क्या क्रय शक्ति की जरूरत है?
प्रोफेसर अर्जुन दूबे
क्रय शक्ति -Purchasing Power -कैसे प्राप्त कर सकते हैं. सीधा सा उत्तर लोग देते हैं कि धन अथवा रूपया हो तो क्रय करना कौन सा मुश्किल काम है। रूपया हो तो महंगी वस्तु सस्ती हो जाती है, नही होने पर सस्ती ही महंगी लगती है ।
अब रूपया कैसे मिले? बिजिनेस कर के, जिसमें रूपया चाहिए निवेश करने के लिए तब Money begets money फलीभूत होता है और जिसमें Risk फैक्टर भी सम्मिलित होता है, दूसरा खेती जिसके लिए खेत चाहिए और साथ ही रुपया चाहिए खेती के संसाधन के लिए, इसमें भी Risk सम्मिलित है, वह Risk बाजार का भी हो सकता है, वह प्रकृति द्वारा भी कुछ फसलों के संदर्भ में; तीसरा माध्यम श्रम /मजदूरी के द्वारा रूपया प्राप्त करना होता है लेकिन इसमें तो Risk रोज रोज सम्मिलित है काम मिलने अथवा नहीं मिलने का! चौथा है चोरी करके, डाका डालकर अथवा जान लेकर, इसमें तो भयंकर Risk होता है पर देखो बिरले ही इससे डरते हैं!
रूपया है तो क्रय शक्ति है, नहीं तो सब निरर्थक! रूपया है तो तथाकथित गुणात्मक शिक्षा प्राप्त करें, रूपये के प्रतिस्पर्धा क्षेत्र में जाइए, रूपया है तो भोजन पानी का प्रबंध करें, नहीं तो “तर धरती ऊपर आकाश! “
किंतु भोजन के लिए परेशान नहीं होना है, बस एक कार्ड बनवाना है, फ्री में जीने के लिए गेहूं और चावल मिल जायेगा, पकाने के लिए गैस एवं सिलेंडर, कभी कभी तेल और मुंह मीठा करने के लिए चीनी भी! बिमार पड़ गये तो एक लाल कार्ड होगा जिसे देखते ही वैद्य भी वैद्य धर्म करने में संकोच नहीं करेंगै!
क्या अब जरूरत है प्रतिस्पर्धा के संसार में घुसने की?
शिक्षा चाहिए, शिक्षा जरूरी है क्या? शिक्षा का विकल्प क्या है? ज्ञान! ज्ञान अपने पास रखो.क्या! वह भी तो वही है जिसका प्रबंध बस कार्ड द्वारा हो जाता है. अब श्रम की भी क्या जरूरत है? जरूरत है ,कम से कम उस कार्ड को लेकर फ्री वाला लाने में!
मतलब कुल मिलाकर तो यह हुआ कि काम मिलना चाहिए चाहे शिक्षा देने की हो, श्रम करने की हो, नौकरी करने की यदि मिलती है, कुछ धंधा करने की इत्यादि इत्यादि! तभी तो क्रय शक्ति शरीर में आयेगी न!
किसे सुना रहे हैं? क्यों! Habit is the second nature. फ्री का नशा सबसे खतरनाक होता है ! पहले फ्री, पर कब तक? बाद में काम देकर काम करवा लो, फ्री बंद करके देखो!
अब समय चक्र फ्री के कंपटिशन का हैं, हम हैं न! फ्री का दायरा बढाये़गें, बस मेरे पास आते रहो । जिंदगी ही एक नशा है, नशे में जीओ, मरना तो एक दिन सबको है ।
-प्रोफेसर अर्जुन दूबे