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यात्रा संस्‍मरण : पत्थरों पर गीत-जीवन के मीत भाग-8

यात्रा संस्‍मरण : पत्थरों पर गीत-जीवन के मीत भाग-8

पत्थरों पर गीत-जीवन के मीत

श्रीमती तुलसी देवी तिवारी

गतांक से आगे

भाग-8 घृष्णेश्वर महादेव का दर्शन

घृष्णेश्वर महादेव का दर्शन
घृष्णेश्वर महादेव का दर्शन

यहाँ से हम जा रहे थे घृष्णेश्वर महादेव के दर्शन करने। देश के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित बारह ज्योर्तिलिंगों में बारहवाँ ज्योर्तिलिंग, जिसके स्मरण मात्र से मन निर्वेद से भर उठा। विश्राम की स्थिति आ गई हो जैसे।

गुफाओं से लगभग एक कि.मी. की दूरी पर स्थित यह ज्योर्तिलिंग, भक्तों का भय हरने वाला है। शिव पुराण के अनुसार यहाँ एक महान् शिव भक्त सुधर्मा अपनी पत्नी सुदेहा के साथ सुखपूर्वक निवास करते थे और तो सब कुछ था, किन्तु सुदेहा माँ नहीं बन सकी। हारकर उसने धृष्णा नामक कन्या से अपने पति का विवाह करवा दिया। घृष्णा भी अनन्य शिव उपासिका थी। समय पाकर उसने एक पुत्र को जन्म दिया। सुधर्मा पुत्र मोह में ऐसे फंसे कि सुदेहा की ओर ध्यान देना ही छोड़ दिया। जिससे उसके मन में अपने सौतेले पुत्र के प्रति भयानक ईष्र्या ने जन्म लिया। समय देखकर सुदेहा ने घृष्णा के पुत्र की हत्या कर उसके टुकड़े तालाब में डाल दिये। घृष्णा भक्ति में लीन शिव आराधना कर रही थी। गाँव में फैली बात उसके कानों तक न पहुँची। भक्तों की रक्षा करने वाले भोले शंकर ने स्वयं प्रकट होकर घृष्णा के पुत्र को पुकारा वह तालाब के अन्दर से बाहर निकला। घृष्णा शिव जी की स्तुति करने लगी। प्रसन्न होकर शंकर जी ने उससे वरदान मांगने को कहा। उसने लोक कल्याण हेतु सदा वहाँ विराजने का वर माँग लिया। प्रभु ने स्वीकार कर लिया।

हमारा परम सौभाग्य की श्रावण के महिने में प्रभु के दर्शन का लाभ मिलने जा रहा था।

हमारी गाड़ी लगभग एक किलोमीटर जाकर जहाँ रुकी, वहाँ पहले से बहुत सी गाड़ियाँ रूकी हुईं थीं। अभी अंधेरा नहीं हुआ था। हमने दूर से ही मंदिर के शीर्ष पर फहराता ध्वज देखकर सिर झुकाया। मंदिर के शीर्ष पर अहिल्याबाई होल्कर द्वारा बनवाया गया स्वर्ण कलश दिखाई दे रहा था।

यह महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले का वेरूल नामक नगर है। इसके पूर्वी भाग पर स्थित पहाड़ी पर यह विश्व वन्द्य मंदिर शोभायमान है।
वाहन स्थानक के पास ही एक छोटा सा बाजार है। फूलों सहित अन्य पूजन सामग्रियों का। पंक्तिबद्ध दुकानदार रंग-बिरंगे पुष्पित, पुष्प लेकर बैठे थे। इनमें अधिकांश महिलाएँ थीं, जो पत्तों के बड़े-बड़े दोनों में पुष्प, बेलपत्र, गुलाब, गेंदा, मोगरा, आदि के फूल धतूरे का कटीला फल बेल (श्रीफल) आंक के फूल इलायची दाना, रक्षा सूत्र हल्दी, सिंदूर आदि लेकी बैठीं थीं।

