
श्रीमति सुधा वर्मा छत्तीसगढ़ की एक सुपरिचित साहित्यकार हैं । आप गद्य व पद्य दोनों विधाओं में हिन्दी एवं छत्तीसगढ़ी दोनों भाषाओं समनान्तर लिख रही हैं । आप छत्तीसगढ़ी साहित्य के ‘मडई’ संपादक है ।
पोला त्यौहार का नाम पोला इस कारण पड़ा कि इसी भाद्र अमावस्या को कृष्ण भगवान ने पोलासुर राक्षस का वध किया था। पोलासुर को मथुरा के राजा कंस कृष्ण भगवान के मामा ने कृष्ण को मारने के लिये भेजा था। इसकी याद में प्रतिकात्मक रुप से शाम को एक पोरा याने मिट्टी के बर्तन को गाँव या शहर के चौरास्ते पर पटका जाता है। इसका कारण है कि पोलासुर को एक मटके में डाल कर उसे पटक कर मारे थे। इस दिन बहुत सी संस्कृति मिल गई है।
धान में फूल आते हैं और उसकी बालियों में दूध भरता है। वह गर्भ धारण करती है। इसकी खुशी हर किसान को होती है। कृषि प्रधान छत्तीसगढ़ में इस खुशी को त्यौहार के रुप में मनाया जाता है। घर में ठेठरी खुरमी बनाते हैं। मीठा चीला बनता है। उसका भोग खेत में जाकर लगाते हैं। सुबह खेत में जाकर धान की पूजा करते हैं। वहाँ पर कम लोग ही जाते हैं। गर्भवती महिलायों के पति नहीं जाते हैं और महिला भी इसकी पूजा नहीं करती हैं। इसे छत्तीसगढ़ में “सधौरी खिलाना” कहते हैं। याने गोद भराई होती है जिसमें तरह तरह के पकवान भोग के माध्यम से खिलाते हैं। घर पर सोंहारी, चौसैला, भजिया, गुरहा चीला, मुरकु बना कर खाते हैं। उसके बाद खेत में कोई नहीं जाता है।
इस दिन खेती का काम पूरा होने के बाद और बारीश के मौसम की बिदाई होने के कारण बैलों को नहला कर तैयार किया जाता है। उस दिन बैलों के शरीर पर रंग बिरंगे ठप्पे लगाते हैं। उसे कौड़ियों की माला जिसे सोहई कहते हैं पहनाते हैं। घंटी घुंघरु पहनाते हैं। पैरो पर भी घुंघरु बांध देते हैं। पीठ पर भी कौड़ियो के कढ़ाईदार कपड़ा डालते हैं। इनकी दौड़ रखी जाती है। गाँव शहर में इनकी रौनक रहती है। अब बैल का आराम का समय होता है। धानकटाई तक वह आयाम करता है।
आज ही के दिन नंदी बैल को सजा कर घर घर दर्शन कराने ले जाते हैं बहुत ही सुंदर कौड़ियों से बने कपड़ों से ढका जाता है। गले में पीतल की घंटी लगी रहती है। उसके साथ ढोल रखते हैं जिससे “बुग बुग” की आवाज निकलती है। हर घर से कुछ न कुछ दिया जाता है। अब यह संस्कृति लुप्त हो गई है।
आज के दिन गोल्लर भी छोड़ा जाता है। किसी बछड़े की पूजा करके उसके डिल्ला पर काठा को उल्टा कर रख के नापते हैं। और सीधे हाथ की जांघ पर त्रिशूल से आंकते है जिससे उसका निशान बना रहे। उसे अब गाँव में या शहर में कहीं भी छोड़ देते है। बाद में यह सांड़ बन जाता है जिसे गोल्लर भी कहते हैं। यह किसी की याद में या नाम से छोड़ते हैं। सुबह हर घर में मिट्टी के खिलौने और दो बैल की पूजा की जाती है। ठेठरी को बैल के ऊपर और सींग में लटकाते हैं। पोरा कढ़ाई में भी रखते है। इसके ऊपर खुरमी भी रखते हैं। यह बेसन की ठेठरी माँ गौरी की प्रतिक है और उसके ऊपर खुरमी रखते हैं यह शिवजी का प्रतिक होता है। यह शिवलिंग बन जाता है। इसे नंदी बैल पर चढ़ाते हैं क्योंकि नंदी उसकी सवारी है। शिवजी अपने वाहन के साथ पूजाघर में विराजते हैं। पूजा के समय रोली चंदन और पीला चावल लगाया जाता है। इसके अलावा हल्दी पानी बैलों पर बर्तन पर छिड़का जाता है। बैल को नहलाकर उसके शरीर की मालिश की जाती है। सावन के महिनें में तरह तरह की बीमारी से जूझते बैलों को अब आराम देते हैं। यह हल्दी किटाणुनाशक होता है। इसे सभी पर छिड़कते है। कहते हैं कि थके बैलों के शरीर का दर्द इससे समाप्त हो जाता है।
पूजा के बाद हर घर में बेटे बैल पर रस्सी बांध कर दौड़ाते हैं। बेटियाँ खिलौने से घर घर खेलती हैं। इसमे बेलन पटा और हाथ से चलाने वाली चक्की होती है। बेटियाँ इसे बहुत शौक से चलाती हैं और भविष्य में हर काम को करने के लिये तैयार होती हैं। यह खिलौने इस कारण बनाये जाते हैं क्योंकि बारीश में घर में बंद बेटियाँ खुली हवा में निकलें और घर गृहस्थी का कुछ काम सीखें। यहाँ बच्चियाँ अपने आप सब कुछ सीख जाती हैं। बेटों में बैल के प्रति सम्मान जागता है और खेती में रूचि पैदा होती है।
आज कुशोत्पाटिनी भी रहता है। इस दिन कुशा के पौधो को उखाड़कर उसे पीतरों को पानी देने के लिये कुशा तैयार करते हैं। पूजा के लिये भी कुशा तैयार करते हैं। कुश का पौधा बारीश के बाद नहीं मिलता है। हलषष्ठी से लेकर पोला तक रहता है, उसमें फूल भी आ जाते हैं। इसे मंत्र पढ़ कर उखाड़ते हैं।
गोंडी में धान के पोठियाना याने गर्भ धारण करने को पोरा कहते हैं। पोर फूटता है तब उसमें दूध भरता है। यही गर्भधारण की प्रक्रिया है इस कारण इस त्यौहार का नाम पोरा पड़ा। पोर फूटना गर्भ धारण करना। पोला राक्षस का वध कृष्ण भगवान इही दिन किये थे इस कारण इसे पोला भी कहते हैं। छत्तीसगढ़ में यह पोरा त्यौहार के नाम से ही जाना जाता है।
सुधा वर्मा,




Leave a Reply