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पुस्‍तक समीक्षा : कविताई कैसे करूॅं

पुस्‍तक समीक्षा : कविताई कैसे करूॅं

कविताई कैसे करूॅं- कन्‍हैया साहू ‘अमित’

पुस्‍तक समीक्षा : कविताई कैसे करूॅं

-रमेशकुमार सिंह चौहान

पुस्‍तक समीक्षा : कविताई कैसे करूॅं
पुस्‍तक समीक्षा : कविताई कैसे करूॅं
कृति का नामःकविताई कैसे करूँ
कृतिकार –कन्हैया साहू ‘अमित’
कृति का प्रकाशकBRivers
कृति स्वामित्वकृतिकार
प्रकाशन वर्ष2020
सामान्य मूल्यरू. 200.00
विधापद्य
शिल्पछंदात्मक
भाषाहिन्दी
पुस्तक की उपलब्धताकृतिस्वामी के पास
समीक्षकरमेशकुमार सिंह चैहान, नवागढ़
पुस्‍तक समीक्षा : कविताई कैसे करूॅं
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कविताई कैसे करूॅं के रचनाकार-

‘छंद के छ’ के साधक श्री कन्हैया साहू ‘अमित’ साहित्य लेखन के प्रति समर्पित है। जहां अधिकांश ‘छंद के छ’ के साधकों ने अपनी पहली कृति छत्तीसगढ़ी में प्रकाशित कराये हैं वहीं कन्हैया साहूजी की पहली कृति हिन्दी भाषा में है । ‘कविताई कैसे करूँ’ अमित भाई की पहली प्रकाशित कृति है किन्तु इस कृति को पढ़ने के बाद कहीं से यह नहीं लगता कि यह उनकी पहली कृति है । शब्द सौष्‍ठव, भावाभिव्यक्ति और सृजनात्मक शिल्प सभी यही पुष्ठ कर रहें हैं कि रचनाकार एक अनुभवी एवं सुलझा हुआ मननशील है ।

कविताई कैसे करूॅं -एक परिचय-

कविताई कैसे करूँ’, एक छंदमय काव्य संग्रह है । इसमें 29 प्रकार के मात्रिक छंद एवं मुख्य रूप से दो प्रकार के वार्णिक छंद घनाक्षरी और सवैया में रचनायें प्रस्तुत की गई है ।घनाक्षरी और सवैय के प्रकार को सम्मिलित किये जाने पर 14 प्रकार के वार्णिक छंद सम्मिलित है। कुल मिलाकर 43 प्रकार के छंदों पर रचना प्रस्तुत है । 149 पृश्ठीय इस काव्य संग्रह में 106 मणका पिरोये गये हैं । विषय वस्तु की दृष्टिकोण से इसमें जीवन के लगभग सभी क्षेत्रों को स्पर्श करने का प्रयास है ।

वीणावदनी की वंदना से प्रारंभ होकर गुरू, माता-पिता को नमन करते हुये ‘रिश्तों में मनुहार’ में रिश्तों के उलझनों को सुलझाने का प्रयास है । ऋतु वर्णन की अनेक छटायें इस काव्य गगन पर दृष्टव्य हैं । इनकी लेखना पर्यावरणीय हरितमा से आच्छादित भी है। ईश्वर पर आस्था की अभिव्यक्ति भी यथा स्थान पल्लवित है तो राष्ट्रवंदना में भी सिर झुके हुये हैं । रक्तदान, मतदान का आव्हान है तो हिन्दी भाषा की उत्थान की लालसा भी कुल मिलाकर कथ्य की विवधता से यह काव्य पुष्पवाटिका अनेक भावों की पुष्पों से आच्छादित रंग-बिरंगी है।

