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डाॅ. गोरेलाल चंदेल-लोक साहित्य की विकास यात्रा का एक अध्याय-डुमन लाल ध्रुव

डाॅ. गोरेलाल चंदेल-लोक साहित्य की विकास यात्रा का एक अध्याय-डुमन लाल ध्रुव

डाॅ. गोरेलाल चंदेल-लोक साहित्य की विकास यात्रा का एक अध्याय

-डुमन लाल ध्रुव

डाॅ. गोरेलाल चंदेल-लोक साहित्य की विकास यात्रा का एक अध्याय-डुमन लाल ध्रुव
डाॅ. गोरेलाल चंदेल-लोक साहित्य की विकास यात्रा का एक अध्याय-डुमन लाल ध्रुव

देश के नामचीन लेखक एवं सुप्रसिद्ध समालोचक व मेरे गुरू श्रद्धेय प्रोफेसर डाॅ. गोरेलाल चंदेल सेवानिवृत्त प्रोफेसर हिन्दी विभाग इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ अब हमारे बीच नहीं रहे। दिनांक 15.04.2021 को शाम 04.30 बजे कोरोना संक्रमण के चलते निधन हो जाने से साहित्य जगत स्तब्ध है अपूरणीय क्षति हुई है भरपाई करना संभव नहीं है। डाॅ. चंदेल जी का जन्म 01 दिसम्बर 1944 को खैरागढ़ के समीप कुसमी गांव में साधारण कृषक परिवार में हुआ था। 

डाॅ. गोरेलाल चंदेल जी लोक साहित्य के समृद्ध लेखक व समीक्षक थे। इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ में अध्ययन के दौरान डाॅ. गोरेलाल चंदेल, डाॅ. रमाकांत श्रीवास्तव, डाॅ. जीवन यदु का सानिध्य प्राप्त हुआ। श्रेष्ठ गुरूओं के स्नेह वर्षा में नहाकर यह अनुभव किया कि कोई कितना भी बड़ा लेखक क्यों ना हो, लेखक वही लिखता है, जो सोचता है। वही सोच उसके व्यवहार में दिखाई देती है । वह अपने लेखन और व्यवहार में कभी भी दोहरा रुख अख्तियार नहीं कर सकता। बड़े से बड़ा लेखक चाहे कितनी ही वैचारिक, नैतिक, प्रवचन, उपदेश और भाषाई चालाकी से अपनी छंदमता को छुपा ले। लेकिन उसका व्यवहार उसके लेखन में साफ दिखाई देता है। बस यह महीन दृष्टि विकसित करने की जरूरत होती है।

       यही बात डॉक्टर गोरेलाल चंदेल की कृतियों में साफ नजर आती है। उनका सौम्य, सरल और सहज व्यक्तित्व उनके लेखन, व्यवहार और उनकी भाषा शैली में भी नजर आता है। उनका यही व्यक्तित्व और भाषा शैली मुझे प्रभावित करने से नहीं रोक पाई।

     भीष्म साहनी का साहित्य-चेतना के विविध आयाम, संस्कृति की अर्थ व्यंजना, छत्तीसगढ़ी ददरिया का तात्विक अनुशीलन, लोक संस्कृति के विविध आयाम झेंझरी। यह कृति पांच भागों में प्रकाशित है लगभग अट्ठारह सौ पृष्ठों की विशद ग्रंथ है। यह कृति ना सिर्फ डॉक्टर गोरेलाल चंदेल की लोक साहित्य की विकास यात्रा का एक अध्याय है जिसे लोक साहित्य विकास यात्रा का जरूरी दस्तावेज भी माना जा सकता है। यह कृति अपने युगबोध और दायित्व बोध की दास्तान नजर आती है।

  सन दो हजार अट्ठारह में लता साहित्य सदन गाजियाबाद नई दिल्ली से लोक संस्कृति के विविध आयाम ’’झेंझरी’’ प्रकाशित होकर आई लोक साहित्य के पुराने प्रश्न पुनः लोक साहित्य के सामने खड़े होकर पाठकों की जिज्ञासा नए प्रश्नों को जानने की उत्सुकता भरी हुई थी। झेंझरी लोक साहित्य की पहलुओं पर विमर्श करने तैयार रहती थी। कृति झेंझरी लेखक डॉक्टर गोरेलाल चंदेल जी की कामयाबी भी मानी जा सकती है।