जैसे ही हम गाड़ियों से उतरे एक स्थूलकाय अधेड़ स्त्री मेरे पास दौडी आई। ‘‘मौसी ! दस रूपये में दोने ले लो’’। मैंने देखा दोना गुलाब के फूलों से भरा था, साथ ही दुर्वादल की शीतल हरितिमा लाल हरे की अप्रतीम सुन्दरता निर्मित कर रही थी। फिर उसका दिल खोलकर मौसी कहना ! मेरी अपनी कोई कन्या नहीं, परन्तु बहन बिमला की है, बेटी पिंकी, मुझे बहुत प्यारी है, लगा जैसे वही पुकार रही है।

‘‘अच्छा दे दो लेना तो है ही’’! मैंने उससे दोना ले लिए।
‘‘यह लो ! 21 देना’’, उसने श्रीफल डाल दिया।
‘‘ये लो पार्वती के लिए हल्दी, सिन्दूर, 35 रू. देना, फिर उसने बिजली जैसी तेजी से सारी वस्तुयें मेरे हाथ के दोनों में सजा दी। ‘‘जाओ 51 रू.0 देना। सावन का महिना है, बाबा की पूजा करके आओ! तब पैसे देना।’’ वह दूसरे ग्राहक के साथ व्यस्त हो गई। भट्ट जी लंबे व्यक्ति ठहरे, आगे बढ़ गये थे, कुछ साथी दिखाई दे रहे थे, मेरे साथ गुमने वाला प्रकरण जुड़ा हुआ है। अतः मैं उनके पीछे लपकती बढ़ गई। ठगे जाने से ज्यादा उसका मौसी का संबोधन मेरे कानों में मिसरी घोल रहा था। मंदिर में संध्या कालीन पूजा आरती चल रही थी। हम उसके छोटे से द्वार से प्रविष्ट होकर विस्तृत प्रांगण में पहुँचे। मंदिर लाल पत्थरों से निर्मित, दीवारों पर उच्चकोटि की नक्काशी युक्त है? ईश्वर के सामने नंदी की प्रतिमा स्थापित है। माना जाता है कि शिवलिंग के सामने नंदी की प्रतिमा इसलिए बनाई जाती है कि उन्हें देखकर शंकर जी प्रसन्न होते है। उनका तेज सौम्य हो जाता है, जिसके कारण भक्त दर्शन लाभ ले पाते हैं।

मुख्य मंदिर का सभाकक्ष 24 खम्भों पर टिका हुआ है, जिसके गुम्बद पर स्वर्ण कलश स्थापित है, जिसके तेज का दर्शन कर सारा जड़ चेतन शिवमय हो रहा है, तो मैं ही भला कैसे निर्लिप्त रह जाती।

मुख्य मंदिर के मध्य अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ जग पर करूणा वृष्टि करते बाबा घृष्णेश्वर विराज रहे हैं। भीड़ अधिक न होते हुए भी पचीस तीस की लाइन तो थी ही। पुरूषों के लिए उपरिवस्त्र पहनकर मंदिर प्रवेश वर्जित है साथ ही, बेल्ट, पर्स आदि चर्म निर्मित वस्तुएँ भी बाहर रखनी पड़ती हैं। भइया लोग बैग से धोती, लूंगी या जो जिसके पास था, निकालकर पहन रहे थे, फुलपेन्ट आदि रख दिया गया। मेरा बैग कपड़े का था, अतः मुझे कोई परेशानी न हुई। भीड़ के रेले के साथ मैं अन्दर पहुँची और परमपिता के दर्शन किये।

