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छत्‍तीसगढ़ के तिज तिहार भाग-4: आठे कन्‍हैया -रमेश चौहान

छत्‍तीसगढ़ के तिज तिहार भाग-4: आठे कन्‍हैया -रमेश चौहान

पाछू भाग- छत्‍तीसगढ़ के तिज तिहार भाग-3: कमरछठ-रमेश चौहान

छत्‍तीसगढ़ के तिज तिहार भाग-4: आठे कन्‍हैया (कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी)

-रमेश चौहान

आठे कन्‍हैया

छत्‍तीसगढ़ के तिज तिहार भाग-4: आठे कन्‍हैया (कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी)-रमेश चौहान
छत्‍तीसगढ़ के तिज तिहार भाग-4: आठे कन्‍हैया (कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी)-रमेश चौहान

आठे कन्‍हैया (कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी)-

भारतीय संस्‍कृति राम अउ कृष्‍ण के रंग ले रंगे हे । जिहां राम ल मर्यादा पुरूषोत्‍तम कहिके व्‍यवहारिक माने जाथे, ओखर चरित्र ल जीवन मा उतारे जाथे, ऊँहे कृष्‍ण ल सर्वशक्तिमान, अनादि पुररूषोत्‍तम के रूप म जाने जाथे । फेर भगवान कृष्‍ण के बाललीला भारत के माटी के, अउ लोगन के रग-रग म समाये हे । ऐही पायके भगवान कृष्‍ण के जनमदिन ल कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी के रूप म पूरा भारत देश म मनाए जाथे । छत्‍तीसगढ़ म एला आठे कन्‍हैया या केवल जन्‍माष्‍टमी के नाम ले मनाए जाथे ।

आठे कन्‍हैया श्रद्धा अउ विश्‍वास के तिहार –

भगवान कृष्‍ण के बाल लीला देख के भगवान माखन चोर, बांके बिहारी के नाम ले जाने जाथे । भगवान कृष्‍ण के कहे गे गीता हमर देश के धरोहर आय । ये सबो रूप म भगवान कृष्‍ण जर्नादन, जगत नियंता के उपाधी देके ओखर ऊपर विश्‍वास करे जाथे के जब-जब धर्म के हानि होते भगवान ए धरती म कोनो न कोनो रूप म जरूर अवतरथें । भगवान अपन हर अवतार म अधर्मी दुष्‍टमन के संहार करके धर्म अउ भगत मन के उद्धार करथें । निरबल के बल श्‍याम कहिके कृष्‍ण ऊपर श्रद्धा करे जाथे । ए प्रकार भगवान कृष्‍ण के जनमदिन के तिहार श्रद्धा अउ विश्‍वास के तिहार आय ।

भगवान कृष्‍ण जन्‍म के कथा-

द्वापर युग म जब कंस जइसे अत्‍याचारी मन के अत्‍याचार बाढ़ जथे त देवता, मुनी अउ धरती भगवान बिष्‍णु ले मुक्ति के गोहार करथें । उन्‍खर गोहार ल सुन के भगवान उन्‍हला अवतार लेके आश्‍वासन देथें । कुछ समय बाद जब कंस अपन बहिनी के बिहाव वसुदेव संग करके बिदा करत रहिथे ओतके बेरा आकाशवाणी होथे के देवकी के आठवां टूूरा तोर काल होही । अतका ल सुन कंस देवकी ल जान से मारे ल दउड़ीस वसुदेव कंस ले निवेदन करिस के काल तो एखर लइका हे न देवकी त नहीं । मैं वचन देत हंव के देवकी के सबो लइका तोला सउप देहूं, तोला जउन करना होही कर लेबे । ए आश्‍वासन के बाद देवकी-वसुदेव ल कंस अपन कारागार म बंद करा देथे । समय अनुसार जब देवकी के लइका होथे त एक-एक करके ओखर सबो लइका ल मार डरथें । आखिर म भादो अंधियारी पाख के आठे के दिन भगवान कृष्‍ण के जनम होथे ।

