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“हिंदी का संपूर्ण व्याकरण” संदर्भ ग्रंथ के रूप में उपयोगी -प्रो डॉ एस एल गोयल

“हिंदी का संपूर्ण व्याकरण” संदर्भ ग्रंथ के रूप में उपयोगी -प्रो डॉ एस एल गोयल

“हिंदी का संपूर्ण व्याकरण” संदर्भ ग्रंथ के रूप में उपयोगी

-प्रो डॉ एस एल गोयल

"हिंदी का संपूर्ण व्याकरण" संदर्भ ग्रंथ के रूप में उपयोगी -प्रो डॉ एस एल गोयल
“हिंदी का संपूर्ण व्याकरण” संदर्भ ग्रंथ के रूप में उपयोगी -प्रो डॉ एस एल गोयल

“हिंदी का संपूर्ण व्याकरण” एक अच्छी नहीं, बहुत अच्छी कृति है, प्रामाणिक और स्तरीय। न केवल विद्यार्थियों परंतु प्राध्यापकों के लिए भी बहु उपयोगी संदर्भ ग्रंथ थोड़े में, संक्षेप में बहुत कुछ को, आवश्यक महत्वपूर्ण बातों को, न केवल समेट लेने परंतु सरलता से, स्पष्टता से समाहित कर लेने की विशेषता तो इसमें है ही । साथ ही बहुत बड़ी विशेषता है वर्ण्य या वस्तु की खूबसूरत प्रस्तुति, रेखीय चार्ट या रेखा चित्रों के माध्यम से । अत्यंत प्रभावशाली व खूबसूरत प्रस्तुति ने इस पुस्तक में चार चांद लगा दिए हैं।

हिंदी और भाषा विज्ञान में अलग अलग दो बार पी.एच .डी .एवं दो बार डी.लिट. करने वाले विद्वान प्राध्यापक लेखक के अनुसार “भाषा के शुद्ध प्रयोग और उसके नियमों की व्याख्या करने वाला शास्त्र ही व्याकरण है “, तो यह पुस्तक विशुद्ध व्याकरण की नहीं है । इसमें संघ एवम् राज्य लोक सेवा आयोगों और विभिन्न सेवाओं की प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं के पाठ्यक्रम को ध्यान रखते हुए तीन खंड सामान्य हिंदी के है । जिसमें भाषा विज्ञान और सामान्य इतर सामग्री सन्निहित है, परंतु जो हिंदी के भाषा ज्ञान के लिए, किसी भी हिंदी वाले के लिए आवश्यक भी लगती है।

हिंदी व्याकरण के पितृ पुरुष कामता प्रसाद गुरु ने अपने हिंदी व्याकरण की प्रस्तावना में इस संदर्भ में जो ’सर्वांग पूर्ण ’शब्द का प्रयोग किया है यह वैसी ही पुस्तक है। साहित्य का इतिहास ,संबंधित पुरस्कार व सम्मान ,विश्व हिंदी सम्मेलन ,आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाएं, वैदिक कालीन प्राचीन भारतीय ग्रंथ आदि बिंदु सभी हिंदी प्रेमियों के लिए इसे पठनीय व आकर्षक बनाते हैं ।

यह अद्यतन भी है । भाषा का मानकीकरण संबंधी बिंदु भी इसमें है ।लेखक की दृष्टि अत्यंत सूक्ष्म है ।एक छोटा सा उदाहरण देखें कि विशेष वर्ण के तहत अर्द्ध व्यंजनों के लेखन प्रयोग में भिन्नता के कारण बहुत सारे लोग ,अच्छे अच्छे पढ़े-लिखे भी यह नहीं पहचानते कि इनमें कौन सा आधा वर्ण है कौन सा पूरा ।और कौन-कौन से व्यंजन मिले हुए हैं । पुस्तक में इसको भी पृथक से अभिव्यक्त किया है ।

यह पुस्तक अपने विषय की श्रेष्ठ पुस्तकों की श्रेणी में परिगणित की जाएगी ,इसका मुझे विश्वास है। यह विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में पाठ्य एवं संदर्भ ग्रंथ के रूप में रखी जाने योग्य है।
इतनी अच्छी कृति के लिए दोनों विद्वान लेखकों को बहुत-बहुत साधुवाद एवम बधाई ।

-प्रो डॉ एस एल गोयल
(से. नि.) प्राचार्य/हिंदी विभागाध्यक्ष
शासकीय महाविद्यालय, जावद नीमच (म. प्र.)
📱 98273 06660

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