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पेंग बाल नाटक संकलन नाटक-4.सुखद सवेरा-रवीन्द्र प्रताप सिंह

पेंग बाल नाटक संकलन नाटक-4.सुखद सवेरा-रवीन्द्र प्रताप सिंह

पेंग बाल नाटक संकलन-

पेंग बाल नाटक संकलन पांच नाटकों का संग्रह जिसे हम धारावाहिक क्रम में पेंग के पांच नाटकों का प्रकाशन कर रहे हैं । इसके चौथे भाग में प्रस्‍तुत है बाल नाटक ‘सुखद सवेरा’ ।

नाटक-4: सुखद सवेरा

-रवीन्द्र प्रताप सिंह

पेंग बाल नाटक संकलन नाटक-4.सुखद सवेरा-रवीन्द्र प्रताप सिंह
पेंग बाल नाटक संकलन नाटक-4.सुखद सवेरा-रवीन्द्र प्रताप सिंह

पात्र

कूमिस : भालू
लिन्नू : खरगोश
ब्लूई : नीली छोटी चिड़िया
श्रमिक भेड़िया दल
स्थान : जंगल
समय : सुबह

(एक छिपे- छिपे से स्थान पर एक पत्थर पर कूमिस बैठा है। वह गीत गा रहा है। )
कूमिस : (गीत )

मैं कला भालू , मैं सुन्दर भालू ,
नाप दिया है मैंने पूरा जंगल।
सिंहासन पाना है मुझको
बहुत शीघ्र ही , बहुत शीघ्र ही।
मैंने तिकड़म खेल किया है ,
अपनों को ही रोले दिया है,
मैं काला भालू , मैं प्यारा भालू।
मैं सुन्दर भालू , वीर साहसी
मैं जंगल राजा भालू !

लिन्नू : अमा , तो ये है आपकी चाल… यही मैं सोचूँ!…

कूमिस : अरे कौन बोला ! (आश्चर्य से ) कौन बोला ! कौन बोला रे !

लिन्नू : (गुस्से में )तेरा काल बोला , काल बोला , काल बोला रे ! (गुस्से में )
(लिन्नू निकल कर सामने आता है। )

कूमिस : अरे छोटे खरगोश ! तेरी ये धृष्टता ! ये हिम्मत तेरी मूर्ख खरगोश !

लिन्नू : अरे वाह ! ये मेरी हिम्मत की बात करेगा ! किसकी हिम्मत की बात कर रहा है तू , कूमिस… मैं तो तुझे जंगल का शुभचिंतक समझता था , और तू तो…

कूमिस : (खीझते हुये )क्या? क्या ? मैं क्या ? क्या सुना तूने ?

लिन्नू : मैंने सुना भी , देखा भी , समझा भी !

कूमिस : अपनी सीमा में ही रहना ठीक है खरगोश !

लिन्नू : एक सच्चे नागरिक की सीमा उसका पूरा देश होती है ,और उसकी अच्छी भावनाओं की सीमा , सिर्फ देश ही नहीं , पूरी दुनिया।

कूमिस : इधर उधर की बातें छोड़ , बता क्या कहता है तू ?

खरगोश : कूमिस , पहले मर्यादित भाषा का प्रयोग करना सीखो।

(अचानक श्रमिक भेड़ियों का झुण्ड उधर से गुजरता है। पांच श्रमिक भेड़िया है। वे लोग गाते हुये चले जा रहे हैं। )
श्रमिक भेड़ियों के गीत :

अपनी मेहनत की बूंदों से
जंगल की मिटटी तर कर दें ,
कहो भाइयो हाथ मिलाकर,
इस धरती पर अमृत ला दें।
अपना ही श्रम बिंदु अमृत है ,
अपना ही श्रम शक्ति हमारी।
श्रमिक भेड़ियों के स्वर से
गूंजेगी धरती सारी,
गूंजेगी धरती सारी।

(कूमिस और लिन्नू शांतिपूर्वक अपने स्थानों से उस श्रमिक भेड़िया झुण्ड को देख रहे हैं।
धीरे धीरे दल चला जाता है। )
कूमिस :(शांत भाव से ) देखो लिन्नू , हमने परंपरा का पालन किया। हमने ही इस जंगल में नियम बनाये हैं कि जब भी काम में निरत लोग निकलें , कोई व्यवधान न डाला जाये।

लिन्नू : बहुत अच्छी बात है। बिलकुल ठीक। बिलकुल सटीक..लेकिन…

कूमिस : लेकिन क्या, छोटे खरगोश !
(अचानक ब्लूई की आवाज़ )

ब्लूई : अरे कूमिस , तुम्हे लिन्नू नहीं , उससे भी छोटी , सबसे छोटी चिड़िया ब्लूई बतायेगी ! (कूमिस बहुत तेज़ी से हँसता है। )

लिन्नू : (प्रसन्न होकर ) अरे ब्लूई ! कैसी हो तुम मेरी दोस्त !