भगवान कृष्‍ण के जनम कथा के गीत-

भादो के महीना, घटा छाये अंधियारी,
बड़ डरावना हे, ये रात कारी कारी ।

कंस के कारागार, बड़ रहिन पहरेदार,
चारो कोती चमुन्दा, खुल्ला नइये एकोद्वार ।

देवकी वासुदेव करे पुकार, हे दीनानाथ,
अब दुख सहावत नइये, करलव सनाथ ।

एक-एक करके छै, लइका मारे कंस,
सातवइया घला होगे, कइसे अपभ्रंस ।

आठवइया के हे बारी, कइसे करिन तइयारी,
एखरे बर करे हे, आकाशवाणी ला चक्रधारी ।

मन खिलखिलावत हे, फेर थोकिन डर्रावत हे,
कंस के काल हे, के पहिली कस एखरो हाल हे ।

ओही समय चमके बिजली घटाटोप,
निचट अंधियारी के होगे ऊंहा लोप ।

बिजली अतका के जम्मो के आंखी-कान मुंदागे,
दमकत बदन चमकत मुकुट, चार हाथ वाले आगे ।

देवकी वासुदेव के, हाथ गोड़ के बेड़ी फेकागे,
जम्मो पहरेदारमन ल, बड़ जोर के नींद आगे ।

देखत हे देवकी वासुदेव, त देखत रहिगे,
कतका सुघ्घर हे, ओखर रूप मनोहर का कहिबे ।

चिटिक भर म होइस, उंहला परमपिता के भान,
नाना भांति ले, करे लगिन उंखर यशोगान ।

तुहीमन सृष्टि के करइया, जम्मो जीव के देखइया
धरती के भार हरइया, जीवन नइया के खेवइया ।

मायापति माया देखाके होगे अंतरध्यान,
बालक रूप म प्रगटे आज तो भगवान ।

प्रगटे आज तो भगवान मंगल गाओ,
खुशी मनाओ भई आज खुशी मनाओ ।

ये गीत के विडियो रूप देखव-

आठे कन्‍हैया गीत – भादो के महिना

आठे कन्‍हैया मनाये के रीति-

आठे कन्‍हैया के दिन लोगन उपवास करथें । ये दिन रात के 12 बजे तक लोगन बिना कुछ खाए भगवान के जनम के समय के अघरा म रहिथें । मंदिर देवालय म भजन कीर्तन करथें । रामचरित मानस म कहे गे हे-

तपबल रचइ प्रपंचु बिधाता। तपबल बिष्नु सकल जग त्राता॥
तपबल संभु करहिं संघारा। तपबल सेषु धरइ महिभारा॥

मतलब तप क बल ले ब्रह्मा सृष्टि के रचना करथे, तप बल ले बिष्‍णु जगत के पालन करथे अउ तप बल के प्रभाव ले ही संभु जगत के संघार करथे । कुल मिला के तप मने तपस्‍या अपन तन ल त्रास करना तकलिफ देना । तन मन के अच्‍छा शक्ति ल बांधना, ऐखरे छोटे रूप उपास आय । ऐही पाय के छत्‍तीसगढ़ सहित पूरा भारतीय संस्‍कृति के भूमि का तिहार-बार म घला उपास रहे के नियम हे । ”जतका शक्ति, ततका भक्ति’ लोगन अपन शक्ति सामर्थ्‍य के अनुसार उपास रहिथें बहुतझन रात 12 बजे तक कुछ खावय पीयंय नहीं त बहुत झन दिन बुड़ीस तहां अपन उपास के परायण कर लेथें ।

आठे कन्‍हैया लोकचित्र बनाना-

आठे कन्‍हैया म उपास के परायण मन उपास टोरे के पहिली भगवान कृष्‍ण के पूजा-पाठ करे जाथे । पूजा-पाठ करे बर अपन देवता कुरिया म आठे कन्‍हैया के चित्र बनाए जाथे । आठे कन्‍हैया बनाए बर आठठन पुतरा के रूप ल कट-मट के आकृति म लिखे जाथे ओखर ऊॅपर म गोल के मुड़ी बनाए जाथे, कट-मट ले डेरी कोती लकिर खिंचत गोला म मिला दे जाथे जउन अइसे लगथे के अपन हाथ ल मुड़ म रखे हे अउ जेउनी कोती कट-मट के ऊँपर ले आधा भाग तक लकीर खिंच दे जाथे, ऐ ह अइसे लगथे जइसे अपन हाथ ल कनिहा म रखे हे । अइसने चार-ठन ऊँपर म चार ठन नीचे म बनाये जाथे अउ एखर चारो कोती डब्‍बा बना दे जाथे अउ ए डब्‍बा के ऊॅपर आठे कन्‍हैया अउ नीचे दिन तारिख लिख दे जाथे ।

आठे कन्‍हैया लोकचित्र
आठे कन्‍हैया लोकचित्र

वास्‍तव म ए आठ ठन पुतरा मन देवकी के आठों लइका के रूप आय जेमा सात लइका ल कंस ह मार डरथे अउ सबले आखिर म आठवा संतान के रूप भगवान जनम लेथे एही पाएके ऐला आठे कन्‍हैया कहे जाथे ।

