Sliding Message
Surta – 2018 से हिंदी और छत्तीसगढ़ी काव्य की अटूट धारा।

नीति के दोहा-दोहा पचासा

नीति के दोहा-दोहा पचासा

नीति के दोहा-दोहा पचासा

नीति के दोहा छत्‍तीसगढ़ी

-रमेश चौहान

नीति के दोहा-दोहा पचासा
नीति के दोहा-दोहा पचासा

संस्‍कृति अउ कुरीति म अंतर कर

1.
अपन सबो संस्कार ला, मान अंध विश्वास ।
संस्कृति ला कुरीति कहे, मालिक बनके दास ।

2.
पढ़े लिखे के चोचला, मान सके ना रीति ।
कहय ददा अढ़हा हवय, अउ संस्कार कुरीति ।।

3.
रीति रीति कुरीति हवय, का बाचे संस्कृति ।
साफ-साफ अंतर धरव , छोड़-छाड़ अपकृति ।।

4.
दाना-दाना अलहोर के, कचरा मन ला फेक ।
दाना कचरा संग मा, जात हवय का देख ।।

5.
धरे आड़ संस्कार के, जेन करे हे खेल ।
दोषी ओही हा हवय, संस्कृति काबर फेल ।।

6.
दोषी दोषी ला दण्ड दे, संस्कृति ला मत मार ।
काली के गलती हवय, आज ल भला उबार ।।

सियानी गोठ

7.
झेल घाम बरसात ला, चमड़ी होगे पोठ ।
नाती ले कहिथे बबा, मान सियानी गोठ ।।

8.
चमक दमक ला देख के, बाबू झन तैं मात ।
चमक दमक धोखा हवय, मानव मोरे बात ।।

9.
मान अपन संस्कार ला, मान अपन परिवार ।
झूठ लबारी छोड़ के, अपने अंतस झार ।।

10.
मनखे अउ भगवान के, हवय एक ठन रीत ।
सबला तैं हर मोह ले, देके अपन पिरीत ।।

11.
बाबू मोरे बात मा, देबे तैं हर ध्यान ।
सोच समझ के हे कहत, तोरे अपन सियान ।।

12.
कहि दे छाती तान के, हम तोरे ले पोठ ।
चाहे कतको होय रे, कठिनाई हा रोठ ।।

सच ठाढ़े अपने ठउर

13.
चारे मछरी के मरे, तरिया हा बस्साय ।
बने बने भीतर हवय, बात कोन पतियाय ।।

14.
सच ठाढ़े अपने ठउर, घूमय झूठ हजार ।
सच हा सच होथे सदा, झूठ सकय ना मार ।।

15.
बुरा बुरा तैं सोचथस, बुरा बुरा ला देख ।
बने घला तो हे इहां, खोजे मा अनलेख ।।

16.
अपन करम ला सब करव, देखव मत मिनमेख ।
देखे मा गलती दिखय, तोरे मा अनलेख ।।

17.
जइसे होथे सोच हा, तइसे होथे काम ।
स्वाभिमान राखे रहव, होही तोरे नाम ।।

मुखिया

18.
होथे जस दाई ददा, होवय मुखिया नेक ।
गांव राज्य या देश के, मुखिया मुखिया एक ।

19.
मुखिया के हर काम के, एक लक्ष्य तो होय ।
रहय मातहत हा बने, कोनो झन तो रोय ।।

20.
काम बुता मुखिया करय, जइसे भइसा ढोय ।
अपने घर परिवार बर, सुख के बीजा बोय ।।

21.
घुरवा कस मुखिया बनय, सहय ओ सबो झेल ।
फेके डारे चीज के, करय कदर अउ मेल ।।

22.
सोच समझ मुखिया बनव, गांव होय के देश ।
मुखिया मुॅंह कस होत हे, जेन मेटथे क्लेश ।।