कविताई कैसे करूॅं-छंद संग्रह-

छंद संग्रह को सबसेे पहले छंद की कसौटी में कसा जाता है फिर कथ्य-कथन पर अपना ध्यान आदि को । ‘कविताई कैसे करूँ’ में प्रचलित छंद दोहा और चैपाई के अतिरिक्त सोरठा, रोला, उल्लाला, कुण्डलियाँ, छप्पय, सरसी, सार लावणी, कुकुभ, ताटंक, विष्णुपद, अमृतध्वनि, जयकारी, आल्हा, शक्ति, शोभन, शंकर, बरवै, त्रिभंगी, रूपमाला, गीतिका, हरिगीतिका, छन्नपकैया, सिंधु, कज्जल, कामरूप, व भुजंगप्रयात जैसे मात्रिक छंद पर रचना किये गये हैं, वहीं मनहरण घनाक्षरी, जलहरण घनाक्षरी, विजया घनाक्षरी, रूप घनाक्षरी, सूर घनाक्षरी, डमरू घनाक्षरी, अरविन्द सवैया, मत्तगयंद सवैया, अरसात सवैया, दुर्मिल सवैया, वागीश्वरी सवैया, मुक्ताहारा सवैया, मंदारमाला सवैया, एवं मदिरा सवैया जैसे वार्णिक छन्दों की नदी में अपनी लेखनी को स्नान कराया है ।

मात्रिक छंदों में केवल मात्राओं की गणना ही मुख्य नहीं होता अपितु इन मात्राओं का सही संयोजन भी आवश्यक होता है, जिसे कल संयोजन कहते हैं । इसी कल संयोजन को रचनाकार अपनी प्रत्येक रचनाओं के शीर्षक के साथ अंकित किया है । इससे नवरचनाकार इसे सूत्र के रूप लेकर छंद रचना का अभ्यास कर सके । उदाहरण के रूप में प्रथम कविता वीणावादिनी की वंदना ही दृश्टव्य है-

वीणवादिनी की वंदना (चैपाई 4444-4444=16×4) 

 वंदन शुभदा सादर शरद ।
 वर्ण वाक्य की आप विशारद ।।
 वरदात्री हे जग कल्याणी ।
 वेणु मधुर हो मेरी वाणी ।।

इस चैपाई में चैपाई के प्रत्येक चरण में 16 मात्राओं में कल संयोजन का भलीभांति निर्वाह किया गया है । इसी प्रकार सभी छंदों में छंद बंधन का निर्वाह सहजता एवं सटीकता से किया गया है । जहाँ आज कल बंधन मुक्त यहाँ तक तुक रहित कविताओं का चलन अपने चरम पर है ऐसे समय में छंद के बंधन को स्वीकार करके अपनी भावों को उस शब्द सीमा में संप्रेषित करना कोई सहज कार्य नहीं है किन्तु इस काव्य संग्रह में रचनाकार बड़ी ही सहजता के साथ अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन किया है ।

‘कविताई कैसे करूँ’ की भाषाषैली-

‘कविताई कैसे करूँ’ की भाषाषैली पर ध्यान केन्द्रित करने पर शब्दों के प्रयोग में विविधता दिखाई देता है कहीं-कहीं पर तत्सम-तत्भव शब्दों की क्लिष्टा है तो कहीं-कहीं पर देशज शब्दों की सहजता । तत्सम-तत्भव शब्दों में तिरोहित एक रचना दृष्टव्य है-

वराही विधि गति-मति वाचक ।
 वरदायक त्रिभुवन संचालक ।।
 विधिरानी वर ज्ञान विधाता ।
 विपदा हर सरस्वती माता ।।
 वागपेत की सुर संरचना ।
 वसुदा वसो सदा ही रसना ।।

 इसी प्रकारः

 मेघ पवन सह वाचते, सावन का संदेश ।
 प्रथम प्रकृति हर्शित हुई, पोशित पन परिवेश ।।
 पावस पानी पावनी, प्रणयी धरती गोद ।
 हरियाली की ओढ़नी, वसंधरा मन मोद ।।

