
डाॅ विनोद कुमार वर्मा एक व्याकरणविद्,कहानीकार, समीक्षक हैं । आपको छत्तीसगढ़ शासन ने लाला जगदलपुरी साहित्य पुरस्कार 2025- राज्य अलंकरण से विभूषित किया है ।
छत्तीसगढ़ में अनेक लोक गीत प्रचलित हैं जैसे- भोजली गीत, जँवारा गीत, जस गीत, फाग गीत, लोरी गीत, बिहाव गीत। उन्हीं में से एक सुआ गीत भी है। यह छत्तीसगढ़ की गोंड समुदाय द्वारा गाया जाने वाला एक पारंपरिक लोक गीत और नृत्य है। सुआ एक ऐसा पक्षी है जो रटी हुई बात को बोलता है इसीलिए सुआ को स्त्रियाँ अपने मन की बात बताती हैं, इस विश्वास के साथ कि वह उनके मन की बात को उनके प्रिय तक जरूर पहुँचायेगा जो कमाने खाने के लिए घर से दूर चला गया है। वह अपने मन की वेदना को गीतों के माध्यम से सुआ को सुनाती है इसीलिए सुआ गीत को वियोग गीत कहा गया है जो बहुत ही मार्मिक होते हैं। सुआ गीत हमेशा एक ही बोल से शुरू होता है जिसे मुखड़ा कहते हैं-
‘ तरी हरी नहा ना मोर नहा ना रे सुअना। ‘
इसके बाद अंतरा की दो पंक्तियों को स्त्रियाँ गाती हैं। जैसे-
तिरिया जनम झनि देय।
तिरिया जनम मोर गऊ के बरोबर,
रे सुअना,
तिरिया जनम झनि देय।
इसका अर्थ है कि वह सुआ को सुनाते हुए भगवान से विनती कर रही है कि अगले जन्म मुझे स्त्री के रूप में पैदा मत करना क्योंकि स्त्रियों का जीवन गाय के समान अत्यन्त कष्टप्रद होता है। जो अपना सब कुछ न्यौछावर करने के बाद भी कुछ नहीं पाती। गीत की अंतरा की दो लाइनों के बाद मुखड़ा को पुनः दोहराया जाता है। गीत की गति तालियों के साथ आगे बढ़ती रहती है। इसमें कोई बाद्य यंत्र का प्रयोग नहीं किया जाता बल्कि तालियाँ ही वाद्य यंत्र का काम करती है जो नृत्य करने वाली महिलाओं द्वारा एक लय में बजाया जाता है। धान से भरी टोकरी में मिट्टी या लकड़ी से बने सुआ को साफ कपड़े का बिछौना बनाकर और धान की नई बालियों के गुच्छों से सजाकर रखा जाता है। फिर स्त्रियाँ दो समूह बनाकर टोकरी में रखे सुआ के दोनों ओर आमन-सामने गोलाकार आकृति में खड़े होकर ताली बजाकर गीत गाते हुए सुआ की परिक्रमा करते हुए नृत्य करती हैं। पहला दल खड़े होकर तो दूसरा दल झुककर फुदकते हुए ताली बजाकर पैर को थिरकाते और गीत गाते हुए सुआ को देखते हुए वृताकार परिक्रमा करते हैं। बिना वाद्य यंत्र के गीत और नृत्य का अद्भूत समन्वय मन को मोह लेता है। आधुनिक काल में सुआ गीत ग्रामीण अंचलों में अत्यन्त लोकप्रिय है और अनेक समुदाय की युवा स्त्रियाँ इसमें भाग लेती हैं। अब यह केवल स्त्रियों की वेदना का गीत नहीं रह गया है बल्कि कई प्रकार के सुआ गीत गाये जाते हैं और लिखे जा रहे हैं। जैसे- वंदना गीत, संदेश गीत, प्रणय गीत, पौराणिक कथा के जुड़े सुआ गीत, प्रकृति प्रेम के सुआ गीत, सुराज के सुआ गीत, विसर्जन गीत, दैनिक जनजीवन से जुड़े सुआ गीत, कथा शैली के सुआ गीत आदि। पौराणिक गाथाओं में भगवान राम के बनवास के समय सीता माता कुछ समय तक पंचवटी में रही हैं। सीता माता स्नान करने के लिए सरोवर जाती हैं तब कवयित्री वसन्ती वर्मा ने अपने सुआ गीत में उस अलौकिक दृश्य को प्रश्नोत्तर शैली में बड़े सुंदर ढंग से लिखा है कि उन्हें स्नान करते हुए चर-अचर जगत में देव, असुर मनुष्य या कोई भी प्राणी नंगी आँखों से नहीं देख पाता!
