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यायावर मन अकुलाया-15 (यात्रा संस्‍मरण)-तुलसी देवी तिवारी

यायावर मन अकुलाया-15 (यात्रा संस्‍मरण)-तुलसी देवी तिवारी

यायावर मन अकुलाया (द्वारिकाधीश की यात्रा)

भाग-15 अचलगढ़ की यात्रा

-तुलसी देवी तिवारी

अचलगढ़ की यात्रा
अचलगढ़ की यात्रा

प्राचीन ऐतिहासिक स्थल अचलगढ –

आबू से लगभग ग्यारह किलो मीटर दूर स्थित प्राचीन ऐतिहासिक स्थल है अचलगढ है़, जहाँ जैन व हिन्दू मंदिरों के साथ ही कई और दर्शनीय स्थल भी हैं, हमारी बस अब अचल गढ़ जाकर रुकी। हम लोग सबसे पहले अचलेश्वर महादेव के दर्शन करने पहुँचे। ई. सं. 813 में बना यह मंदिर एक शिवालय है। यहाँ शिवलिंग की जगह शंकर भगवान् के अंगूठे की पूजा होती है। कहते हैं कि काशी में जब विश्वनाथ ने अपना पैर पसारा तब उनका अंगूठा यहाँ तक आ पहुँचा। उसी के दबाव से एक बहूत बड़ा गड्ढा बन गया जिसकी गहराई पाताल तक है , इसे ब्रह्म खड्डा कहते हैं। और यहाँ इसी की पूजा होती है। हमने मंदिर के अंदर जाकर जगत् पिता के चरणों के प्रतीक गड्ढे को प्रणाम किया। उनके लिए तो सब कुछ संभव है। संसार की उत्पत्ति पालन और लय जिनके भू्रभंग से होता है उन सर्वेश्वर की हम पर कृपा बनी रहे और क्या चाहिए। मुख्य मंदिर के सामने ही भगवान् शिव के वाहन नंदी की पीतल की विशाल प्रतिमा है। इस पर अहमदाबाद के बादशाह मुहम्मद बेगड़ा के धन के लोभ में किये गये प्रहारों के चिन्ह स्पष्ट दिखाई दे रहे थे।

मंदाकिनी कुंड

अचलगढ़ का किला शिवार्चन कर हम लोग बाहर आये, यहाँ पास में ही मंदाकिनी कुंड है जहाँ तीन पाड़ों की मूर्तियाँ बनी हुई है जो एक ही तीर से बिधे हुए हैं। यह अचलेश्वर महादेव के मंदिर के उत्तर में स्थित ह, इसकी लम्बाई 900 फीट और चौड़ाई 240 फीट है। इसे मंदाकिनी कुंड कहते हैं। इसके उत्तर में परमार वंशी वीर राजा आदिपाल व तीन पाड़ों की पत्थर की मूर्तियाँ बनी हुई हैं एक जनश्रुति के अनुसार मंदाकिनी कुंड में आस-पास के आश्रम वासियों के यज्ञादि के लिए घी भरा रहता था, इसे आस-पास के गृहस्थ लाकर भरते थे, एक समय तीन राक्षस पाड़ों (भैंसा) के रूप में आकर चुरा ले जाते थे। पता चलने पर तपस्वियों की आज्ञानुसार महाराज आदिपाल ने एक ही तीर से तीनों को मार डाला और लोगों को सबक मिले इसलिए इनकी मूर्तियाँ एक साथ यहाँ लगा दी गईं। हमें भी शिक्षा मिली कि छद्म अधिक समय तक छिपा नहीं रह सकता।

भृगुऋषि का अश्रम –

मंदाकिनी कुंड से लगभग डेढ़ किलो मीटर पर ही भृगुऋषि का अश्रम है। वहाँ हमने आश्रम में महादेव जी का मंदिर ,गौमुखी कुंड, ब्राह्णों की मूर्तियाँ आदि देखा, यहाँ अब भी साधु- संतों के निवास की व्यवस्था है। कुछ साधु आते -जाते दिखाई दिये। पास में ही एक पक्के भवन में जो अत्यंत मनोहारी हैं जो पुष्प लताओं से आच्छादित है जिसे भर्तृहरि की गुफा कहते हैं । यहाँ भी साधु संत निवास करते हैं ।