सहजता के सहज रंगों से भिंगी कुछ रचनाये इस प्रकार हैं-

चलों चले हम स्कूल, आज अब से सरकारी ।
 अपने घर के पास, करें शाला से यारी ।।
 दौड़ भाग क्यों दूर, पसीना व्यर्थ बहाना ।
 सबके रहो समीप, वहीं पर नाम लिखाना ।।

 छन्नपकैया छन्न पकैया, फैला कूड़ा करकट ।
 गंध फैलती अंदर बाहर, बनता भारी संकट ।।
 छन्न पकैया छन्न पकैया, बीच राह में कचड़ा ।
 नक सिकोड़ें सब हैं चलते, समझे इसको पचड़ा ।।

काव्य संग्रह के संपूर्ण अवलोकन से साहित्यिक भाषा का दिग्दर्शन होता है । इनकी भाषाषैली से काव्य रसिक निश्चित ही आह्लादित ही होगें ।

कविताई कैसे करूँ : काव्य का कलात्मक पक्ष-

काव्य का कलात्मक पक्ष उसके अलंकरण और रसास्वादन की अनुभूति से होता है । काव्य अलंकरण कभी-कभी स्वभाविक उभर आता है तो कभी-कभी रचनाकार सश्रम अपने काव्य को अलंकृत करता है । इस कृति में रचनाकार की श्रमस्वेद की बूँदें अलंकार बन कर प्रवाहित हो रहीं हैं । अनुप्रास अलंकार के अनुप्रास से काव्य संग्रह अनुप्रासित है-

वर्ण वाक्य वाणी सहित, भरिये मन उजियार ।
 वंदन वीणावादिनी, विनती वारंबार ।।
 
सुबह स्वेद से सामना, दोपहरी लू साथ ।
 साँझ सुहानी अब कहाँ, लवण लसीला माथ ।।

 पग-पग में प्रमुदित अमित, पीताम्बरी सुहास ।
 पीतवर्ण प्रिय पाहुना, प्रियतम प्रेम प्रभास ।।
 
उमस उष्णता बिदा हुई अब, मौसम बड़ मनभावन ।
 उमड़ घुमडकर आओ बरसो, स्वागत है अब सावन ।।
 
धरती धनिता धर्मिता, धीरज धायस धाम ।
 धारण करती धाय सा, वसुंधरा है नाम ।।

 धीरज धानी धरती, परहित पसरती,
 जनहित ही करती, प्रथम प्रणाम धरा ।
 
मंद-मंद मकरंद मालती, मनहर मनभर मदमाती ।
 अति वासित वासंती वैभव, नवल रूप  यह दिखलाती ।।                                                                   
 
मेघ मल्हार मनोहर मोहित, राग सभी अब सुंदर गाये ।
 नीर भरे नभ में मन भावन, बादल सादर लोग बुलाये ।।

‘कविताई कैसे करूँ’ के गगन मण्डल में अनुप्रास मेघों के बीच, बीच-बीच में रूपक, लोकोक्ति, पुनरूक्ति और मानकीकरण अलंकार तडित़ और गर्जना की भाँति प्रकट होते हैं –

रूपक अलंकार-
 माटी का पुतला मनुज, काया हवा गुबार ।
 साँसे पानी बुलबुला, फिर भी दंभ हजार ।।
 
लोकोक्ति अलंकार-
 जनसेवा बस नाम की, दो कैेड़ी के काम की ।
 बहुत दबाते माह हैं, रामराज के काल हैं ।

 पुनरूक्ति अलंकार-
 कृष्ण कन्हैया खेलते, कालिंदी के पार ।
 खेल-खेल में आप ही, करते असुर सुधार ।।

 कृष्ण कन्हैया राधिक, गोप गोपिका संग ।
 श्यामल-श्यामल अंग में, चढ़ा प्रीत का रंग ।।

 जन-जन क्षण-क्षण तुम्हें पुकारे, बरसो जल्द जलेश ।
 जीव जगत जलपथ जलमय हो कोई रहे न शेष ।।