उनका कलेवर ज्यादा बड़ा नहीं है, चोवा चंदन चर्चित शिवलिंग पर पूजन सामग्री अर्पित कर हाथ जोड़े। तत्काल पलकों ने नेत्रों को अपनी अभिरक्षा में ले लिया। अजीब बात है न ? दूर-दूर से जिस देव के दर्शन करने आते हैं उनके सम्मुख पहुँचते ही नेत्र बन्द हो जाते हैं !
दीवार पर संगमरमर की बनी माता पार्वती की प्रतिमा स्थित है, वहाँ भी पूजन अर्चन कर मैं बाहर आई। अभी तक भट्ट जी, देवांगन जी आदि कपड़े ही बदल रहे थे। शकुन्तला शर्मा, चन्द्रा दीदी, ज्योति और शीला पूजाकर के आ चुकीं थीं।

साथियों के आने के पश्चात् हम लोग वापस लौटे। फूल वाली दौड़ी आई, मेरे पास। ‘‘मौसी मेरे 51 रू. दे देना’’।
‘‘10 का कहकर 51 पूरे कर दिये, बड़ी चतुर हो’’। मैं वास्तव में उसकी व्यवसाय पटुता पर मुग्ध थी। बोलते समय भी मैं मंद मंद मुस्करा रही थी। मैंने 51 रू. के अभाव में उसे 52 रूपये दे दिये। गाड़ी की ओर बढ़ रही थी कि मैंने उसकी आवाज सुनी।
‘‘मौसी…. मौसी… मेरे रूपये दिलवा दो ! एक मोटी सी डोकरी ने फूल लिए 51 रू. के अब 10 टिका रही है।’’ वह हाथ नचा-नचाकर जोर जोर से बोल रही थी। ‘‘हमारे साथ की नहीं होगी’’ मैंने यूँ ही कह दिया।
‘‘तुमारे ही साथ वाली है, उस बड़ी गाड़ी से उतरी है’’। वह हमारी गाड़ी की ओर संकेत कर रही थीं।
‘‘तुमने भी तो मुझे ठगा न ? 10 रू. कह कर 51 रू. लिए, समझ लो तुमने 25 रू. का एक दोनों बेचा’’। मैंने चलते चलते उससे छुटकारा पाने की नियत से कहा।
‘‘मेरे पैसे मौसी …….? भगवान् उसे उसके कर्मों का फल देगा…… गरीब का पेट मारा है उसने ! वह चिल्लाती रही।
हम आगे बढ़े, एक आदमी सुन्दर सुन्दर लाल रंग के घोड़े बेच रहा था, उनकी पीठ पर वीरवेश में सवार बैठे थे। मैंने अभी तक कोई उपहार नहीं खरीदा था, बस इन्हें ही सबके लिए खरीद लिया।

सभी साथी कुछ न कुछ खरीद रहे थे। मुंगेली वाले जगदीश देवांगन जी ने कुछ मालाएँ खरीदीं। हम लोग आकर अपनी अपनी गाड़ियों में बैठ गये। अब तक शाम पूरी तरह घिर आई थी। (7.30) घृष्णेशवर महादेव के धाम में बिजली की रोशनी जगमगाने लगी थीं। रिम-झिम रिमझिम पानी बरसने लगा था। यहाँ पास ही ‘भद्र मारोती’ का मंदिर है, देर होती देखकर भट्टी जी ने वहाँ रुकने की अनिच्छा जाहिर की, परन्तु गाड़ी के ड्राईवरों ने हमें ले जाकर वहीं गाड़ी रोकी, जहाँ उनका जग प्रसिद्ध मंदिर है। रात के कारण अधिक समझ में नहीं आया, सड़क की दोनों ओर होटल, फल, सिंगार, आदि की दुकाने और बगल में एक बड़ा मैदान, बाजार हो या मोटर स्टेण्ड कह नहीं सकती। गाड़ी रुकी और साथी बिना किसी से कुछ पूछे भर-भराकर मंदिर की ओर चल पड़े। मैं भट्ट जी के साथ थी, और वे एक ढाबे में बैठकर चाय का आर्डर दे चुके थे।

