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किन्नर व्यथा भाग-3 -डॉ. अशोक आकाश

किन्नर व्यथा भाग-3 -डॉ. अशोक आकाश

गतांक से आगे

किन्नर व्यथा भाग-3

किन्नर व्यथा भाग-3
किन्नर व्यथा भाग-3
किन्‍नर व्‍यथा (सार छंद), भाग-3

दिव्यॉग दलित शोषित नारी, जन पीड़ा घन चर्चा |
किन्नर टोली निरखत करे क्‍यों, व्यंग्य बाण कटु बरसा ||
अर्धनारी पुरुष तन तब क्या, यह इंसान नहीं है |
सामाजिक समरस सुधि सिरजन,  क्‍यों फिर स्थान नहीं है ||1||

कब उठेगी शिष्ट समाज में, रमक वेदना आंधी |
असभ्यता की जिसने अपनी, अनहद सरहद लांघी ||
जिसको चाहा धन यौवन क्या, प्राण निछावर कर दे |
संकट विघन स्वयं सर वारे, दामन खुशियां भर दे ||2||

सबका सुखमय परिजन देखे, अंतस तम मन रोता |
कुदरत कमी नहीं की होती, परिजन वर्धन होता ||
धरा प्रेम पथ अतुलित सागर, सुचि मृदुवाणी तरसे |
यह भी मानव इन पर पग पग, घृणा उपेक्षा बरसे ||3||

विधि का सिरजन नही निरर्थक, विसद नेह बरसाओ |
ईश्वरी प्रदत्त देह का, जग में मान बढ़ाओ ||
सभी मानवीय गरिमाओं का, इसे हकदार बनादो |
परिवार में इज्जत का दर्जा, जन आधार घना दो || 4 ||

थोथा जीवन घिना उपेक्षा, सतत खोखली ताली |
उच्च कर्म पर भी अपमानित, ऐसा जीवन गाली ||
शापित अर्थहीन जीवन से, भले दुखद मर जायें |
धिकमय जीवन पल छिन चुभता, किन्नर व्यथा बताएं ||5 |||



-डॉ. अशोक आकाश

शेष अगले अंक में

5 responses to “किन्नर व्यथा भाग-3 -डॉ. अशोक आकाश”

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