झूलना लगाना-

जेन प्रकार घर म कोनो लइका होथे त ओखर बर झूलना के व्‍यवस्‍थ करे जाथे अउ ओ लइका झूलना म सोवा के झूलाय जाथे ओही प्रकार अपन भाव ल व्‍यक्‍त करे बर भगवान के जनम बर झूलना लगाए जाथे । मंदिर-देवालय म अपन-अपन घर भगवान बर अपन श्रद्ध अउ शक्ति के अनुरूप झूलना सजाथें । कहूं लकड़ी के झूलना सजाथें त कहूं धातु के छोटे आसन त कोनो बाजार म मिलईया रेडीमेंट झूलना म । ए झूलना लड्डू गोपाल के नाम ले प्रसिद्ध भगवान के छोटे मूर्ति म रखथें अउ जनम समय के बाद भगवान ल झूलना झूलाथें ।

माखन-मिसरी, दूध-दही के भोग लगाना-

जइसे के सबो कोई जानथें के भगवान कृष्‍ण ल दूध-दही माखन-मिसरी बहुत पसंद रहिस ऐही पायके  आज के दिन भगवान ल दूध-दही माखन-मिसरी के भोग लगाए जाथे ।

फरहार बनाना-

आज के दिन उपास रहिथें, उपास म नमक ले बने कोनो भी चीज खाए के मनाही रहिथे अउ भगवान ल छप्‍पन भोग के भोग लगाए जाथे ए मान के लोगन अपन शक्ति के अनुसार आनी-बानी के कलेवा बनाथे, तिखुर, सूजी, पक्‍वा, मीठाई, सोहारी ऐही मन ल फरहार कहे जाथे, जेन ल भगवान अर्पण करे के बाद भगवान जनमदिन के खुशी म प्रसाद के रूप उपास रहईया मन घर भर जुरमिल के खाथें ।

अखंड रामधुनी के आयोजन-

बहुत अकन गॉंव मन आठे के दिन चौबीस घंटा के अखंड रामधुनी रखथें, जेमा गांव के टोली अउ तीर-तार के गॉव मोहल्‍ला के टोली रामधुनी गाथें । ए रामधुनी म एक सीता राम, राधे श्‍याम के जाप ल कई ढंग ले गाए जाथे, ढोलक के थाम म ए जाप अतका अच्‍छा लगथे के तन अउ मन ह नाचे लगथे । आज कल ए टोली मन अपन पर एक विशेष प्रकार ड्रेस रखथें जउन दिखे म एके लगथे । कोनो-कोनो टोली जोकड़ अउ परी घला बनथें संगे-संग घोड़ा म बइठे हे तइसे ढंग के एक आदमी स्‍वांग रच के नाचथे जेला देखे बर लइका मन के भीड़ लग जाथे ।

दही लूट के आयोजन-

आठे कन्हैया म दही लूट के झांकी जरूर होथे । कोनो-कोनो गांव म ऐही होथे त कोनो-कोनो गॉव बिहानभय दही लूट रखे जाथे । दही लूट के कार्यक्रम भगवान कृष्‍ण बाल सगा के झांकी के रूप म राम बलराम अउ ओखर सखा-संगी के रूप दू-चारझन लइका मन समरे रहिथे । रामधुनी टोली, भजन टोली नाचत-गावत रेगथें जेखर संगे-संग भगवान के झांकी चलथे । गांव के गली म  दूनों कोतो के छानही, छज्‍जा ले डोर डार के एक मरकी दही भरके लटकाए जाथें, त कोनो-कोनो मेरा लोहा के ऊँचा खम्‍भा म दही मरकी जटकाए जाथे, इहांतक के ए लोहा के खम्‍भा म ग्रिस चुपर देथे जेखर ले चढ़ईया मन आसानी ले दही मरकी तक झन पहुँचय । कृष्‍ण के रूप म सम्‍हरे संगी-साथी मन हाथ म हाथ जोर के गोल खड़ा होथे अउ अपन चेदी ऊपर अउ लइका मन ल खड़ा करके ऊॅपर कृष्‍ण बने लइका ल चढ़ाथें जउन ओ दही मरकी ल फोरथे । ए झांकी ल देखे भर गॉव भर के मनखे सकलाथें । ऐला देख के बड़ मजा आथे ।

-रमेश चौहान

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