‘‘सब लोग कहाँ गये’’।
‘‘मंदिर गये’’।
‘‘हम भी चलते हैं …ऽ…ऽ….’’?
‘‘मैं नहीं जाता’’। उन्हंें भूख लग आई थी शायद
‘‘भाई यहाँ से मंदिर कितनी दूर है’’ ? मैंने ढ़ाबे वाले से पूछा।
‘‘आप मंदिर पर ही बैठे हो’’ ! बस मैदान में इधर से चले जाओ’’। उसने दाहिनी ओर सकेत किया।
‘‘अरे हम मंदिर के पास ही हैं’’ ….ऽ….ऽ….! ! मैं भी जा रही हूँ, भइया’’ ऽ….ऽ…। कहते कहते मैं लगभग अंधेरे कच्चे रास्ते पर दौड़ पड़ी। अभी तक मुझे यह पता नहीं था कि मंदिर में कौन से देव विराजे है। – मा…रोती से मैं माँ के मंदिर की बात सोच रही थी किन्तु वहाँ पहुँच कर भ्रम टूटा।

भव्य मंदिर, सिन्दूरी रंग का है, शीर्ष पर ध्वजा लहरा रही थी, आरती हो रही थी, शायद शंख घंटा निनाद के साथ आरती के बोल संगति कर रहे थे। अभी तक तो मैं मनाती आ रही थी कि हे माँ मुझे अपने साथियों से मिला देना, क्योंकि मोबाइल का नेटवर्क काम नहीं कर रहा था। नया स्थान था, सबको खोजना मुश्किल ही था। किन्तु यहाँ आकर सारे संदेह मिट गये। मन निर्वेद से भर उठा। मुख्य मंदिर में एक घिरी हुई जगह के बीचो बीच सितारों जड़ा सिंदुरी चोला डाले, मेरे पिता शांतिपर्वूक शयन कर रहे थे। मूर्ति आठ फुट से कम लंबी क्या होगी ? माथे पर चाँदी का मुकुट, एक हाथ में गदा है तो दूसरा चोले में छिपा हुआ है। उनके पूरे शरीर पर तुलसी की माला चढ़ी थी। कलात्मक घेरे के ऊपर से झांककर मैंने उनके परम तेजोमय विग्रह का दर्शन किया। मंदिर के द्वार पर खरीदा गया लड्डू मैंने पुजारी को चढाने के लिए दे दिया। प्रसाद लेकर मंदिर में चारों ओर दृष्टि फेरी, ‘‘साथियों में से एक भी दिख जाय तो इज्जत रह जाये। सौभाग्य से जगदीश देवांगन जी पर नजर पड़ गई। तेज कदमों से चलकर उनके पास पहुँच गई।

