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पुस्तक परिचय :छत्तीसगढ़ी काव्य एक वृहंगम दृष्टि- रामेश्वर शर्मा

पुस्तक परिचय :छत्तीसगढ़ी काव्य एक वृहंगम दृष्टि- रामेश्वर शर्मा

क्यों पढ़ें यह पुस्तक

छत्तीसगढ़ी काव्य: एक विहंगम दृष्टि छत्तीसगढ़ की साहित्यिक और सांस्कृतिक धरोहर का एक अनमोल संग्रह है, जो पाठकों को इस क्षेत्र की समृद्ध काव्य परंपरा से जोड़ता है। रामेश्वर शर्मा द्वारा रचित यह कृति पिछले एक हजार वर्षों से फल-फूल रही छत्तीसगढ़ी काव्य की विविधता को प्रस्तुत करती है, जिसमें गीत, नवगीत, गजल, महाकाव्य, खंडकाव्य, और नाट्य काव्य जैसी विधाएँ शामिल हैं। यह पुस्तक न केवल साहित्य प्रेमियों के लिए, बल्कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति, भाषा, और लोक जीवन को समझने के इच्छुक प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक खजाना है।

यह कृति छत्तीसगढ़ी साहित्य के चार युगों—आदिकाल, गीतिकाल, भक्तिकाल, और आधुनिक काल—का समावेश करती है, जो इस भाषा की निरंतरता और विकास को दर्शाता है। पंडित लोचन प्रसाद पांडेय, मुकुटधर पांडेय जैसे पुरखा रचनाकारों से लेकर डॉ. सत्यभामा साय, अरुण निगम, रमेश चौहान जैसे समकालीन कवियों तक, यह पुस्तक सभी को एक मंच पर लाती है। छत्तीसगढ़ी गीतों में प्रकृति, प्रेम, श्रम, और आध्यात्मिकता का अनूठा संगम है, जो पाठकों को गाँव की माटी की सौंधी खुशबू और लोकगीतों की मधुरता से रूबरू कराता है।

यह पुस्तक शैक्षिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए यह एक संदर्भ ग्रंथ है, जो छत्तीसगढ़ी साहित्य के शिल्प, भाव, और सामाजिक संदर्भों को समझने में सहायक है। यह छत्तीसगढ़ी भाषा के उन रचनाकारों की पीड़ा को भी उजागर करती है, जिनकी कृतियाँ भाषाई और शैक्षिक उपेक्षा के कारण समाज तक नहीं पहुँच पाईं। रामेश्वर शर्मा की यह कृति इस कमी को पूरा करने का प्रयास है, जो छत्तीसगढ़ी साहित्य को पाठ्यक्रम में शामिल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

छत्तीसगढ़ी काव्य: एक विहंगम दृष्टि पढ़ना केवल साहित्य का आनंद लेना नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की आत्मा को छूना है। यह पुस्तक आपको संत कबीर और गुरु घासीदास की शिक्षाओं, महानदी के तटों, और धान के खेतों की हरियाली के बीच ले जाती है। यह हर उस पाठक के लिए है, जो साहित्य के माध्यम से समाज, संस्कृति, और शिक्षा के मंगलकारी स्वरूप को अनुभव करना चाहता है।

लेखक परिचय

रामेश्वर शर्मा छत्तीसगढ़ी साहित्य के एक सजग साधक और समर्पित रचनाकार हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति को न केवल समृद्ध किया, बल्कि उसे राष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाई। 12 मार्च 1950 को जन्मे शर्मा जी ने अपनी साहित्यिक यात्रा को लगभग 52 वर्षों से निरंतर गति दी है। रायपुर के शिव नगर में निवास करने वाले इस साहित्यकार ने कविता, गीत, गजल, लेख, समीक्षा, अनुवाद, और पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। उनकी रचनाएँ हिंदी, छत्तीसगढ़ी, और उड़िया भाषाओं में फैली हैं, जो उनकी बहुभाषी प्रतिभा का प्रमाण हैं।

