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पुरी यात्रा संस्मरण पुकार भाग-8 -तुलसी देवी तिवारी

पुरी यात्रा संस्मरण पुकार भाग-8 -तुलसी देवी तिवारी

पुरी यात्रा संस्मरण:

पुकार

-तुलसी देवी तिवारी

पुरी यात्रा संस्मरण: पुकार-तुलसी देवी तिवारी
पुरी यात्रा संस्मरण: पुकार-तुलसी देवी तिवारी

गतांक से आगे

पुकार : पुरी यात्रा संस्मरण भाग-7 (पुरी यात्रा संस्मरण)

जब चन्द्रभागा के पास गाड़ी रुकी तो सबसे पहले उतरे, सामने अपने पूरे दम-खम के साथ ठाठे मारता सागर, बार-बार तट से लहरों का संघर्ष करा रहा था। समुद्र के पश्चिम में सूर्य की परछाई पड़ रही थी। जल पर फैली सूर्य रश्मियाँ अद्भुत आभा बिखेर रहीं थीं। असंख्य नर-नारी, बाल-वृद्ध सागर तट पर इधर-उधर घूम रहे थे। बहुत सारे लोग स्नान कर रहे थे। विस्तृत बालुका राशि फैली हुई थी।

‘‘किधर है चन्द्रभागा नदी’’ ? वाजपेयी जी ने पूछा। त्रिपाठी भइया ने दूर तक निगाहें दौड़ाई, नहीं कुछ समझ में नहीं आया।
‘‘ड्राईवर ने दूर अंगुली से संकेत किया – ‘‘वह देखिये, जो घेरे जैसा है न ऽ ऽ वहीं है चन्द्रभागा नदी’’।
‘‘वहाँ कुछ नहीं है, कहाँ जायेंगे थकने’’। देवकी दीदी बोली, पिछली बार वे लोग देख गये थे।
‘‘नहीं; देख लेते हैं’’। वाजपेयी जी दूध के जले मट्ठा भी फूँककर पी रहे थे।
‘‘हम दोनों अपने साथियों को छोड़कर तेज कदमों से उस ओर चले जिधर ड्राईवर ने संकेत किया था।

रेत में चप्पल धंस रही थी, ज्यादा तेज चला नहीं जा रहा था। लगभग एक किलो मीटर के बाद हम लोग वहाँ पहुँचे जहाँ, चारों ओर से घिरा नीर आपुरित सुन्दर सरोवर है। हम उस दृश्य को देखने आये थे, जिसमें चन्द्रभागा नदी सागर से मिलती है। एक युवक छोटी सी जाँघिया पहने घाट पर स्नान कर रहा था, उसने पूरे बदन में साबुन लगा रखा था।

‘‘ऐ भइया – थोड़ा ऊपर आना’’ ! वाजपेयी जी ने उसे ऊपर आने का संकेत किया।
वह संकोच में पड़ा हुआ था, फिर उसने आँखों से साबुन धोया और उसी प्रकार सीढ़ियों से थोड़ा ऊपर आ गया। अब भी उसकी हमसे पर्याप्त दूरी थी।

‘‘ये चन्द्रभागा नदी किधर है’’ मैंने पूछा।
‘‘यही है, यहीं तक नदी आती है। फिर खत्म हो जाती है, अन्दर-अन्दर मिलती है समुद्र से। वह पुनः नहाने चला गया।
पीछे-पीछे पंडित जी चिल्ला रहे थे जब मैं तेजी से इधर आ रही थी।

‘‘अरे कहाँ जा रही हो ?चलो वापस’’! मैंने उत्सुकतावश तब उनकी पुकार की उपेक्षा की थी। अब डाँट खाने का डर सताने लगा था।
हम लोग इस बार सड़क पर आ गये। ड्राइवर चाहता तो गाड़ी से हमें यहाँ तक ला सकता था किन्तु उसने आलस्य कर दिया।
गाड़ी के पास सभी साथी हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे।

‘‘कैसे भागी, कुछ सुनाई नहीं देता क्या ?’’ पंडित जी ने आड़े हाथों लिया। मैं चुप रह गई।

हमारी ट्रेन सात बजे पुरी से बिलासपुर के लिए थी, इस बीच भोजन इत्यादि की भी चिन्ता थी। ढलती शाम देखकर हम लोग पुरी की ओर लोट पड़े। समुद्र तटीय मार्ग से पुरी की दूरी मात्र 30 कि.मी. है फिर भी समय तो लगना ही था।