‘ तरी हरी नहा ना मोर नहा ना रे सुअना। ‘
कइसे दिखय सीता माता, मोर सुआ रे ?
सीता माता करय असनांद!
उत्ती के सुरुज जइसन बरत हावय माता, मोर सुआ रे ….
जेमा देखि न जाय शरीर।
ना रे सुअना, जेमा देखि न जाय शरीर।
कउने देखत हे, फेर कउने तकत हे?
मोर सुआ रे ,सीता माता करय असनांद।
ना रे सुअना, सीता माता करय असनांद।
न देव देखि पायें, नई देखें चराचर।
मोर सुआ रे, माता के देह अंजोर।
ना रे सुअना, माता के देह अंजोर।
तरिया के पानी, मोर हाले डोले सुवा रे।
जेमा कोन फूल, फूलि-फूलि जाय?
ना रे सुअना, कोन फूल, फूलि-फूलि जाय?
तरिया के पानी, मोर हाले डोले सुआ रे।
जेमा खोखमा के फूल फूलि जाय।
ना रे सुअना, खोखमा के फूल फूलि जाय।
खोखमा के फूले, तरिया मा काय देखे?
मोर सुआ रे,जेमा कउने ला देख मुस्काये?
ना रे सुअना, जेमा कउने ला देख मुस्काये?
खोखमा के फूले फूलि, देखे सीता माता।
मोर सुआ रे, खोखमा के फूले मुस्काये।
ना रे सुअना, खोखमा के फूले मुस्काय।
खोखमा फूले हाँसत, देखे सीता माता।
मोर सुआ रे, सीता माता काबर मुस्काये?
ना रे सुअना, सीता माता काबर मुस्काये?
खोखमा के फूले सबो, फूलगे सरोवर।
सीता माता देख मुस्काये, ना रे सुअना,
सीता माता देख मुस्काये।
इस सुआ गीत का भाव यह है कि सीता माता सरोवर में स्नान करने जाती हैं तो उनके शरीर को देव, असुर या चराचर जगत का कोई भी प्राणी नहीं देख पाता क्योंकि माता का शरीर उगते सूरज की तरह प्रकाशवान है और उन्हें वहाँ उगते सूरज के ही दर्शन होते हैं न कि माता का शरीर!
….. परन्तु खोखमा के फूल पानी के हिलने-डुलने और सीता माता के शरीर के ताप की गर्मी से खिल उठते हैं और सीता माता को स्नान करते देख मुस्काने लगते हैं। सीता माता भी फूलों को खिलते देखकर मुस्काने लगती है।
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लेखक:
डाॅ विनोद कुमार वर्मा
व्याकरणविद्,कहानीकार, समीक्षक
( लाला जगदलपुरी साहित्य पुरस्कार 2025- राज्य अलंकरण से विभूषित साहित्यकार )
बिलासपुर, 12 नवंबर 2025
संदर्भ ग्रंथ-
वसन्ती वर्मा कृत काव्य संग्रह ‘ मउरे मोर आमा के डारा ‘ ( 2015) ; पृ. क्र.- 36-38




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