      जिस लेखक की रचनाएं पहल, वसुधा, कथादेश, मीरायन, अक्षर पर्व, मड़ई, लोक मड़ई , आदि पत्रिकाओं में लगभग 50 लेखों का प्रकाशन और लोक सांस्कृतिक ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय विषयों पर निरंतर लेखन किया हो , आकाशवाणी से लोक संस्कृति पर निरंतर वार्ता, परिचर्चा एवं रुपकों का प्रसारण,। सापेक्ष, लोक मंड़ई आदि पत्रिकाओं में संपादन सहयोग किया हो । निनाद पुरस्कार, भोरमदेव सम्मान, मंदराजी सम्मान आदि । छत्तीसगढ़ प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन, संगठन सचिव, छत्तीसगढ़ प्रगतिशील लेखक संघ अध्यक्ष मंडल का सदस्य। पाठक मंच खैरागढ़ के सहयोग से चलो गांव की ओर योजना के अंतर्गत 2017 में प्रेमचंद जयंती के अवसर पर 300 गांव के चैपालों एवं स्कूलों में प्रेमचंद की कहानी का पाठ और चर्चा के आयोजन का महत्वपूर्ण कार्य। ग्रामीण अंचल में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के विकास के लिए उच्चतर माध्यमिक स्तर तक 14 अवंती विद्यालय मंदिर का संचालन डॉक्टर गोरेलाल चंदेल ने किया है। गोरेलाल चंदेल जी चर्चा परिचर्चा के दौरान मुझको हमेशा कहा करते थे कि डुमन छत्तीसगढ़ में लोक साहित्य पर अभी भी बहुत काम करने की आवश्यकता है। यही स्वीकारोक्ति उन्हें एक बड़ा लेखक बनाते हैं। यह बोलना कितना कठिन कार्य है, समझने वाले लेखक और पाठक ही आसानी से समझ सकते हैं।

 छत्तीसगढ़ में यह पीड़ा केवल डॉक्टर गोरेलाल चंदेल जी की ही नहीं बल्कि अपने युग की पीड़ा है, हम सब की पीड़ा है और लोक साहित्य , लोक संस्कृति , लोक कला ,लोक गाथा ,लोक संगीत की पीड़ा भी नजर आती है । जिसको उन्होंने अपनी पूरी साहित्य में पक्षधरता के साथ स्वीकार किया है । डॉक्टर गोरेलाल चंदेल जी के रचित किताबों का अध्ययन करने से पता चलता है कि लोक साहित्य के इतिहास बोध का होना अति आवश्यक है।

भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर श्री विजय दयाराम के. ने कृति झेंझरी के संदर्भ में कहा कि- छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की तरह कर्नाटक की लोक संगीत, साहित्य, संस्कृति सभी विधाओं को अपने नये अंदाज में बांधते हैं। हम आज अपने को भले ही परिभाषित नहीं कर पाते। हम सबको बांधने वाली हमारी संस्कृति है।

झेंझरी
झेंझरी

डाॅ. राकेश सोनी ने कहा-लोक संस्कृति के महत्व को जानने समझने के लिए एक महत्वपूर्ण कृति है ‘‘झेंझरी’’। जितेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि-बदलाव के रंग में डूब जाये या अपनी संस्कृति की रक्षा करें। गांव में शहरों की आधुनिकता का प्रवेश हो रहा है। छत्तीसगढ़ को जानने के लिए मील का पत्थर है ‘‘झेंझरी’’। डाॅ. एस.एस. ध्रुर्वे ने कहा कि-छत्तीसगढ़ में विविधता है। सांस्कृतिक विविधता का प्रारंभिक विवरण इस पुस्तक में है। विभिन्न लोकगीतों के उदाहरण विषय को प्रमाणिक बताते हैं। कुमेश्वर कुमार ने कहा कि-लोकजीवन पर अभी भी सामंती प्रभाव मौजूद है, उनकी जानकारी इस पुस्तक में मिलती है। डाॅ. मांझी अनंत ने कहा कि-लोक साहित्य, लोक संस्कृति के प्रणेता डाॅ. गोरेलाल चंदेल ने इस कृति के माध्यम से लोक संस्कृति को चारों ओर से देखा है।