जब हम लोग पुरी स्टेशन पहुँचे तो छः बज चुके थे, स्टेशन पर सामान्य भीड-भाड़ थी। हमने खुले स्थान पर अपना सामान रखा, हवा तो बहुत अच्छी आ रही थी परन्तु भूमि दिन भर की तपी हुई थी, हमने चादर बिछा ली थी, फिर भी गरम लग रहा था। पंडित जी और वाजपेयी जी एक-एक चादर बिछाकर शेड वाली जगह पर लेट गये। त्रिपाठी जी, भोजन के लिए पूछने आये। हम सभी ने मनाकर दिया, दोपहर के प्रकरण से हमारा मन बेहद कच्चा हो गया था। वे माने नहीं एक शाकाहारी होटल देखकर कुछ रोटियाँ ले आये। एक-एक दो-दो खाकर सबने जल पीया। पता चला कि गाड़ी तीन घंटे लेट है, जो बढ़ते बढ़ते चार घंटा हो गया था। हमने अपना सामान उठाकर छायादार स्थान पर रखा। चादर बिछा कर आराम की मनःस्थिति में आ गये। जब हम बाहर बैठे थे उसी समय एक विक्षिप्त युवक हमारे पास आया। उसके बाल बिखरे हुए थे, वस्त्र फटे-पुराने और एकदम गंदे थे, उसने रंग बिरंगे ढेरो चिथड़े अपनी कमर में खोंस रखे थे। पूरे ललाट पर सिन्दूर लगा रखा था। वह संकेत से हमसे कुछ माँग रहा था। हमने इस प्रकार के ठगों के बारे में सुन रखा था, अतः उसे कुछ देने में आनाकानी कर रहे थे। अधिक जिद्द करने पर मैंने उसे पांच रूपये का एक सिक्का दे दिया। उसने सिक्का क्रोध सहित मुझे वापस कर दिया। मुझे बहुत बुरा लगा।
‘‘तो क्या तुम्हें सौ रूपये दे दूँ’’ मैंने अपमान का घूंट पीते हुए धीरे से कहा। वह हमारे आस-पास मंडराता रहा।

‘‘इससे सावधान रहना, पंडित जी ने संकेत से मुझे सतर्क किया।

उसी समय एक मोटी तगड़ी गाय न जाने कहाँ से आ गई। हम उससे दूर हटाने लगे। वह आगे आया, गाय को प्रणाम किया और अपने झोले से निकाल-निकालकर अनेक चीजें खिलाने लगा, सेव, संतरा, समोसा, आलू, टमाटर, खाते-खाते गाय ने गोबर पेशाब कर दिया। जो बहकर हमारे सामान की तरफ आया। अब उसे न जाने क्या सूझा, अपनी पूरी झोली गाय के सामने उलट दी, नहीं नहीं मैं दो तीन किलो चावल एक किलो दाल होगी। गाय की पीठ पर हाथ फेर-फेर कर उसे खिला रहा था। उसकी भाषा हमारी समझ में नहीं आ रही थी। उसकी आँखों में हमारे लिए तिरस्कार झलक रहा था। कुछ लोगों ने शोर मचाया था, जिसके कारण रेलवे पुलिस के लोग आकर उसे बाहर ले गये थे, साथ ही गाय को भी स्टेशन से बाहर निकाल दिया था। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था, उसका व्यवहार, फिर सोचा, पागल होगा या फिर परम सयाना। मैंने देखा सब अपने अपने में खोये हैं तो वेदान्त से कहा – बेटा, इधर पुस्तक की दुकान नहीं है क्या ? आसपास थोड़ा देखोगे क्या ? मेरे मन में पुस्तकें कम खरीद पाने की कसक हो रही थी। मेरी यात्रा का उद्देश्य जगन्नाथ प्रभु के दर्शन के साथ-साथ देश के इस पूर्वी क्षेत्र की व्यापक जानकारी हासिल करना भी था, जो पुस्तकों के बिना प्रमाणिक नहीं हो पा रही थी।
‘‘अच्छा दादी मैं देखकर आता हूँ’’ ? वह चला गया। थोड़ी देर में हाँफता हुआ आया।
‘‘दादी यहाँ पास में ही दुकान है, आओ चलें’’।
मैंने सभी साथियों को चोर नजरों से देखा और दबे पांव पुस्तक दुकान की ओर बढ़ गई। यह उड़िसा सरकार के पर्यटन विभाग की दुकान थी। हिन्दी, अंग्रेजी, उड़िया, बांग्ला आदि भाषाओं में पुस्तकें थीं। मैंने बलराम मिश्र की पुरी एवं कोणार्क मंदिर संबंधी पुस्तकें क्रय कीं और धीरे धीरे वापस आ रही थी कि, पंडित जी की नजर मुझ पर पड़ी।

