Sliding Message
Surta – 2018 से हिंदी और छत्तीसगढ़ी काव्य की अटूट धारा।

पुस्तक समीक्षा: काव्य संग्रह अंतस के लहरा

पुस्तक समीक्षा: काव्य संग्रह अंतस के लहरा

छत्तीसगढ़ी गीतों में आत्मा की गूंज काव्य संग्रह अंतस के लहरा

– डुमन लाल ध्रुव

छत्तीसगढ़ी साहित्य में लोकगीतों और भावप्रधान गीतों की एक सशक्त परंपरा रही है जो यहां की धरती, संस्कृति, आस्था और जीवनशैली से सीधी जुड़ी हुई है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हैं श्री रमेश यादव जो न केवल गीतकार और कवि हैं, बल्कि लोकगायक के रूप में भी उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। उनकी चर्चित काव्यकृति ” अंतस के लहरा ” छत्तीसगढ़ी लोकजीवन की संवेदनाओं, संस्कारों और सामाजिक प्रतिबद्धताओं का दस्तावेज है। इस संग्रह में संकलित गीतों में लोक का लय, मन का भाव, और समाज का सरोकार पूरी ताकत के साथ उपस्थित हैं।
“अंतस के लहरा” शीर्षक स्वयं यह संकेत करता है कि यह रचना कवि के अंतरतम की गहराइयों से उपजी संवेदनात्मक लहरों का समुच्चय है। इसमें छत्तीसगढ़ के रीति-रिवाज, त्यौहार, प्रकृति, स्त्री जीवन, आध्यात्मिकता, सामाजिक चेतना और ममता के विविध रंगों की रचनाएं संग्रहीत हैं।
यह गीत सुर-साधना की देवी सरस्वती को समर्पित है। इसमें कवि सुर को आध्यात्मिक साधना मानते हैं। सुर की देवी से वरदान मांगते हैं कि गीतों में समाज का दुख, संस्कृति की सुगंध और लोक की भाषा बनी रहे।
यह गीत लेखन के मूल उद्देश्य की ओर इशारा करता है सच्चाई को उकेरना। कवि का आग्रह है कि वही लिखा जाए जो लोकमन की पीड़ा, उल्लास और संघर्ष को स्वर दे सके। यह गीत ग्रामीण स्त्री के सौंदर्य, श्रमशीलता और आत्मविश्वास को दर्शाता है। यह सौंदर्य प्रसाधनों की अपेक्षा उसके व्यवहार, श्रद्धा और संस्कृति से जुड़ा है।
छत्तीसगढ़ के कृषक जीवन का प्रतीक है – बियासी का नांगर । यहां श्रम और धरती के रिश्ते का प्रतीक बनकर उभरता है। इसमें किसान की व्यथा, प्रकृति से संवाद और श्रम के सौंदर्य का सुंदर चित्रण है। बदलते सामाजिक मूल्यों और असली नायक की खोज पर आधारित गीत है। इसमें लोकमन की व्याकुलता है – “वो कोन होही जेन ह सबके दुख समझही ?”
यह गीत छत्तीसगढ़ की संस्कृति, इतिहास और प्रकृति की पुकार है। कवि यहां धरती को चेतना से युक्त मानते हैं जो अपने अस्तित्व और अस्मिता को बचाने के लिए आवाज उठा रही है।
सामाजिक सौहार्द और सांस्कृतिक समरसता का संदेश देता गीत। इसमें लोक को जोड़ने वाली भाषिक और भावनात्मक परंपरा का स्मरण कराया गया है।
बरसात के सौंदर्य, किसान की आशा और प्रकृति की लयात्मकता से भरपूर एक गीत। इसमें छत्तीसगढ़ के ‘बरखा बयार’ की मादकता झलकती है।
छत्तीसगढ़ के त्यौहारों का वर्णन गीतों में विशेषता है। हरेली तिहार कृषि संस्कृति का उत्सव है जिसमें लोक परंपराओं और जनसंस्कृति की अभिव्यक्ति है।
यह गीत राष्ट्रभक्ति, सामाजिक जिम्मेदारी और जननायकत्व पर केंद्रित है। इसमें कवि भारत के उस ‘भगवान’ की बात करते हैं जो श्रम करता है, गंदगी उठाता है, खेत जोतता है, यानी आम आदमी मां की ममता, वात्सल्य और छत्तीसगढ़ी घरेलू वातावरण से गूंजती एक कोमल भाव की लोरी। इसमें जननी की आत्मा बोलती है।
इस गीत में गरीब, वंचित, श्रमिक वर्ग की दुरूह जिन्दगी को मार्मिक ढंग से उकेरा गया है। दुःख, भुखमरी, बेरोजगारी और व्यवस्था की उदासीनता इसकी पृष्ठभूमि है। कृष्ण को लोकनायक के रूप में प्रस्तुत करता हुआ गीत। इसमें मुरली की मधुरता और कर्म का संदेश समाहित है।
छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति में करमा महतारी की पूजा और उसका आध्यात्मिक स्वरूप यहां लोकगीत की लय में प्रस्तुत है।
नारी सशक्तिकरण का गीत, जो ग्रामीण परिवेश में बेटी को बोझ नहीं, बल्कि गौरव के रूप में देखने की प्रेरणा देता है।
यह आत्म-स्वीकृति और लेखकीय निष्ठा का गीत है। कवि कहता है कि वह गीत गाता है लोक के लिए, अपने भीतर की पुकार के लिए।
तीजा तिहार, देवारी तिहार, दीया हांसन लागे, कातिक महीना आगे त्योहारों पर आधारित ये गीत ग्रामीण उल्लास, परंपरा और ऋतु चक्र की रम्यता से जुड़े हैं। इनमें लोक जीवन की रचनात्मकता और आनंद छिपा है।
ए मीना, पेड़ लगाबो भइया, ले जा मयारू के ठांव प्रकृति, प्रेम और पारिस्थितिक चेतना से जुड़े ये गीत लोक और पर्यावरण के संबंध को रेखांकित करते हैं। विशेषकर “पेड़ लगाबो भइया” पर्यावरण संरक्षण का सुंदर लोकपाठ है।
मयारू मया, मया होगे जी के काल ‘मया’ यानी प्रेम की व्याख्या करते गीत। एक में प्रेम की कोमलता है, दूसरे में उसके खोने की पीड़ा। दोनों में भाव की गहराई है।
माटी के पुकार, काला बतांव की यह रचनाएं सामाजिक चेतना और व्यंग्यात्मक दृष्टि से परिपूर्ण हैं। ‘काला बतांव’ में व्यंग्य के माध्यम से समाज की मानसिकता पर करारा प्रहार है।
रमेश यादव की भाषा पूरी तरह छत्तीसगढ़ी की आत्मा से सराबोर है। उनकी शैली सहज, प्रवाहमयी, गीतात्मक और लोकलय से युक्त है। छंद और लय में गूंजते उनके गीत पाठक और श्रोता दोनों को बांध लेते हैं।
कवि श्री रमेश यादव का रुझान जनपक्षधरता की ओर है। वे आम आदमी के दुःख-दर्द, संस्कार और उत्सव को अपना विषय बनाते हैं।
सांस्कृतिक संरक्षण लोक पर्वों और परंपराओं पर लिखकर वे छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक धरोहर को संभालने का कार्य करते हैं। पर्यावरणीय जागरूकता को गीतों के माध्यम से प्रसारित करना एक बड़ी उपलब्धि है।
नारी सम्मान और सामाजिक सरोकार बेटी, दुलहिन, मां आदि विषयों पर कवि की दृष्टि संवेदनशील और सम्मानजनक है।
लोक जीवन और सांझ का सौंदर्य गांव के संझाती
कविता में जो ग्रामीण संध्या की आत्मीय छवि प्रस्तुत करती है। चरवाहा घर लौटता है, चूल्हा सुलगता है, कोरा, महुआ और बच्चों की किलकारियां इस कविता में संझा को सजीव बनाते हैं। संध्या केवल समय नहीं, एक लोकरस है, जो जीवन की थकान मिटाती है। मंझनिया, नवा बछर, आगे बसंत, फागुन ह आत हे, कातिक महीना आगे इन रचनाओं में दिनचर्या और ऋतु चक्र की लय है। मंझनिया की तपन, बसंत की बहार, फागुन की मस्ती और नवा साल की शुभकामनाएं — सबमें छत्तीसगढ़ की लोकऋतु-संवेदना उजागर होती है। प्रेम, विरह और मया के रंग ये सब मया के परमान, मया अमरित, माया, मया झलकथे जरूर, मोर बिजहा धान, ए गोरी, डोला लेके आजा, सुरता के चंदा, आंखी पिचकारी, तरी करेजा चुरत हे
रमेश यादव की कविताओं में मया केवल स्त्री-पुरुष का प्रेम नहीं, बल्कि एक व्यापक जीवनभाव है।
“मया के परमान” और “मया अमरित” में मया को ईश्वरीय रूप दिया गया है।
“मोर बिजहा धान” में प्रेम को किसान की फसल जितना मूल्यवान माना गया है।
“ए गोरी”, “डोला लेके आजा” में प्रणय का हर्ष और इंतजार है। “आंखी पिचकारी” और “तरी करेजा चुरत हे” में रंगीन फागुन की प्रेम-मस्ती है।
स्मृति और आत्मिक संवाद सुरता, मन म डर समागे, बिन पतवार के नझ्या, सुन्ना, सुरता के चंदा, मन के बात इन कविताओं में कवि अतीत की स्मृतियों से संवाद करता है। “सुरता” और “सुरता के चंदा” कविताएं आत्मीय प्रेम के खो जाने के बाद उपजी पीड़ा और उसकी मधुर छाया को स्वर देती हैं। “मन म डर समागे” एक गहरे मानसिक भय और असुरक्षा को दर्शाती है। “बिन पतवार के नझ्या” में कवि खुद को दिशाहीन महसूस करता है । जीवन नाव बन गई है, पर पतवार नहीं।