ब्लूई : मैं ठीक हूँ , थोड़ी सी व्यस्त थी। एक संगीत प्रतियोगिता में गयी थी।

(कूमिस लिन्नू और ब्लूई की बातों से थोड़ा ससंकित होकर , खिसक कर भागना चाहता है। ब्लूई उसका इरादा भांप जाती है। )
ब्लूई : हाँ तो कूमिस जी आप कौन सा गीत जंगल के एकांत में गा रहे थे ?

लिन्नू : आप जंगल में व्यवस्थापक हो गए तो क्या राज्य के साथ धोखा करेंगे ? मैंने पूरा सुना है।
आप गा रहे थे गीत :

मैं कला भालू , मैं सुन्दर भालू ,
नाप दिया है मैंने पूरा जंगल।
सिंहासन पाना है मुझको
बहुत शीघ्र ही , बहुत शीघ्र ही।
मैंने तिकड़म खेल किया है ,
अपनों को ही रोले दिया है,
मैं काला भालू , मैं प्यारा भालू।
मैं सुन्दर भालू , वीर साहसी
मैं जंगल राजा भालू !

कूमिस : (मुस्कराते हुये ) मुझसे पंगा लेने का अंजाम जानते हो छोटे दोस्तों !

ब्लूई : जो लोग सच्चे रास्ते पर ईमानदारी से चलते हैं भय उनसे दूर ही रहता है। मेरे पास आपके काले कारनामों की पूरी सूची है। आपने जंगल में दुश्मन शिकारियों को अपने वेश में घुसा दिया है। मेरे पास इसका प्रमाण है। ला दूँगी सामने।
(कूमिस सकपका जाता है। )

कूमिस : अरे दोस्तों !

लिन्नू : ये मत सोचो दोस्त कूमिस की शक्ति मिलने पर दायित्व की चिंता नहीं करनी चाहिये।

ब्लूई : शक्ति और दायित्व एक सिक्के के दो पटल हैं , कूमिस !

कूमिस : दोस्तों , मुझे मेरी गलती का अहसास हो गया है। अनुभव हो गया है।

लिन्नू : हमारी अनुभूति ही हमें जीवित जीव बनती है।
(अचानक श्रमिक भेड़ियों का दूसरा झुण्ड गुजरता है। गीत गाते हुये। )

श्रमिक भेड़ियों का गीत :

हर एक नागरिक इस जंगल का
जिस दिन काम करेगा अपने से
जंगल को अपना घर देखेगा अपने से
वह कितना सुखद सवेरा होगा ,
जीवन झूमेगा खुश होकर !

कूमिस : दोस्तों , हमें अहसास है। अगर आप कहें तो हम लोग भी कुछ गा सकते हैं। (कूमिस का गला रुँधा हुआ है। )

ब्लूई : क्यों नहीं , क्यों नहीं दोस्त !

लिन्नू : हाँ क्यों नहीं , आप गाइये मेरे साथ , दोहराइये –

जब सम्हलें हम तभी सवेरा
यूँ तो अँधियारा किसी समय भी
घिर आ सकता , छा जा सकता ,
सोच अगर है उजियारे की ,
तो वह इसी सोच से डरता।
(सभी गाते हैं )
अंधियारे न छाने देंगे ,
हम जंगल श्रेष्ठ बनायेंगे,
हम अपने कर्तव्यों को गुनकर,
अँधियारा दूर भगायेंगे।
जब सम्हलें हम तभी सवेरा
यूँ तो अँधियारा किसी समय भी
घिर आ सकता , छा जा सकता ,
सोच अगर है उजियारे की ,
तो वह इसी सोच से डरता।


(पर्दा धीरे धीरे गिरता है। )

समाप्त

प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह लखनऊ

(प्रो रवीन्द्र प्रताप सिंह लखनऊ विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर हैं। वे अंग्रेजी और हिंदी लेखन में समान रूप से सक्रिय हैं । फ़्ली मार्केट एंड अदर प्लेज़ (2014), इकोलॉग(2014) , व्हेन ब्रांचो फ्लाईज़ (2014), शेक्सपियर की सात रातें (2015) , अंतर्द्वंद (2016), चौदह फरवरी (2019),चैन कहाँ अब नैन हमारे (2018)उनके प्रसिद्ध नाटक हैं। बंजारन द म्यूज(2008) , क्लाउड मून एंड अ लिटल गर्ल (2017),पथिक और प्रवाह (2016) , नीली आँखों वाली लड़की (2017), एडवेंचर्स ऑव फनी एंड बना (2018),द वर्ल्ड ऑव मावी(2020), टू वायलेट फ्लावर्स(2020) प्रोजेक्ट पेनल्टीमेट (2021) उनके काव्य का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने विभिन्न मीडिया माध्यमों के लिये सैकड़ों नाटक , कवितायेँ , समीक्षा एवं लेख लिखे हैं। लगभग दो दर्जन संकलनों में भी उनकी कवितायेँ प्रकाशित हुयी हैं। उनके लेखन एवं शिक्षण हेतु उन्हें स्वामी विवेकानंद यूथ अवार्ड लाइफ टाइम अचीवमेंट , शिक्षक श्री सम्मान ,मोहन राकेश पुरस्कार, भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार एस एम सिन्हा स्मृति अवार्ड जैसे सत्रह पुरस्कार प्राप्त हैं ।)

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