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पुस्तक समीक्षा: माटी गावय गीत मया के-शिवकुमार अंगारे

पुस्तक समीक्षा: माटी गावय गीत मया के-शिवकुमार अंगारे

छत्तीसगढ़ी लोक-भावना की सशक्त अभिव्यक्ति छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह – माटी गावय गीत मया के

समीक्षक- डुमन लाल ध्रुव


छत्तीसगढ़ी साहित्य ने अपनी मौलिकता, लोकधर्मी चेतना और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े स्वरूप के कारण आधुनिक भारतीय साहित्य में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए सुप्रसिद्ध गीतकार एवं कवि श्री शिवकुमार अंगारे (ग्राम मटिया) की कृति “ माटी गावय गीत मया के ” छत्तीसगढ़ी काव्य-संस्कृति का अनूठा दस्तावेज है। इस संग्रह में कुल अठहत्तर रचनाएं संकलित हैं जो जीवन, प्रकृति, लोक-परंपरा, तिहार-पर्व, पर्यावरण, किसान-श्रमिक, राष्ट्रीय भावना और मानवीय संवेदनाओं के विभिन्न पहलुओं को छूती हैं।

यह संग्रह छत्तीसगढ़ी लोकमानस के विविध रंगों को समेटे हुए है। जिसमें धार्मिक एवं आध्यात्मिक स्वर – “सरस्वती वंदना”, “राम ल भज के देख”, “राम बनवास” आदि रचनाओं में भक्ति और आस्था का भाव गहन रूप से प्रतिफलित होता है।

प्रकृति और ऋतु-चित्रण – “सवनाही बादर”, “फागुन आगे”, “बसंत बगरगे”, “रिमझिम बरसे पानी”, “रंगहा फागुन” जैसी कविताएं ऋतु-चक्र के बदलते सौंदर्य और उससे जुड़े लोकजीवन की झांकी प्रस्तुत करती है।

लोकपर्व एवं तिहार – “तिहार चौमासा”, “राखी के तिहार”, “हरेली तिहार”, “स्वतंत्रता तिहार” आदि कविताएं छत्तीसगढ़ी तीज-त्यौहारों की लोकमंगलकारी परंपरा को जीवित करती है।
ग्रामीण जीवन और श्रम-संवेदना – “जय होय किसान”, “लुवे ल जाबो धान”, “भुइयां के भगवान”, “मनखे-मनखे एक समान” जैसी कविताएं श्रमवीरों और कृषक जीवन के संघर्ष एवं गौरव का चित्रण करती है।

सामाजिक चेतना एवं समकालीन सरोकार – “राजनीति के खेल”, “पर्यावरण के परान”, “बिन पानी सब सून”, “कोरोना मुड़ पिरोना” जैसी कविताएं सामाजिक-राजनीतिक विडंबनाओं एवं आधुनिक चुनौतियों की ओर संकेत करती है।

ममता और मानवीय रिश्ते – “बेटी ल सम्मान देव”, “मया के डोरी”, “संगवारी के मया” जैसी रचनाएं रिश्तों की ऊष्मा और जीवन में प्रेम-ममता की अनिवार्यता को प्रकट करती हैं।
कवि शिवकुमार अंगारे की भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और बोलचाल की छत्तीसगढ़ी है जिसमें लोकबोलियों का माधुर्य और सांस्कृतिक गंध है। कवि के यहां लोक-लय और गीतात्मकता प्रमुख है, जिससे रचनाएं गेय बन जाती है।

प्रतीक और बिंब लोकजीवन से ही उठाए गए हैं जैसे— माटी, बादर, फागुन, धान, मोर धरती, तिरंगा, दीया आदि। सामाजिक संदेश को सरल शैली में प्रस्तुत किया गया है जो पाठकों और श्रोताओं दोनों को जोड़ता है।

यह संग्रह छत्तीसगढ़ी जीवन का सांस्कृतिक कोष है। इसमें गांव के खेत-खार, तिहार-त्यौहार, लोकगीत, धार्मिक आस्थाएं, सामाजिक रिश्ते और आधुनिक समय की चुनौतियां सब समाहित है। इसीलिए यह केवल काव्य-संग्रह नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ी लोक-जीवन का सजीव दस्तावेज है।

साथ ही इसमें राष्ट्रीय चेतना का भी व्यापक प्रसार है। “तिरंगा फहराबो”, “भारत के माटी चंदन”, “स्वतंत्रता तिहार” जैसी रचनाएं भारतीय अस्मिता और गौरव का गान करती है।

गीतकार – कवि श्री शिवकुमार अंगारे की “माटी गावय गीत मया के” संग्रह छत्तीसगढ़ी कविता की लोकधर्मी परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह कृति माटी, मया और मानुष के गहरे रिश्तों को उजागर करती है। इसमें जहां लोकजीवन की सोंधी महक है, वहीं आधुनिक समय की समस्याओं और चुनौतियों की ओर भी सजग दृष्टि है।

अतः यह संग्रह न केवल साहित्यिक दृष्टि से समृद्ध है बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना को भी पुष्ट करने वाली महत्वपूर्ण कृति है।

– डुमन लाल ध्रुव
मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)
    पिन – 493773

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