शर्मा जी की प्रमुख कृतियों में सवनाही (छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह), सरल छत्तीसगढ़ी (शब्दकोश और काव्य संरचना), और छत्तीसगढ़ी काव्य: एक विहंगम दृष्टि शामिल हैं। उनकी यह अंतिम कृति छत्तीसगढ़ी साहित्य का एक व्यापक दस्तावेज़ है, जो पुरखा और समकालीन रचनाकारों को एक सूत्र में पिरोता है। उन्होंने आकाशवाणी और दूरदर्शन पर काव्य पाठ, साक्षात्कार, और लोककला प्रस्तुतियों के माध्यम से अपनी रचनाओं को जन-जन तक पहुँचाया। उनकी रचित गीतों को छत्तीसगढ़ी लोक गायकों और फीचर फिल्मों जैसे तुलसी और मीरा में स्थान मिला, जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का सम्मान भी प्राप्त हुआ।

रामेश्वर शर्मा एक लेखक ही नहीं, बल्कि एक समीक्षक, संपादक, और सांस्कृतिक संरक्षक भी हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ी सेवक, छत्तीसगढ़ संदेश, और नई कोपल जैसी पत्रिकाओं के संपादन में योगदान दिया। छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति, राजभाषा मंच, और स्वाभिमान संस्थान जैसे संगठनों में उनकी सक्रिय भूमिका रही। उनके योगदान के लिए छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग, साहित्य भूषण, और मया चिन्हा जैसे अनेक सम्मानों से उन्हें नवाज़ा गया।

शर्मा जी का जीवन छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रति निःस्वार्थ सेवा का प्रतीक है। उनकी रचनाएँ गाँव की माटी, मेहनतकश किसानों, और लोक संस्कृति की गहराई को दर्शाती हैं। उनकी यह पुस्तक नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का माध्यम है, जो शिक्षा, शोध, और साहित्यिक रुचि के लिए एक अनमोल संसाधन है।