‘‘कहाँ घूम रही हो ? सामान ले जायेगा कोई उठाकर’’ वे तेज आवाज में बोले। मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम। मैंने उन्हें पुस्तकें दिखाने की जुर्रत नहीं की। चुपचाप सामान के पास आकर देवकी दीदी के पैर की तरफ ढलंग गई।
’’’’
अब देखे हुए स्थानों से भावसाम्य का अवकाश मिला था मुझे। 12 वीं सदी के अंतिम और तेरहवीं शताब्दी के प्रारंभ में राजा नरसिंह देव के राज्य का बारह वर्ष का राजस्व 12 सौ कारीगरों की 12 वर्षों की मेहनत से बना कोणार्क मंदिर मुझे दिव्य अनुभूति से भर रहा था। मिथुन मूर्तियों की स्मृति से अजीब सा अनुभव हो रहा था। जिसमें और चाहे जो भी हो किसी प्रकार के वासनात्मक विचार का अभाव था। मैंने कला की दृष्टि से उन्हें देखा था। संभवतः मनुष्य जीवन में जो चार पुरूषार्थ हैं जिन्हें प्राप्त करना मानव जीवन का लक्ष्य होता है। (अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष) उन्हीं के संबंध में दिशा निर्देश हो।

अर्थ अथवा चल, अचल, सम्पत्ति – गृह, पशु वाहन रत्न आदि यह जीवन की पहली आवश्यकता है।
धर्म – सकाम अथवा निस्काम भाव से यज्ञ, तप, तीर्थ, लोकोपचार, पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय दायित्वों का निर्वहन धर्म है।
काम है सम्पूर्ण सांसारिक सुखों का भोग, यह शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध,? मान, बड़ाई और आराम है। इसमें स्पर्श सुख में ही स्त्री पुरूष संबंधों से प्राप्त होने वाला सुख आता है। बाकी सात भी बड़े आकर्षक हैं, भोगों की अधिकता, अर्थ, धर्म और मोक्ष तीनों पुरूषार्थों का नाश कर देतीं हैं। शायद इसी विचार से शास्त्रों में लिखा गया है कि काम को ईश्वरार्पण कर देना चाहिए, अर्थात् धर्मपूर्वक प्रजा की वृद्धि के साथ अन्य लोगों के सुख का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए। तभी व्यक्ति मोक्ष का अधिकारी बन सकता है। संभवतः इसी भावना से देश के अधिकांश मंदिरों में मिथुन मूर्तियाँ उकेरी गईं हैं।

पुरी यात्रा संस्मरण पुकार
पुरी यात्रा संस्मरण पुकार

अन्य भावों की भी मूर्तियाँ हैं। बाहरी दीवारों पर ही इन्हें बनया गया है, गर्भगृह में देव विग्रह ही हैं, अर्थात् काम का संतुलित भोग कर मानव ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। हो सकता है जनता को, शरीर विज्ञान, शारीरिक क्रिया कलापों एवं प्रजा सृष्टि की प्रक्रिया की शिक्षा देने के लिए इनका निर्माण किया गया हो। आजकल जो छोटी उम्र में लड़के बलात्कारी बन रहे हैं, संभवतः इसके परिणामों का बोध होने पर वे ऐसा दुःसाहस न करते। छोटी बड़ी लड़कियाँ जो बलात्कारियों के बहकावे में आ जाती हैं, शरीर विज्ञान से परिचित होतीं तो शायद स्वयं को बचा पातीं, समय पर सतर्क हो जातीं, संचार माध्यमों, टी.वी. इन्टरनेट के द्वारा अधकचरा ज्ञान मिल रहा है जो उनके मन में जिज्ञासाओं के तूफान खड़ा कर देता है, ऊपर से नशेबाजी की सुविधा, कानून का लचीलापन, संस्कृति का संक्रमण काल इन अवांछित घटनाओं के जन्मदाता हैं या फिर इनके निर्माण में वाम मार्गी प्रभाव कह ले (इसमें, काम को ईश्वर से जोड़ने का माध्यम बनाने की साधना प्रधान है) या वज्राघात से मंदिर की सुरक्षा का टोटका। मंदिर निर्माताओं ने अपने विचारों से संबंधित कोई अभिलेख भी तो नहीं छोड़ा। समुद्र से आने वाली शीतल पवन ने मेरे सारे श्रम का परिहार किया। यात्रा पूरी तरह सफल हुई, मुझे हल्की सी झपकी आ गई। मैंने सपना देखा – मैं राजा नर सिंह देव के साथ कारीगरों के कार्य का निरीक्षण कर रही हूँ। अनेक प्रस्तर खंड सजीव प्रतिमाओं का रूप लेते जा रहे हैं ठक्…ठक्….की ध्वनि हो रही है फिर लगा मैं जगन्नाथ स्वामी की रथ यात्रा में शामिल हूँ, अपार जन समूह गायन वादन, वैभव का प्रदर्शन, मैं एक छोटी बच्ची हूँ। मैला सा फ्राक पहने, प्रसाद माँग-मांग कर खा रही हूँ।
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(1) संदर्भ – मंदिरों में प्राप्त शिलालेख
(2) बलराम प्रसाद मिश्र की पुस्तकें।
(3) धार्मिक ग्रन्थ – इतिहास पुराण, महाभारत
(4) स्वतः दर्शन, अन्वेषण, साक्षात्कार ,प्रश्नोत्तर।

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