‘‘और… लोग कहाँ गये भइया’’ ? मैंने चैन की सांस लेते हुए पूछा।
‘‘अभी अभी तो निकले हैं, गाड़ी के पास गये होंगे।’’ उन्होंने आराम से कहा।
‘‘चलिए हम लोग भी चलें’’।
‘‘आइये’’ हम दोनों उजाले से अंधेरे में आ गये, संभल संभलकर गीले मैदान को पार किया। उन्होंने हमारी गाड़ियाँ दिखाईं, चलते-चलते हम सड़क किनारे के उस होटल में पहुँचे जहाँ भट्ट जी चाय पीकर आराम से बैठे थे। यूँ भी छोटी-छोटी गलतियों पर भट्ट जी से डाँट खाती रहती हूँ, आज तो मैंने मनमानी ही की थी, अतः अपराध बोध से ग्रसित थी, जिस पर मंदिर में प्राप्त हनुमान जी के दर्शन का आनंद भारी पड़ रहा था।
‘‘आपने चाय पी ली’’। मैंने सहमते हुए पूछा।
‘‘हाँ…. आपके लिए काॅफी मंगवाई थी ? परन्तु आप चली गईं’’। उनका स्वर सामान्य अनुभव कर मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया। एक बार पुनः उन्होंने अपनी ज्येष्ठता प्रमाणित की। उन्होंने मेरे लिए काॅफी मंगवा दी। जिसे पीते-पीते मैंने बहुत अच्छा अनुभव किया।
‘‘30 रू. में खाना मिल रहा है, खा ले नहीं तो आगे नहीं मिल पायेगा।’’ कुछ और साथी आ गये थे, उन्हीं में से किसी ने कहा।
‘‘चलिए खाना खा लेते हैं’’ भट्ट जी ने कहा।
‘‘मैं नहीं खाऊँगी, मुझे उल्टी आती है’’। मैंने मना कर दिया।
शकुन्तला दीदी ने भी खाने से इन्कार कर दिया, ज्योति और शीला शर्मा को यहीं से मनमाड़ के लिए निकल जाना था। पूर्व कार्यक्रमानुसार छोटी गाड़ी वाले को अमलनेर तक का किराया देकर हम लोग अपनी बड़ी गाड़ी में बैठने वाले थे।
जब सब लोग भोजन करके आ गये तक हम दोनों गाड़ी से उतर गये।
उन दोनों ने साथ देने के लिए हमें धन्यवाद कहा। उनकी गाड़ी मनमाड़ वाले रास्ते पर मुड़ गई और हम अमलनेर की ओर बढ़ गये।
कई दिन बाद हम सभी साथी एक साथ थे, अतः उमंग से भर उठे। बीच वाली सीट पर शकुन्तला दीदी, चन्द्रा दीदी और मैं थी, आगे भट्ट जी और पीछे जय प्रकाश मानस, जगदीश देवांगन, स्वराज तिवारी, श्री हरिराम निर्मलकर जी बैठे, जब इतने सारे साहित्यकार एक स्थान पर एकत्रित हो तब शांति की उम्मीद निरर्थक थी।
‘‘मैंने एक बात देखी’’ स्वराज तिवारी ने बात छेड़ी।
‘‘क्या भइया ?’’ किसी ने पूछा।
‘‘देवांगन जी ने बहुत सारी मालायें खरीदी।’’
‘‘कितनी देवांगन जी ?’’
‘‘पाँच ली हैं।’’ वे सहज स्वर में बोले।
‘‘किनके- किनके लिए, एक भाभी, तीन बच्चियाँ ये पाँचवी माला किसके लिए’’ ? बतायेंगे कुछ’’ ?
‘‘वे मंद मंद मुस्कराते मौन रहे।’’
‘‘कोई न कोई राज है इसमें पाँचवी माला किसके लिए आखिर ?’’ वे फिर बोले।

सभी लोग पूछने लगे, पाँचवीं माला किसके लिए बताइये, अन्यथा भाभी से जाकर बतायेंगे। स्वराज तिवारी पूरी तरह देवांगन जी को छोलने के मनोभाव में थे। गाड़ी में ठहाके पर ठहाके लग रहे थे। देवांगन जी पिछली सीट पर थे, परन्तु उनका चेहरा मेरी दृष्टि सीमा में था। मैं ध्यान से उनके चेहरे पर आते जाते भावों को पढ़ने की कोशिश कर रही थी। जहाँ एक मौन मुस्कुराहट के सिवा कुछ न था, सब चिढ़ा-चिढ़ाकर हँस-हँसकर थक गये। सच कहा है किसी ने सौ वक्ता एक चुप हरावे !