विशेषताएं

छत्तीसगढ़ी काव्य: एक विहंगम दृष्टि छत्तीसगढ़ी साहित्य की हजार वर्ष पुरानी यात्रा को उजागर करती है। यह पुस्तक चार युगों—आदिकाल, गीतिकाल, भक्तिकाल, और आधुनिक काल—के माध्यम से काव्य की विकास गाथा प्रस्तुत करती है। आदिकाल के लोकगीतों से लेकर आधुनिक गजलों तक, छत्तीसगढ़ी काव्य ने हर शिल्प को अपनाया। संत कबीर और गुरु घासीदास जैसे महापुरुषों की शिक्षाएँ इस साहित्य में गूँजती हैं, जो सामाजिक समरसता और आध्यात्मिकता का संदेश देती हैं। पुस्तक में पंडित लोचन प्रसाद पांडेय जैसे पुरखा कवियों से लेकर समकालीन रचनाकारों तक का समावेश है, जो इस साहित्य की निरंतरता को दर्शाता है। यह काव्य प्रकृति, श्रम, और लोक जीवन से प्रेरित है, जो छत्तीसगढ़ की माटी की सौंधी खुशबू को जीवंत करता है। यह पाठकों को इतिहास के पन्नों में ले जाता है, जहाँ हर छंद एक कहानी कहता है।
छत्तीसगढ़ी काव्य की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विधागत विविधता है। छत्तीसगढ़ी काव्य: एक विहंगम दृष्टि में गीत, नवगीत, गजल, दोहा, चौपाई, कुंडलिया, मुक्तक, और महाकाव्य जैसी अनेक विधाएँ समाहित हैं। यह पुस्तक हर शिल्प को संजोती है, जिसमें वीर रस, हास्य, श्रृंगार, और भक्ति रस की रचनाएँ शामिल हैं। उदाहरण के लिए, हेमसिंह साहू की रचना नारी शक्ति को भक्ति भाव से प्रस्तुत करती है, जबकि पोखन जायसवाल के गीत जीवन की नश्वरता को दर्शाते हैं। यह विविधता छत्तीसगढ़ी साहित्य की समृद्धि का प्रतीक है, जो लोक जीवन के हर रंग को काव्य में ढालती है। यह पुस्तक पाठकों को एक ही मंच पर विभिन्न छंदों और भावों का आनंद देती है, जो साहित्य प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए अनमोल है।
छत्तीसगढ़ी काव्य: एक विहंगम दृष्टि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने का एक प्रयास है। यह पुस्तक लोक संस्कृति, परंपराओं, और सामाजिक मूल्यों को काव्य के माध्यम से प्रस्तुत करती है। गाँव की माटी, धान के खेत, और महानदी के तट इस साहित्य की आत्मा हैं। यह पुस्तक शैक्षिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है, जो विद्यार्थियों को अपनी भाषा और संस्कृति से जोड़ती है। शोधकर्ताओं के लिए यह एक संदर्भ ग्रंथ है, जो छत्तीसगढ़ी साहित्य के शिल्प और सामाजिक संदर्भों को समझने में सहायक है। यह छत्तीसगढ़ी भाषा को पाठ्यक्रम में शामिल करने की दिशा में एक कदम है, जो भाषाई उपेक्षा को दूर करने का प्रयास करता है। यह पुस्तक नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ती है, जो सांस्कृतिक गौरव और शिक्षा का संदेश देती है।
रामेश्वर शर्मा की यह कृति छत्तीसगढ़ी रचनाकारों को सम्मान देने का एक अनूठा प्रयास है। छत्तीसगढ़ी काव्य: एक विहंगम दृष्टि में पुरखा कवियों जैसे पंडित लोचन प्रसाद पांडेय, मुकुटधर पांडेय, और समकालीन रचनाकारों जैसे डॉ. सत्यभामा साय, अरुण निगम को एक मंच पर लाया गया है। यह पुस्तक उनकी रचनाओं को संजोकर उनकी साहित्यिक विरासत को जीवंत रखती है। शर्मा जी ने न केवल उनकी कृतियों को प्रस्तुत किया, बल्कि उनके योगदान को समाज तक पहुँचाने का बीड़ा उठाया। यह पुस्तक उन रचनाकारों की पीड़ा को भी उजागर करती है, जिनकी कृतियाँ भाषाई उपेक्षा के कारण गुमनामी में खो गईं। यह कृति साहित्यकारों के सम्मान का प्रतीक है, जो छत्तीसगढ़ी साहित्य की धरोहर को अगली पीढ़ी तक ले जाती है।

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक, सामाजिक, और आध्यात्मिक धरोहर का एक जीवंत दस्तावेज़ है

छत्तीसगढ़ी काव्य: एक विहंगम दृष्टि रामेश्वर शर्मा की एक ऐसी कृति है, जो छत्तीसगढ़ी साहित्य की आत्मा को संजोती है। यह पुस्तक छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक, सामाजिक, और आध्यात्मिक धरोहर का एक जीवंत दस्तावेज़ है, जो पाठकों को इस क्षेत्र की काव्य परंपरा के गौरवशाली इतिहास से जोड़ता है। पिछले एक हजार वर्षों से छत्तीसगढ़ी भाषा में काव्य सृजन की अखंड धारा बह रही है, और यह पुस्तक उस धारा को एक मंच पर लाती है। गीत, नवगीत, गजल, दोहा, चौपाई, कुंडलिया, मुक्तक, खंडकाव्य, और महाकाव्य जैसी विविध विधाएँ इस कृति में समाहित हैं, जो छत्तीसगढ़ी साहित्य की बहुरंगी छटा को दर्शाती हैं।

