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रोक दो रक्त ताण्डव भाग-5

चम्‍पू काव्‍य:रोक दो रक्त ताण्डव

-डॉ. अशोक आकाश

रोक दो रक्‍त ताण्‍डव’ डॉ. अशोक आकाश की एक चम्‍पू काव्‍य है ।चम्‍पू काव्‍य एक प्राचिन साहित्यिक विधा है इस विधा में मैथलीशरण गुप्‍त ने यशोधरा लिखी है । डॉ; आकाश के इस कृति में प्रदेश, देश और विश्‍व में बढ़ रहे आतंकवादी, हिंसा के घटनाओं के विरुद्ध आवाज बुलंद किया गया है । इस कृति को कडि़यों के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है । प्रस्‍तुत है आज इसकी पांचवी कड़ी आशा ही नहीं विश्‍वास हैै सुरता के पाठकों को यह निश्चित ही पसंद आयेगा ।

गतांक से आगे

( 5)

मैं सफ़र में हूँ, 

किसी भी तरह 

निकालना चाहता हूंँ, 

इस जानलेवा 

मकड़जाल से। 

लेकिन

किसी 

मदमस्त नशेड़ी की तरह, 

चाह कर भी 

नहीं निकल पाता

और 

इस विवशता से 

उठी खीझ

किसी निर्दोष पर 

गिर जाती। 

तब फिर से 

ढह जाती, 

तड़कती बिजली की तरह 

एक और 

उठती हुई इमारत। 

बिखर-उजड़ जाता 

निर्दोष परिवार, 

अस्तित्व को 

तरस जाती 

सँवरती मंजिल, 

आतंकी हरकत से 

लोगों में फैल जाती 

दहशत, 

डर, 

खौफ, 

देखते ही मच जाती 

हलचल ! 

पहचानते ही, 

चीख पड़ते लोग, 

बचाव के लिए 

मच जाती चीत्कार, 

पुकारते उठ जाते 

दोनों हाथ, 

दूर क्षितिज तक । 

दौड़ जाती 

एक बारगी नजर 

मदद की चाह में ! 

कोई नहीं जानता, 

कभी 

हमदर्द बनकर आया 

यह अजनबी, 

हो जाएगा जानलेवा, 

निर्मम, बेरहम। 

मासूम चेहरे के अंदर 

छिपे 

हिंसक जानवर के 

पहचान की क्षमता 

नहीं होती 

हर किसी में । 

    

मैं सफर हूँ, 

मुझे 

भोला-भाला 

सीधा-साधा 

मत समझो। 

मैं 

हिंसक भी हूँ,

तो मुझे 

नानक, 

कबीर ,

महावीर ,

बुद्ध के 

आदर्श पथ

याद है, 

लेकिन 

मेरे उसूल 

अलग 

सर्वथा भिन्न । 

मैं 

किसी अहिंसा के 

पुजारी की

 हत्या क्यों करूँ ?

किसी अंधे की 

लाठी क्यों छीनू ?

लेकिन 

बर्दाश्त नहीं होता, 

जब

कोई मुझ पर 

ऊँगली उठाये, 

कोई मेरे 

चिथड़े बदन से 

पर्दा खींच कर 

दुनिया को दिखा दे, 

या 

कोई 

मेरे एक गाल पर मारे, 

तब 

चुप नहीं बैठ सकता, 

कतई नहीं, 

फिर मैं भूल जाता हूँ, 

महापुरुषों के 

आदर्श पथ, 

फिर तो 

सिर्फ 

एक ही रास्ता 

याद रह जाता है, 

चाहे 

मेरा खून बहे 

या 

बहाना पड़े…!

उबलता रक्त 

नसों में 

फट पड़ने 

बेताब हो जाता। 

मन में चढ़ी 

आदर्श की परत 

उतरती जाती 

प्याज के 

छिलकों की तरह । 

फिर 

मैं, 

मैं नहीं रह जाता,

पूरी तरह

मन की 

भड़ास निकाल, 

शून्यता से संतप्त, 

अस्तित्व हीन 

हो जाता हूँ, 

और 

खो जाता हूंँ

पूरी तरह 

किसी राहों पर नहीं ! 

विचारों, 

सिद्धांतों पर नहीं, 

हीनताबोध की 

गहरी खाई में, 

जहाँ से 

निकल भी आऊँ 

तो टाल नहीं सकता, 

अपने जीवन की सच्चाई 

हादसों का सफर कहकर । 

कोई माफ नहीं कर सकता, 

हजारों जिंदगी

जला देने वाले लोगों को । 

अफवाहों को 

हवा देने वाले, 

हल्की हवा के 

झोंकों से 

इठलाने वाले, 

इधर से उधर 

उड़ जाने वाले, 

विचारहीन 

अस्तित्वहीन 

अपनी क्षमता

गुण से अनजान। 

बेशकीमती राजकीय सम्पतियों पर

घास फूस कचरों की तरह

आग लगा देने वाले, 

सहज सरल 

सौम्य दिखने वाले 

किंतु कुटिल 

चालक 

धूर्त लोगों से 

सतर्क रहने की 

जरूरत है । 

मैं तो 

तथाकथित सत्यवादी, 

ढोल बजाकर 

प्रचार करने वाले, 

बनावटी अहिंसावादी 

से ही 

सतर्क रहता हूँ, 

मुझे 

अफवाहों को हवा देने वाले, 

किसी की जिंदगी 

दहका देने वाले, 

बुझते लावों पर 

घी डालने वाले, 

नासूर जख्मों पर 

नमक रगड़ने वालों से 

सख्त नफरत है । 

जो ठहरा देते हैं, 

बेकसूर लोगों को 

कसूरवार, 

शक जागृत कर 

उसे 

सत्य 

साबित कर देने की 

हद तक 

प्रचारित कर 

मजा लेते रहते हैं । 

ऐसी आग में जलेे 

गुमराह नौजवानों के प्रति 

मुझे सहानुभूति होती है, 

ना जाने क्यों ? 