लोक साहित्यकार दुर्गा प्रसाद पारकर ने कहा कि-छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति पर महत्वपूर्ण कार्य हुआ है। उन्होंने तुलसी की चैपाई और कांशी के सफेद फूल का विशेष जिक्र किया। आने वाली पीढ़ी को सांस्कृतिक समझ प्रदान करना हम सबका दायित्व है। प्रसिद्ध व्यंग्यकार रवि श्रीवास्तव ने कहा कि-छत्तीसगढ़ का किसान नवाखाई के समय धान की बाली बांटता है। वह गांव की उदारता है। झेंझरी के संवाद रोचक और पात्रों के अनुरूप है। डाॅ. जीवन यदु ने प्रथम खंड की कहानियों का उल्लेख किया। लोक संस्कृति का बड़ा ही दिलचस्प चित्रण इन कहानियों में मौजूद है। समाज में होने वाले परिवर्तन का प्रभाव संस्कृति पर पड़ता है। लोकगीतों का सस्वर गायन प्रस्तुत करने हुए नत्थू तोड़े ने विभिन्न लोकगीतों का महत्व रेखांकित किया।  अधिकांश लोकगीत झेंझरी में उद्घृत किये गये हैं। डाॅ. बलदाऊ राम साहू ने कहा-विभिन्न माध्यमों से लोकजीवन का चित्रण इस पुस्तक में मिलता है। लोक यात्रा के विविध रूपों की जानकारी महत्वपूर्ण है। लोक के साथ जीने वाला लेखक ही ऐसा प्रमाणिक लेखन कर सकता है। पीसी लाल यादव ने अच्छा लिखने के लिए यह कहा जाता है कि जैसा दिखता है वैसा लिख। इस कृति के संदर्भ में यह कथन सटीक है।

बतौर अतिथि धमतरी विधायक श्रीमती रंजना साहू ने झेंझरी के लेखक डाॅ. गोरेलाल चंदेल जी के साहित्य साधना को प्रणाम करते हुए उक्त बातें कहीं अनुभव के पुनर्सृजन से रचना का जन्म होता है। मनुष्य का इतिहास लोक से प्रारंभ होता है। लोक संस्कृति मातृसत्तात्मक होती है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार त्रिभुवन पांडेय ने लोक संस्कृति के तीन प्रमुख तत्वों का उल्लेख करते हुए कहा-लोक संस्कृति श्रम, सामूहिकता और लोक संगीत से निर्मित होती है। सामूहिकता लोक संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति है। श्री ज्ञानेश्वर शर्मा ने झेंझरी जैसे कृति को छत्तीसगढ़ के लिए अमूल्य धरोहर बताया। इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ के शोध छात्र डाॅ. दीपशिखा पटेल, वेदांत सिंह, योगेन्द्र धृतलहरे, कु. मोनिका साहू, कु. रोशनी वर्मा, (एम. ए. लोक संगीत), डाॅ. सरिता दोशी, मदनमोहन खंडेलवाल, चन्द्रशेखर शर्मा, डाॅ. विद्या गुप्ता, श्रीमती पुष्पलता इंगोले, ए. आर. इंगोले, डाॅ. यशवंत साव, सीताराम साहू, कृष्ण कुमार साहू दीप, माखन लाल साहू,  जे. एल. साहू, डी.पी. देशमुख, भरत राना, श्रीकांत सरोज, श्रीमती कविता ध्रुव, श्रीमती अंजना तिवारी, श्रीमती गीता साहू, श्रीमती संध्या मानिकपुरी, श्रीमती शिल्पा मानिकपुरी, अखिलेश श्रीवास्तव, प्रदीप साहू, मन्नम राना, यशवंत पठारे, मदनमोहन दास, रविकांत गजेन्द्र, कुलदीप सिन्हा, चन्द्रहास साहू ने संस्कृति को सभ्यता का आधार माना।

झेंझरी जैसी कृति से लोक समाज को सुंदर से सुंदर बनाने की चेतना संस्कृति से ही पाते हैं। साहित्य जगत में लोक जिजीविषा के धनी डाॅ. गोरेलाल चंदेल जी की स्मृति को सादर नमन।

-डुमन लाल ध्रुव

स्‍मृतियों में त्रिभुवन पांडेय:’तुम कथ्य लिखो मैं कथा लिखूंगा’-डुमन लाल ध्रुव

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