छत्तीसगढ़ी काव्य की विशेषता उसका लोक जीवन से गहरा जुड़ाव है। इस साहित्य में गाँव की माटी, धान के खेत, महानदी के तट, और मेहनतकश किसानों की कहानियाँ गूँजती हैं। संत कबीर के दोहे और गुरु घासीदास के पंथी गीत इस साहित्य की आत्मा हैं, जो सामाजिक समरसता, भक्ति, और आध्यात्मिकता का संदेश देते हैं। इस पुस्तक में पंडित लोचन प्रसाद पांडेय, मुकुटधर पांडेय जैसे पुरखा कवियों की रचनाएँ हैं, जो छत्तीसगढ़ी साहित्य की नींव रखते हैं। साथ ही, डॉ. सत्यभामा साय, अरुण निगम, पीसी लाल यादव जैसे समकालीन रचनाकारों की कृतियाँ भी शामिल हैं, जो इस साहित्य को आधुनिक संदर्भों से जोड़ती हैं।

रामेश्वर शर्मा ने इस पुस्तक के माध्यम से छत्तीसगढ़ी साहित्य को न केवल संरक्षित किया, बल्कि उसे शैक्षिक और सांस्कृतिक मंच पर स्थापित करने का प्रयास किया। यह पुस्तक विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं, और साहित्य प्रेमियों के लिए एक संदर्भ ग्रंथ है। यह छत्तीसगढ़ी भाषा की उस पीड़ा को भी उजागर करती है, जो भाषाई और शैक्षिक उपेक्षा के कारण समाज तक नहीं पहुँच पाई। छत्तीसगढ़ी को पाठ्यक्रम में शामिल करने की दिशा में यह कृति एक महत्वपूर्ण कदम है। यह पुस्तक नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का माध्यम है, जो उन्हें अपनी भाषा और विरासत पर गर्व करना सिखाती है।

इस पुस्तक में शामिल गीत और कविताएँ छत्तीसगढ़ के लोक जीवन के हर रंग को दर्शाती हैं। उदाहरण के लिए, हेमसिंह साहू का गीत नारी शक्ति को भक्ति भाव से प्रस्तुत करता है, जबकि पोखन जायसवाल का गीत जीवन की नश्वरता को छूता है। मूलचंद शर्मा का गीत छत्तीसगढ़ को भारत की धान कटोरी के रूप में गौरवान्वित करता है। ये रचनाएँ प्रकृति, प्रेम, श्रम, और आध्यात्मिकता का अनूठा संगम हैं, जो पाठकों को गाँव की सौंधी खुशबू और लोकगीतों की मधुरता से रूबरू कराती हैं।

रामेश्वर शर्मा का यह प्रयास छत्तीसगढ़ी रचनाकारों को सम्मान देने का एक अनूठा उदाहरण है। उन्होंने पुरखा और समकालीन कवियों को एक सूत्र में पिरोया, जिससे उनकी साहित्यिक विरासत जीवंत रह सके। यह पुस्तक उन रचनाकारों की आवाज़ है, जिनकी कृतियाँ गुमनामी में खो गईं। शर्मा जी की यह कृति छत्तीसगढ़ी साहित्य को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाने का संकल्प है।

छत्तीसगढ़ी काव्य: एक विहंगम दृष्टि पढ़ना एक साहित्यिक यात्रा है, जो आपको छत्तीसगढ़ की आत्मा से जोड़ती है। यह पुस्तक हर उस पाठक के लिए है, जो साहित्य के माध्यम से संस्कृति, समाज, और शिक्षा के मंगलकारी स्वरूप को अनुभव करना चाहता है। यह छत्तीसगढ़ की माटी, मेहनत, और ममता की कहानी है, जो हर हृदय को छूती है। आइए, इस काव्य यात्रा में शामिल हों और छत्तीसगढ़ी साहित्य के रस में डूब जाएँ।

संपूर्ण पुस्तक यहां पढ़ें-

Rameshwar-sharma

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