जब से 

इस राह पर आया हूंँ, 

ऐसे लोगों से 

मेरा रिश्ता हो गया है, 

वास्ता हो गया है। 

आखिर हमराह जो हैं, 

और फिर 

मिलकर लड़ने में 

हर्ज ही क्या है ? 

सुशासन के लिए, 

कुशासन के खिलाफ ! 

व्यवस्था की नाक पर, 

अव्यवस्थित जिंदगी, 

करे भी तो क्या ? 

खाली पीली बैठे रहने से 

बेहतर

सोचते हैं, 

कुछ तो कर रहे हैं….। 

( 6 )

मैं सफर में हूंँ,

मुझे रोको मत! 

जबरदस्ती 

मेरी अंधी गलियों में,

काले कुत्तों की तरह 

बेवजह भौंको मत । 

मैं जानता हूँ,

मेरे पाँव 

जिस रास्ते पर है, 

वह 

किसी सुनहरी मंजिल नहीं, 

किसी गहरी खाई तक

जाकर 

समाप्त हो जाएगी…

लेकिन सोचो,

जो भरते हैं,

छोटे बच्चों के बस्तों पर,

मजहबी बारूदों को । 

वह कैसा समाज बना रहे हैं

और 

उसपर 

इतने बड़े समाज की 

नजर क्यों नहीं है ?

क्यों कर रहे हैं अनदेखी ?

आने वाली पीढ़ी की । 

कैसे होंगे 

वे बारूदी बच्चे ?

और 

कैसा होगा 

हमारा वह बारुदी समाज? 

जरा सोंचो, 

जो 

टकराव से 

उन्माद तक पहुंचकर, 

समाज की 

तबाही का कारण बनेगा…। 

कभी सोचा है 

इस सवाल पर 

क्या बनेगा वह बच्चा ?

जो बचपन से 

अपने धर्म के नाम पर, 

कुछ भी कर गुजरने की 

रोज शपथ उठता है ।

क्यों 

वह मजहबी स्कूल

जो ऐसी शिक्षा 

नवजात बच्चों को 

दे रहा है !

और संरक्षण किसका है 

ऐसे स्कूलों को? 

जो 

संविधान की नीति के खिलाफ, 

शासन की 

नाक के नीचे, 

बंदूक टिकाये हुए हैं । 

मेरे इन सवालों का 

जवाब देने की 

है किसी में हिम्मत!

ऐसे धर्मोन्मादी 

व्यवस्था 

एवं 

विचार सुधार 

की दिशा में, 

कुछ कर गुजरने का 

है किसी में दम? 

ऐसी 

कट्टरपंथी विचारधारा रोकने 

की किसी ने कोशिश?

अगर हां 

तो पकड़ लो मेरी गर्दन 

और 

मरोड़ दो, 

मैं उफ तक नहीं कहूंगा!

अगर नहीं!

तो उखाड़ फेंकूंगा 

मेरी राह में आने वाले 

हर उस शख्स को । 

जिसने 

मेरी काबिलियत को रौंदा है, जातिगत आरक्षण के नाम पर! 

इतने सालों में 

किसे मिला उच्च मुकाम ? 

कितने आदिवासियों को 

मिली उच्च शिक्षा ? 

ऊँची नौकरी ? 

किसकी चमकी 

किस्मत की लकीरें ? 

आखिर किसकी उपज है, 

यह जातिगत असमानता ? 

जिसने चौड़ी कर दी 

आर्थिक विषमता की 

गहरी खाई ! 

जहां 

आगे बढ़ 

छीन लेता है, 

सबल व्यक्ति 

किसी दुर्बल व्यक्ति के 

मुंह का निवाला ! 

बनते रहे 

कुछ ही परिवार के लोग 

बड़े अधिकारी, 

अफसर,विधायक, सांसद, मंत्री। मालामाल होता रहा, 

कुछ ही चिन्हांकित परिवार। करते रहे शोषण, 

अपनी ही जाति के 

अशक्त लोगों का । 

अब बंद हो 

यह जातिगत आरक्षण व्यवस्था, 

अक्षम दीन-हीन गरीब 

सत्यनिष्ठ 

दुर्बल परिवार को ही मिले 

इसका लाभ । 

मंत्री 

विधायक 

अफसर के परिवार हों वंचित, आरक्षण के लाभ से । 

टूट जाए 

असमानता की दीवार, 

पट जाए गहरी खाई

आर्थिक विषमता की । 

जहां 

अपने ही कर रहे हों, 

अपनों का खूनी शोषण।

ऐसे 

धृतराष्टी व्यवस्था से 

और कैसे 

की जा सकती है उम्मीद..! 

—-*—-

डॉ.अशोक आकाश

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