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स्‍वतंत्रता दिवस पर काव्‍यांजलि -रमेश चौहान

स्‍वतंत्रता दिवस पर  काव्‍यांजलि -रमेश चौहान

स्‍वतंत्रता दिवस पर काव्‍यांजलि

-रमेश चौहान

देश के आजादी के 75 वें वर्षगाठ पर आत्‍मचिंतन आवश्‍यक है । इन 75 वर्षो में हमने क्‍या खोया? क्‍या पाया? अपने कामों का सिंहावलोकन आवश्‍यक है । स्‍वतंत्रा दिवस में ‘स्‍व’ की विशेष महत्‍ता है । आजादी के अपना कितना है? और पराया कितना? विकास का मापदण्‍ड केवल भौतिक विकास नहीं होता । अपने विकास में वैचारिक सुगढ़ता का भी महत्‍व है । इस अवसर पर प्रस्‍तुत है कुछ काव्‍यात्‍मक चिंतन-

स्‍वतंत्रता दिवस पर काव्‍यांजलि स्‍वतंत्रता दिवस पर कविताएं

स्‍वतंत्रता दिवस पर  काव्‍यांजलि -रमेश चौहान
स्‍वतंत्रता दिवस पर काव्‍यांजलि -रमेश चौहान

आजादी रण शेष है

दोहावली-

आजादी रण शेष है, हैं हम अभी गुलाम ।
आंग्ल मुगल के सोच से, करे प्रशासन काम ।।

मुगलों की भाषा लिखे, पटवारी तहसील ।
आंग्लों की भाषा रटे, अफसर सब तफसील ।।

लोकतंत्र में देश का, अपना क्या है काम ।
भाषा अरू ये कायदे, सभी शत्रु के नाम ।।

ना अपनी भाषा लिये, ना ही अपनी सोच ।
आक्रांताओं के जुठन, रखे यथा आलोच ।।

लाओं क्रांति विचार में, बनकर तुम फौलाद ।
निज चिंतन संस्कार ही, करे हमें आजाद ।

सार छंद में सार बातें-

आजादी रण शेष अभी है, देखो नयन उघारे ।
वैचारिक परतंत्र अभी हैं, इस पर कौन विचारे ।।

अंग्रेजी का हंटर अब तक, बारबार फुँफकारे ।
अपनी भाषा दबी हुई है, इसको कौन उबारे ।।

काँट-छाँट कर इस धरती को, दिये हमें आजादी ।
छद्म धर्मनिरपेक्ष हाथ रख, किये मात्र बर्बादी ।।

एक देश में एक रहें हम, एक धर्म अरु भाषा ।
राष्ट्रवाद का धर्म गढ़े अब, राष्ट्रवाद की भाषा ।।

धर्म व्यक्ति का अपना होवे, जात-पात भी अपना ।
देश मात्र का एक धर्म हो, ऐसा हो अब सपना ।।

स्‍वतंत्रता सेनानियों को नमन (कुण्‍डलियां)-

आजादी पर हैं किये, जो जीवन बलिदान ।
मातृभूमि के श्री चरण, भेट किये निज प्राण ।।
भेट किये निज प्राण, राष्ट्र सुत आगमजानी ।
राजगुरू सुखदेव, भगत जैसे बलिदानी ।
जिसके कारण देश, लगे हमको अहलादी ।
उनको कोटि प्रणाम, हमें दी जो आजादी ।।

नवगीत-

कुछ समझ नहीं पाता-

मैं गदहा घोंचू हॅूं
कुछ समझ नही पाता

मैं भारत को आजाद समझता
वे आजादी के लगाते नारे
जिसे मैं बुद्धजीवी कहता
उनसे वे निभाते भाईचारे

अपने वतन को जो गाली देता
राष्ट्र भक्त बन जाता

मैं धरती का सेवक ठहरा
वे कालेज के बच्चे
मेरी सोच सीधी-सादी
वो तो ज्ञानी सच्चे

माँ-बाप को घाव देने वाला
श्रवण कुमार कहलाता

मैं कश्मीर का निष्कासित पंड़ित
वे कश्मीर के करिंदे
मेरे आँसू झर-झर झरते
पोंछ सके न परिंदे

जो आता पास मेरे
सम्प्रदायिक हो जाता

मैं लोकतंत्र बिछा चौसर
वे शकुनी के फेके पासे
दिल्ली की गद्दी युधिष्ठिर
फस गये उसके झांसे

धृतराष्ट्र का राजमोह
दुर्योधन को ही भाता

इतिहास में दबे पड़े हैं-

इतिहास में दबे पड़े हैं
काले हीरे मोती

अखण्ड़ भारत का खण्डित होना
किया जिसने स्वीकार
महत्वकांक्षा के ढोल पीट कर
करते रहे प्रचार

आजादी के हम जनक हैं
सत्ता हमारी बापोती

धर्मनिरपेक्षता को संविधान का
जब गढ़ा गया था प्राण
बड़े वस्त्र को काट-काट कर
क्यों बुना फिर परिधान

पैजामा तो हरपल साथ रहा पर
उपेक्षित रह गया धोती

जात-पात, भाषा मजहब में
फहराया गया था तिरंगा
क्यों कर देष में होता रहा
फिर अबतक मजहबी दंगा

वोट बैंक के कलम लिये
करते रह गये लीपा-पोती

आरक्षण अनुदान समता की सीढ़ी
बना गया एक हथियार
दीन-हीनों के हिस्से के दाने
खाते रह गये होशियार

भूल सफलता की कुंजी है
करें स्वीकार चुनौती

-रमेश चौहान

शोध आलेख: आधुनिक हिन्दी साहित्य में राष्ट्र भक्ति-तुलसी देवी तिवारी

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