स्त्री जीवन और लोकसंवेदना
गउना, नंगरिहा के तुतारी बन जांव, बेटी ह घर के सिंगार
“गउना” में विवाहोपरांत विदाई और स्त्री के संघर्ष का चित्रण है। “नंगरिहा के तुतारी बन जांव” को स्वर दिया गया है।
“बेटी…” गीतों की कड़ी में कवि रमेश यादव स्त्री को घर का सौंदर्य मानते हैं, न कि बोझ।
प्रकृति और लोक-ऋतु की कविताएं फागुन आगे, चिरइया बोले, कातिक महीना आगे, बरखा गीत, आगे बसंत
इन कविताओं में छत्तीसगढ़ की धरती बोलती है। ऋतुओं का भावात्मक चित्रण, चिड़ियों की आवाज, पत्तों की हरियाली, फूलों की गंध — सब मिलकर एक संगीतमय दृश्य निर्मित करते हैं।
सामाजिक चेतना और स्वाभिमान पेड़ लगाबो भइया, माटी के पुकार, काला बतांव, भारत के भगवान, मन के बात, मुक्तक “माटी के पुकार” में मातृभूमि की करुण पुकार है – उसे बचाने की। “काला बतांव” में सामाजिक विडंबनाओं पर व्यंग्य है।
“पेड़ लगाबो…” पर्यावरणीय चेतना का संवेदनशील आह्वान है। “भारत के भगवान” – असली नायक मजदूर, किसान, सैनिक, शिक्षक – वही भगवान हैं, जो देश को चलाते हैं। रमेश यादव की भाषा गंवई लय में बहती है। शब्द सरल हैं पर उनमें भाव गहरे हैं। छत्तीसगढ़ी की संगीतमयीता, लोक बिंबों का प्रयोग, लयात्मकता, सहज प्रवाह और संगीतानुभूति उनकी कविताओं की विशेषता हैं। वे कविता को गाने योग्य बनाते हैं। पढ़ा भी जाए, गाया भी जाए, जिया भी जाए।
लोक जीवन का चित्रण गांव, त्योहार, मौसम, परंपरा सब कुछ जीवंत प्रेम और विरह कोमल, मार्मिक और सच्चे भाव स्त्री संवेदना संवेदनशील और सम्मानपूर्ण दृष्टि प्रकृति चित्रण , ऋतु, चिड़िया, नदी, फूल, खेतों की आवाज, समाज चेतना जागरूकता, व्यंग्य, पर्यावरण, बदलाव,संगीतात्मकता गीतों की तरह बहती कविता
गांव के संझाती” और उससे जुड़ी कवि गायक रमेश यादव की कविताएं छत्तीसगढ़ की आत्मा की आवाज है। यह संग्रह केवल गीतों का नहीं एक पूरे लोकजीवन का दस्तावेज है। रमेश यादव की कविताएं किसी बड़े मंच की मोहताज नहीं — ये नदी के किनारे, बिर्रा के नीचे, चूल्हा फूंकती दाई के मन, और धान रोपती बहिनी के गीत में गूंजती हैं। उनकी कविता मन के ल भीतर झनकार करथें — जेमा मया, माटी, सुरता, संस्कृति अउ चेतना सब समाहित हे।
“अंतस के लहरा” केवल एक काव्य संग्रह नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की आत्मा का स्वर है। यह संग्रह लोकधुनों में गूंजती संवेदना, सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक गौरव का मिश्रण है। रमेश यादव की यह कृति छत्तीसगढ़ी साहित्य के लिए एक मूल्यवान धरोहर है जो आने वाली पीढ़ियों को न केवल मनोरंजन, बल्कि मार्गदर्शन भी देगी।
– डुमन लाल ध्रुव
मुजगहन, धमतरी छग
पिन -493773

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

अगर आपको ”सुरता:साहित्य की धरोहर” का काम पसंद आ रहा है तो हमें सपोर्ट करें,
आपका सहयोग हमारी रचनात्मकता को नया आयाम देगा।

☕ Support via BMC 📲 UPI से सपोर्ट

AMURT CRAFT

AmurtCraft, we celebrate the beauty of diverse art forms. Explore our exquisite range of embroidery and cloth art, where traditional techniques meet contemporary designs. Discover the intricate details of our engraving art and the precision of our laser cutting art, each showcasing a blend of skill and imagination.