कुछ समय बाद बातचीत, सामाजिक परिदृश्य, राजनीतिक परिदृश्य मानवीय संबंधों में आते बदलाव, सामजिक ढ़ांचे में आती टूटन से होते हुए अंशरीरी आत्माओं, पितरो, भूतप्रेतों, देवतों पर होती रही। कहीं तर्क तो कहीं सहमति ! स्वराज तिवारी, चन्द्रा दीदी विशेष सहभागी रहे। मैं पूरे समय हँसने- मुस्कराने को छोड़ दे तो स्रोता बनी रही। इतने बड़े बड़े विद्वानों को इतने सहज ढंग से सुनने का अवसर बार-बार कहाँ मिलता है ? मैं एक मिनट के लिए भी अपने आपसे बातें न कर सकी क्योंकि बाहर की हलचल मेरी रूचि से भिन्न नहीं थी।

कैसे समय बीत गया कुछ पता नहीं चला, जब हमारी गाड़ी प्रताप महाविद्यालय के प्रमुख द्वार पर पहुँची, रात्रि के 2 बज चुके थे। चहूँ ओर सन्नाटा और अंधकार था, सारी इमारतें, पेड़-पौधे, हाट बाट सुख निद्रा में लीन थे। हम सभी द्वार पर उतरे, गाड़ी वाले का हिसाब किया गया। फिर से पानी बरसने लगा था, हल्के-हल्के। मेन गेट पर तो ताला था, लेकिन बगल में, गोल-गोल घूमकर अन्दर जाने योग्य जगह देने वाला गेट था हम उसी से अन्दर प्रविष्ट हुए। भाई लोग अपने कमरे की ओर चले गये, हम तीनों गल्र्स हाॅस्टल की ओर। वहाँ शटर पर ताला लगा हुआ था। हमने घंटी बजाना प्रारंभ किया। साथ ही मौसी..!..मौसी ऽ….ऽ.!… मौसी पुकारने लगीं। पहले लड़कियाँ उठकर झांकी, फिर मौसी को जगाया, उसने ताला खोला। हम तीनों एक ही कक्ष में सोई। हाॅस्टल में आज, कल एैसी हलचल न थी, फिर रात्रि की नीरवता !

दीदियाँ कपड़े बदलकर सो गई। मेरी नींद उचट गई थी। वैसे भी मैं एक झपकी लेने के बाद जाग कर कुछ इधर उधर करने की आदी हूँ। पलंग पर लेटे-लेटे विचार उमड़ने-घुमड़ने लगे। ‘एलोरा’ न गये होते तो बड़ी हानि होती’, सारी मूर्तियाँ नजरों के सामने नाचने लगी, बाहूबली रावण बल के अभिमान में कैलाश उठाने लगा था, पहले देव ने उसका उत्साह बढ़ाया, फिर पार्वती को भयभीत देखकर जरा सा अंगूठे का दबाव बढ़ा दिया। पर्वत के नीचे पिचकने लगे दशानन। आर्त होकर प्रार्थना की, क्षमा मांगी तब मुक्ति हुई। लगता है जब इन गुफाओं का निर्माण हुआ तब तक पुनः हिन्दू धर्म प्रतिष्ठित हो चुका था। तभी तो हिन्दू पुराणोक्त कथाओं को जीवन्त करने का प्रयास राजा कृष्ण राज ने आठवीं शताब्दी में किया। यहाँ हिन्दू साधु संत रहते होंगे कभी। वे कारीगर भी क्या कम साधक थे, जिन्होंने पर्वत के अन्दर इतनी सुन्दर रचना कर दी।

दरवाजा खोलकर बरामदे में आई, नीचे ट्यूब की रोेशनी में नहायी नीम की गीली-गीली पत्तियाँ, पानी की बौछार में नहाये लाल गुलाब, सदासुहागन, मोंगरे, वैजयन्ती के फूल, सब कुछ बहुत अच्छा लगा। अभी तक आपाधापी में मैंने इन सबसे इतनी निकटत अनुभव नहीं की थी, मैंने प्यार भरी नजरों से देखकर उनके समक्ष अपने भाव व्यक्त किये। ‘‘प्रातः तुम सब से दूर जाना है, तुम्हारी मीठी यादें लेकर, संभवतः फिर कभी न आने के लिए।

-श्रीमती तुलसी देवी तिवारी

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