पीरा सहे न जाय

23.
लात परे जब पीठ मा, पीरा कमे जनाय ।
लात पेट मा जब परय, पीरा सहे न जाय ।।

24.
काम बुता ले हे बने, पूरा घर परिवार ।
काम छुटे मा हे लगे, अपने तन हा भार ।।

25.
लगे काम ला कोखरो, काबर तैं छोड़ाय ।
मारे बर तैं मार ले, अब कोने जीआय ।।

26.
काम बुता के नाम हा, जीवन इहां कहाय ।
बिना काम के आदमी, जीयत मा मर जाय ।।

दारू के लत

27.
दारू मंद के लत लगे, मनखेे मर मर जाय ।
जइसे सुख्खा डार हा, लुकी पाय बर जाय ।।

28.
तोरे पइसा देह हे, कर जइसे मन आय ।
पी-पा के तैं हा भला, काबर जगत सताय ।

29.
मान बढ़ाई तैं भला, राखे काखर सोच ।
गारी-गल्ला देइ के, लेथस इज्जत नोच ।।

30.
कुकुर असन तैं तो भुके, बिलई कस मिमिआय ।
कभू शेर सियार बने, समझ नई कुछु आय ।।

31.
बने भिखारी दारू बर, बेचे अपन इमान ।
पाछू तैं देखात हस, आन बान अउ शान ।।

धरम-करम

32.
धरम धरम के शोर हे, जाने धरम ल कोन ।
कट्टर मन चिल्लाय हे, धरमी बइठे मोन ।।

33.
पंथ पंथ के खेल ले, खेले काबर खेल ।
एक पेड़ के हे तना, तभो दिखय ना मेल ।।

34.
अपन सुवारथ मा करे, धरम करम के मोल ।
हत्या आस्था के करे, अपने बजाय ढोेल ।।

35.
भक्त बने के साध मा, मनखे हे बउराय ।
गिद्ध बाज मन ला घला, अपनेे गुरू बनाय ।।

36.
गुरू भक्ति के जोश मा, माने ना ओ बात ।
छोड़ सनातन बात ला, रचे अपन औकात ।।

37.
एक गांठ हरदी धरय, अइसन गुरू हजार ।।
चार वेद हा सार हे, होये पंथ हजार ।

38.
बेटा मारे बाप ला, अपन ल बड़े बताय ।
अइसन गुरू घंटाल हा, अपने पंथ बनाय ।।

39.
बाट सनातन धर्म ला, डंका अपन बजाय ।
सागर मा होकेे खड़ा, सागर खुदे कहाय ।।

40.
भेद संत के कोन हा, आज जान हे पाय ।
संत कभू बाजार मा, ठाठ-बाठ देखाय ।।

41.
ज्ञानी घ्यानी संत हा, करे सनातन गान।
अपन बड़ाई छोड़ के, करथे सबके मान ।।

42.
परम तत्व केे खोेज मा, रहिथे जेन सहाय ।
जंगल झाड़ी हे कहां, हमला कोन बताय ।।

43.
अपन अपन आस्था हवय, धरव जिहां मन भाय ।
धरे हवस तैं जान के, बिरथा दोश लगाय ।।

44.
तोरे आस्था हे बड़े, मोर कहां कमजोर ।
जाबो एके घाट मा, जिहां बसे चितचोर ।।

45.
तोरे आस्थ हा गढ़े, कोनो ला भगवान ।
पथरा पथरा ला मिले, तभे इहां सम्मान ।।

नीति के दोहा

46.
नई होय छोटे बड़े, जग के कोनो काम ।
जेमा जेखर लगे मन, ऊही ले लौ दाम ।।

47.
सक्कर चाही खीर बर, बासी बर गा नून ।
कदर हवय सबके अपन, माथा तै झन धून ।।

48.
निदा निन्द ले धान के, खातू माटी डार ।
पढ़ा लिखा लइका ल तैं, जीनगी ले सवार।।

49.
महर महर चंदन करय, अपने बदन गलाय ।
आदमी ला कोन कहय , देव माथा लगाय ।।

50.
सज्जन मनखे होत हे, जइसे होथे रूख ।
फूलय फरय दूसर बर, चाहे जावय सूख ।।

51.
जम्मो इंद्री बस करे, बगुला करथे ध्यान ।
जेन करय अइसन करम, होवय ओखरमान ।।

-रमेश चौहान

दोहा छंद विधान

दोहा छंद विधान को विस्‍तार से जानने के लिए कृपया इस लिंक पर जाए-दोहा छंद विधान

रमेश चौहान के छत्‍तीसगढ़ी रचना पढ़े बर इहां पधारव – छत्‍तीसगढ़ी छंद कविता के कोठी

4 responses to “नीति के दोहा-दोहा पचासा”

  1. Satyadhar Bandhe Avatar
    Satyadhar Bandhe
    1. Ramesh kumar Chauhan Avatar
  2. U.k.sahu assit.pro. Avatar
    U.k.sahu assit.pro.
    1. Ramesh kumar Chauhan Avatar

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

अगर आपको ”सुरता:साहित्य की धरोहर” का काम पसंद आ रहा है तो हमें सपोर्ट करें,
आपका सहयोग हमारी रचनात्मकता को नया आयाम देगा।

☕ Support via BMC 📲 UPI से सपोर्ट

AMURT CRAFT

AmurtCraft, we celebrate the beauty of diverse art forms. Explore our exquisite range of embroidery and cloth art, where traditional techniques meet contemporary designs. Discover the intricate details of our engraving art and the precision of our laser cutting art, each showcasing a blend of skill and imagination.