 निखरा-निखरा रूप धरा का, दमा है घर आँगन ।
 है नभ जलधर जल भर-भर दे, हाथ जोड़ हम माँगन ।।

 मानकीकरणः
 रिमझिम बारिश जब विदा, संग शरद तब ठंड ।
 चढ़ी जवानी शीत को, फिर तो सर्द प्रचंड ।।

 सर्दी सूरज को लगी, खोजे सुनहर धूप ।
 बादल ओढ़े कोहरा, मौसम हुआ अनूप ।।

 दिनकर प्रीतम हो चला, बढ़ी धूप से प्रीत ।
 प्रीत लुटाती यामिनी, रंग गुलाबी पीत ।।

कविताई कैसे करूँ काव्य पठन से रसानुभूति-

काव्य पठन से रसानुभूति स्वभाविक है । भावसंप्रेषण की कसौटी ही रसानुभूति है । ‘कविताई कैसे करूँ’ में जो उद्यम अलंकारों के प्रति दिखता है वही उद्यम रसो के प्रति उपेक्षित रह गया । लेकिन स्वभाविक रस निष्पत्ति प्रवाहमान है । शांत रस के आच्छादन में कहीं-कहीं श्रृंगार, वात्सल्य आदि का दर्शन हो ही जाता है-

शांत रस
 धारण उर में धीर, व्याकुलता को छोड़िए ।
 व्यर्थ न हों गंभीर, सहज सरस जीवन चले ।।

 मिटता जीवन है सभी, जन्म लिया इह लोक ।
 बारी सबकी है लगी, फिर क्यो इतना शोक ।

 कहे अमित मतिमंद, यही जीवन जंजीरा ।
 मृगतृष्णा मन मोह, कह गये संत कबीरा ।।

 सदा सँवारो काज, जगत यह बहुत झमेला ।
 रखो पकड के हाथ, खो न मैं जाऊँ अकेला ।।

 रास रंग को त्याग कर, मूल कर्म पहचान ले ।
 मानुष तन पाया यहाँ, मृत्यु पूर्व संज्ञान ले ।।
 
श्रृंगार
 गोरी की पायल बजे, ज्यों घुँघरू के बोल ।
 मनमोहक मन मोह ले, ताल यही बिन ढोल ।।
 
वात्सल्य रस
 पिता पूज्य परिभावना, परिरक्षित परिवार ।
 पालक पोषक पावना, प्रेरक प्राणाधार। 
 सपने अपनों के लिए,जीता वे मन मार ।
 रातें कटती सोंच में  दिन को का हजार ।।

‘कविताई कैसे करूँ’ में विषय की विविधता –

‘कविताई कैसे करूँ’ में विषय की विविधता है । जहाँ पारम्परिक ईश वंदना, ऋतु वर्णन, मातृभूमि गान आदि के विषयों पर कवितायें है तो वहीं नई परिवेश की कविता फैशन, मोबाइल, पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, रक्तदान, मतदान आदि भी सम्मिलित है ।

कतिवताई कैसे करूँ : पाठकों के अनुकूल-

छंद अलंकारों की गहनता एवं रसों की स्वभाविक निष्पत्ति में कथ्य-कथन, भावाभिव्यक्ति कहीं-कहीं को छोड़कर आम पाठकों के अनुकूल है । साहित्यिक काव्य प्रेमियों के लिये यह कृति एक उपहार है । कन्हैया साहू ‘अमित’ की पहली कृति पर कोटिश बधाई एवं शुभकामना ।

-रमेश चौहान

पुस्‍तक समीक्षा- किस नगर तक आ गये हम

4 responses to “पुस्‍तक समीक्षा : कविताई कैसे करूॅं”

  1. KANHAIYA SAHU 'AMIT' Avatar
    KANHAIYA SAHU ‘AMIT’
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  2. Suresh Paigwar Avatar
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