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पुस्तक समीक्षा:फिर बोल उठी

पुस्तक समीक्षा:फिर बोल उठी

वेदना और विद्रोह का संतुलित स्वर देवनारायण गायकवाड़ “नगरिया” की काव्य-कृति फिर बोल उठी

समीक्षक: डुमन लाल ध्रुव

छत्तीसगढ़ी एवं हिन्दी साहित्य में काव्य-सृजन की परंपरा निरंतर सामाजिक यथार्थ, संवेदना और संघर्ष की अभिव्यक्ति करती रही है। इस परंपरा में कवि देवनारायण गायकवाड़ “नगरिया” की कृति फिर बोल उठी विशेष महत्व रखती है। यह काव्य-कृति केवल काव्य-रचनाओं का संकलन नहीं है बल्कि जीवन, समाज और मानवीय मूल्यों का सजीव दस्तावेज है।

काव्य संग्रह – फिर बोल उठी में लगभग 70 से अधिक कविताएं संकलित हैं जिनके शीर्षक ही अपने आप में प्रश्न, आक्रोश, वेदना और आत्मसंघर्ष के प्रतीक हैं। मैं हूं, उस न्यायालय तक, प्रश्न, कौन लिखेगा परिभाषा, दिल्ली है गवाही, मर्यादा की पाठशाला, परीक्षा का रहस्य, जला दो, दहेज, नारी जीवन, कत्ल इश्क का, लहू और आंसू, मानव मूल्य का अभियान, स्वाभिमान, अमर सुहाग, स्मृति, उल्लास रेखा, आज ऐसे खेले होली इन शीर्षकों से स्पष्ट है कि कवि ने व्यक्तिगत अनुभवों के साथ-साथ सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक मुद्दों को भी अपनी कविता का विषय बनाया है।

काव्य-कृति की सामग्री को मोटे तौर पर चार प्रमुख धाराओं में बांटा जा सकता है–

सामाजिक यथार्थ और प्रश्नबोध की कविताएं उस न्यायालय तक, प्रश्न, सम्हल के, दिल्ली है गवाही, जमानत, कातिल, पर्दाफाश आदि व्यवस्था, न्याय और सामाजिक अन्याय पर गहरी चोट करती हैं। कवि यहां प्रश्न करता है कि न्याय और व्यवस्था का असली चेहरा आखिर जनता के सामने क्यों नहीं आता।

नारी जीवन और संघर्ष –

कवि ने नारी जीवन की पीड़ा और विद्रोह को मुखरता दी है। तू बोलती क्यों नहीं, वो फिर बोल उठी, नारी जीवन, विधवा, ममता की तिजोरी, मां की ममता, अमर सुहाग जैसी कविताएं स्त्री अस्मिता, उसकी पीड़ा और स्वाभिमान का सशक्त चित्र प्रस्तुत करती है। संघर्ष, विद्रोह और आत्मसंघर्ष – प्रतिशोध की ज्वाला, अंतद्वंद, अंतर्मन, संकल्प की सोपान, स्वाभिमान जैसी कविताएं कवि के भीतर चल रहे संघर्ष और परिवर्तन की आकांक्षा को दर्शाती है।

स्मृति, ममता और मानवीय मूल्य –

स्मृति, उल्लास रेखा, वह दिन कैसे भूल सकूंगी, आज ऐसे खेले होली, मानव मूल्य का अभियान जैसी कविताएं रिश्तों, स्मृतियों और जीवन की कोमल संवेदनाओं का स्पर्श कराती है।
कवि की भाषा सरल, सहज और भावनात्मक है। कहीं-कहीं छत्तीसगढ़ी लोकभाषा का प्रभाव भी झलकता है। कविताओं में सशक्त बिंबों और प्रतीकों का प्रयोग हुआ है – आंसू, लहू, कफन, श्रृंखला, तिजोरी, परिभाषा, पाठशाला, गवाही आदि प्रतीकात्मक बिम्बों के माध्यम से कवि ने गहन विचार प्रकट किए है। रचनाओं में बार-बार प्रश्न उठाने की शैली दिखाई देती है। यह प्रश्न कवि की बेचैनी और सामाजिक असमानताओं के प्रति असंतोष का प्रमाण है।

कवि की लेखनी हर बार न्याय, सत्य और मानव मूल्यों की स्थापना की ओर उन्मुख है।

आज के समय में जब समाज में भ्रष्टाचार, स्त्री-शोषण, अन्याय और असमानता जैसी समस्याएं बढ़ती जा रही है, तब फिर बोल उठी जैसी कृतियां हमें सचेत करती है। यह संग्रह पाठक को केवल भावुक नहीं करता बल्कि उसे आवामत उठाने और बदलाव मानो की ओर प्रेरित करता है। विशेषकर स्त्री-जीवन पर केन्द्रित कविताएं वर्तमान नारी विमर्श से भी सीधे संवाद करती है।

कवि देवनारायण गायकवाड़ “नगरिया” की फिर बोल उठी एक ऐसी काव्य-कृति है जिसमें वेदना और विद्रोह का संतुलित स्वर सुनाई देता है। यह कृति सामाजिक-न्याय की पुकार है, नारी जीवन की गहन पड़ताल है और मानवीय संवेदनाओं का उत्सव भी। यह संग्रह छत्तीसगढ़ी और हिन्दी कविता को एक नई दिशा देता है। कवि की सबसे बड़ी विशेषता है संवेदना और यथार्थ का संगम। उनकी कविताएं केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि जीवन-संघर्ष की गवाही है।

इस प्रकार फिर बोल उठी केवल कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का घोष-पत्र है जो पाठक को सोचने, प्रश्न करने और परिवर्तन के लिए प्रेरित करता है।


– डुमन लाल ध्रुव
मुजगहन, धमतरी (.छ.ग.) पिन- 493773
मोबाइल – 9424210208

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