल काबर सुमरौ सोरियावौ। बोर नई कोड़वाय सकव।

सरकारी रिन लेय बर थोक बहुत कमीसन के जुगाड़ करलौ। भगवान ह हरेक मनखे के मनौती ल मानत रहिही तब तो जउॅहर हो जाही। बरोबर के ल बरोबरे वाले सुनथे देखथे। तुॅहर बोमियाये ले कुछु नई होवय, चुचुवावत रहव। सरकार जब देखिस पानी नई गिरत हे त चारों मुड़ा सुख्खा घोसित कर दिस। चारा के बाढ़ ल आवत देख बाबू करमचारी मन के मुह पनियागे। नवा नवा योजना कागज म दउडे लगिस।

झिल्ली म तोपाय ढकाय छानही वाले सरकारी आफिस मे एक टांग टुटे रेचेक रेचेक बाजत खुरसी म ईटा टेका के बइठ के, जनम के बिमरहा खेर खेर करत पंखा के हवा लेवत हुसियार बाबू ह योजना तैयार करथे। जेकर फयदा जनता अउ सरकार ल होवय चाहे झन होवय बाबू अउ ठेकादार ल बजूर होथे। ओइसने म बादर ल लहरावत देख बाबू करमचारी मन के थोथना ओथर गे। उ मन ल सरकारी खजाना के नई बरसे ले अपन थइली म अकाल परे के डर समा गे। उही समे रदरद-रदरद अतका पानी गिरथे के नदियॉ नरवा डबरा ढोडगा सबो कोती पानीच पानी होगे। किसान फेर चुचवाये लगिस। किसान पानी नई गिरय त टेटक के मरथे अउ बरसथे त सबे बोहा जथे। माने टेटकना-अटकना चुहना-बोहाना खुरचना मरना किसाने के भाग म होथे।

किसान तरूवा धर के बइठ गे- बस कर भगवान। बाबू करमचारी मन हुमन हवन करवइन-बाढ़ आना चाही। बरोबर के ल बरोबरे वाले सुनथे देखथे। बाढ़ आगे। जगहा जगहा घर फुटे लगीस, कतको मरे बरोबर जीयत मनखे मन मलमा म दब दब के मर गे। आसरा के मोटरा धरे ल पोटारे मनखे मन धारे धार बोहाय लगिन। सरकार देखीन के बाबू करमचारी मन के आसरा के बांध म सपना के पानी ह टोम टोम ले भर गेहे त सरकारो हॅ भरस्टाचार म भरे खजाना के बांध के गेट ल खोल दिस। बांध के गेट खुलीस के दु चार मनखे फेर बोहागे। बन्ने होइस। ओमन जियत रहितीन त सरकार के आघु म अडियाके खडा़ हो जातिन- राहत रासि दे, छतिपुरती कर। अब उकर राहत रासि अउ छतिपूरती के पइसा म बाबू करमचारी मन ल राहत मिलही।

उमन इखरे पइसा म कलम के नांगर जोंत नवा फसल उगाही अउ हुकड़ हुकड़ के खाही। बाबू करमचारी जम्मो गरीबी रेखा के रूनियाये चांउर वाले बोरा ल खाली कर दिन अउ खजाना के पइसा ल बोरा म भर भर के एती उती कार दउडाये लगिन। दु कोस के जगहा म बाढ़ के सेती घुम के चार कोस जायेबर परे तेखर कारण कार म दु के जगहा दस लीटर पिटरोल भरवइन। राहत सिविर म डोकरी ढाकरी मन के जुन्ना झेंझरा लुगरा के पाल तानिन अउ मोटहा कपडा़ (कनात) के जगहा पिलास्टिक पाल के बिल बनवईन। मलमा म दबे मरे मनखे मन ल निकाले बर पारा परोस के मनखे मन ले सहयोग ले गयीस। ओ मन मजुरी के जगहा पेपर म अपन गांव के, घर के नाव छपे देखे के आसरा भर पाइन। सही हो गे गा।

पेपर म गांवे भर के नाव रहिस ताहिन जम्मो जगह साहेब बाबू करमचारी मन के बडे़ बडे़ टेड़ाये मेछा के बीच बटरेंगवा-बटरेंगवा आंखी वाले फोटू देखे बर मिलिस। राहत सिविर मन म जा जाके साहेब बाबू मन नड्डा, मुरकू अउ मिच्चर बांट के तार दिन अउ पउस्टिक अहार, खाना के पाकिट, सेव, केरा के बिल बना के अपन मन परवार सहित पगुरावत तर गे। जघा जघा बाढ.साहेता दल बनगे। जेमन सरकार अउ समाज दूनो जघा ले चंदा चॉदी रपोटिन। सरकार हवई जहाज म चढ के बाढ़ के उपर ले उढावत देखिन अउ अनभो ले लगिन के बोहावत मनखे कइसे दिखथे, मरत मनखे के आसरा उखर आंखी म कतेक पन चमकथे। उड़त उड़त सरकार के नजर पेड़ म चघे मनखे के उपर जा परिस।

डोर ल ओरमा दिस – धरबे त धर, नहि ते धारे धार जा। मनखे डोर ल धर के उपर चढ़ गे अउ बाच गे। ओला देखे – देखाये बर सरकार ह बंगला म ले गे। अपन खुरसी म बइठ ओला बाजू म खडा़ करके फोटु खिचवइन। पिछु जुवर बाबू करमचारी मन घला पारी पारी ले ओ मुरझुठहा मनखे संग फोटू खिचवइन। फोटू के खिचावत भर ले देखउटी मुस्कावय। अउ मने मन गारी देवय – जी के तै ह अपन नाम के राहत रासि ल कटवा दिये रे चंडाल। माने हमरो थैली ल काट दिये। मरहा मनखे सरकार साहेब बाबू करमचारी सबो के गिध दिरिस्टी ल पढ़ डारिस। वो ह थोथना ल ओरमाये अइसे खडे़ रहय जइसे बडे़ घर के बने बने पहिरे ओढे लइका मन के बीच चोरी करत पकडाये नंगरा घर के लइका ठाढ़ नंगरा खडे़ हे। अब देखहु आफिस के दुवारी मन म नवा नवा गाड़ी के फूल, फूल जाही। साहर नगर म साहेब बाबू मन के बंगला गोल्लर कर हुकडत अडियायें लगही। कुल मिलाके बाढ़ ले आये बढवार – पइदावार अब दिखे लगही- चक, चकाचक।

-धर्मेन्‍द्र निर्मल

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