त्रेता युग में रचा गया राम-रावण युद्ध भारतीय इतिहास की उस पहली महान कथा का रूप ले चुका है, जिसमें धर्म और अधर्म के बीच की रेखा स्पष्ट खींच दी गई। यह केवल दो राजाओं की लड़ाई नहीं थी; यह एक नारी की मर्यादा, एक पति के धर्म और एक सम्राट के कर्तव्य की रक्षा के लिए लड़ा गया युद्ध था। रावण ने जानबूझकर माता सीता का हरण किया। यह अपहरण नहीं, बल्कि संपूर्ण आर्यावर्त के सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों पर हमला था। युद्ध अनिवार्य था, अन्यथा यह कायरता का संदेश देता। फिर भी, भगवान राम ने पहले संधि प्रस्ताव भेजकर युद्ध की अनिवार्यता पर एक बार पुनर्विचार किया — परंतु एक अहंकारी और दुराचारी शासक, जैसे रावण, को शांति स्वीकार्य नहीं थी। परिणाम वही हुआ, जो होना था — विनाश, परंतु अधर्म का अंत।
द्वापर युग में भी इतिहास ने स्वयं को दोहराया। कुरुक्षेत्र का मैदान केवल एक रणभूमि नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म के बीच न्याय का निर्णायक मंच था। यह युद्ध सत्ता या साम्राज्य के लिए नहीं, बल्कि एक विधवा और उसके पुत्रों के हक़ की रक्षा के लिए लड़ा गया था। प्रयास तो हुए — श्रीकृष्ण स्वयं शांति प्रस्ताव लेकर हस्तिनापुर पहुँचे। लेकिन जब सत्ता और बल का घमंड आँखों में अंधकार भर देता है, तब तर्क, नीति और विनय सब निष्प्रभ हो जाते हैं। और फिर वही हुआ — घमंड चूर हुआ, रक्त बहा, और सभ्यता एक नए युग में प्रविष्ट हुई।
आज का युग भले ही विज्ञान और तकनीकी में अग्रणी हो गया हो, परंतु क्या हमारी मानसिकता ने कोई प्रगति की है? आज भी मनुष्य, हथियार, टेक्नोलॉजी और वैश्विक गठजोड़ों के बल पर युद्ध छेड़े जा रहे हैं। यह युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं हैं — यह आर्थिक, वैचारिक, और साइबर सीमाओं तक फैल चुके हैं। फिर चाहे वह वास्तविक युद्ध हो या छद्म युद्ध, मानवता की कीमत चुकानी ही पड़ती है।
प्राचीन काल में राजा स्वयं युद्ध में भाग लेते थे — वे अपने सैनिकों के साथ खड़े होते थे, रणभूमि में मरते या मारते थे। आज, शासक युद्ध का निर्णय तो लेते हैं, पर रणभूमि में उतरता है केवल एक सैनिक — जो या तो शहीद होता है, या युद्धबंदी बनकर अपमानित। न वह युद्ध का कारण जानता है, न उद्देश्य।
1962 में चीन ने अचानक बिना किसी पूर्व संकेत के भारत पर आक्रमण कर लिया और करीब 14,000 वर्ग मील भूमि हड़प ली। वह भूभाग आज भी हमारे नक्शों में तो है, पर हमारे अधिकार में नहीं। और यह सब हुआ बिना किसी औचित्य के। क्या यही राजनीति है? क्या यही कूटनीति है? नहीं तो आज हम भी बिना पासपोर्ट और वीज़ा के मानसरोवर की यात्रा कर पाते — वह भूमि जो हमारे ऋषियों की साधना स्थली रही है।
फिर पाकिस्तान आया — एक राष्ट्र जो धर्म के आधार पर बना, और जिसने बार-बार भारत पर आक्रमण किया। 1971 का युद्ध इसका चरम था, जिसमें 90,000 से अधिक सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया। इतिहास में इतनी बड़ी संख्या में आत्मसमर्पण की मिसालें दुर्लभ हैं। क्या वे अपने देश लौट पाए? नहीं! यह युद्ध नहीं, एक त्रासदी थी — उन सैनिकों के लिए, जिनकी न लड़ने की मर्जी थी, न हारने की इच्छा, पर युद्ध थोप दिया गया।
बर्नार्ड शॉ ने कहा था, “Nine soldiers out of ten are fools.” — एक तल्ख़ टिप्पणी, पर कहीं न कहीं हमारे समय के यथार्थ को उद्घाटित करती हुई। आज का सैनिक न युद्ध का कारण समझता है, न उसका उद्देश्य — वह केवल आदेश का पालन करता है, और जब परिस्थितियाँ विपरीत होती हैं, तो उसे आत्मसमर्पण करना पड़ता है।
प्रश्न यह है — कब तक? कब तक हम युद्ध को ही समाधान मानते रहेंगे? क्या मानव सभ्यता इतनी विकसित नहीं हुई कि वह वार्ता, समझौते और संयम को प्राथमिकता दे? क्या हर देश का नेतृत्व केवल सत्ता, भूभाग, और वर्चस्व की लालसा में मानवता को दांव पर लगाता रहेगा?
मेरे मन में यह प्रश्न यक्ष प्रश्न की तरह बार-बार उठता है — क्या कभी शांति आएगी? क्या हम कभी युद्धरहित विश्व की कल्पना कर पाएंगे? या फिर माया-जाल में फंसी यह दुनिया यूं ही अनवरत युद्धों में उलझी रहेगी?
-डॉ. अर्जुन दुबे
अंग्रेजी के सेवानिवृत्त प्रोफेसर,
मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय,
गोरखपुर (यू.पी.) 273010
भारत
फोन. 9450886113





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