रेवती कुंड –

मंदाकिनी कुंड के निकट ही एक और कुंड है जिसमें वर्ष भर स्वच्छ जल भरा रहता है। इसे रेवती कुंड कहा जाता है। यहीं पर सिरोही के राजा मानसिंह की समाधि बनी हैं, एक मूर्ति सारणेस्वर महादेव की आराधना करते हुए भी बनाई गई है। राजा मानसिह की समाधी के पास ही उनके साथ चितारोहण करने वाली उनकी पाँच पत्नियों की समाधियाँ व मूर्तियाँ स्थापित हैं।

अचलगढ़ का इतिहास-

अचलेश्वर महादेव के दक्षिण से एक रास्ता सुमुद्र तल से लगभग 4000 फुट की ऊँचाई पर स्थित अचलगढ़ के किले तक जाता है। इतिहासकार अलेक्जेंडर के अनुसार अब तक सर्वाधिक प्रसिद्ध किलों में अचलगढ़ का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है। इसका निर्माण आबू के परमार राजाओं ने संवत 900 के लगभग बनवाया गया था। यहाँ तक मार्ग सुलभ होने के कारण हमे पहुँचने में कोई दिक्कत नहीं हुई ।

कपूर सागर व लक्ष्मी नारायण जी का मंदिर हैं –

हम लोग किले के प्रवेशद्वार गणेश पोल से प्रविष्ट हुए। किले के बाहर नारियल के वृक्षों ने हमारा स्वागत किया। अंदर भी प्रकृति का सुंदर रूप हमें मोहित कर रहा था। दूसरे द्वार हनुमान् पोल से चढाई प्रारंभ हुई ऊपर जाने के लिए सीढ़ियाँ हैं, यहीं पर कपूर सागर व लक्ष्मी नारायण जी का मंदिर हैं। हमने संसार के पालन कर्त्ता दोनों देवों को प्रणाम किया। अस्वस्थ जन प्रथम द्वार पर ही बैठा दिये गये, बाकी लोग ऊपर चढने लगे। सीढ़ि़याँ चढ़ने पर चंपापोल व भैरवपोल मिले। यहाँ से एक रास्ता पुराने किले की ओर और एक जैन मंदिर की ओर गया है। पहले हम लोग किले की ओर ही गये। यहाँ रहने के लिए कई कक्ष बने हुए हैंं, इसके साथ ही सावन-भादो कुंड भी देखने योग्य है। मेवाड़ के महाराणा कुंभा ने इसका पुर्निर्माण़ कराया थां । किले से लौट कर हम लोग भैरव पोल आये , फिर यहाँ से जैन मंदिरों के दर्शन करने लगे।

चौमुखा मंदिर –

पहले हम लोग चौमुखा मंदिर गये । यहाँ हमने मंदिर प्रवेश के नियमों का पालन किया। मुख्य वेदी के चारों ओर मुँह वाली प्रतिमाएं हैं , इसीलिए इसे चौमुखा मंदिर कहते हैं। यह प्राचीन मंदिर दो मंजिला है। इसमें लगभग 1444 मन की 14 जैन तीर्थंकरों की पंचधातु से बनी विशाल प्रतिमाएं विराजित हैं । इनकी कारीगरी अद्वितीय है। मंदिर के मुख्य मंडप में जैन तीर्थंकरों के जीवन चरित व प्रमुख जैन तीर्थों के दृश्य सोने से चित्रित किये गये हैं । ऊँची पहाड़ी पर स्थित होने के कारण यहाँ से आबू पर्वत के आस-पास के गाँवों का दृश्य बहुत सुंदर दिखाई दे रहा था।

आदिश्वर भगवान् का मंदिर

चौमुखा मंदिर के पास ही अहमदाबाद के सेठ श्री शांतिनाथ दोशी द्वारा बनवाये गये आदिश्वर भगवान् के मंदिर में जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभ देव जी या आदिदेव जी की भव्य मूर्तियाँ स्थापित हैं। इन पर वि.सं. 1721 का लेख है। हमने देवी सरस्वती के साथ ही अन्य मूर्तियाँ भी देखी। यहाँ मूर्तियों के साथ ही एक पत्थर की मशीन भी है।

श्री कुंथनाथ भगवान् का मंदिर –

वहाँ से निकल कर हम लोग भगवान् श्री कुंथनाथ जी के मंदिर आये—वि.सं. 1527 में स्थापित श्री कुंथनाथ भगवान् के मंदिर में धातु की अनेक मूर्तियाँ हैं । मंदिर में स्थापित 174 मूर्तियाँ अलग -अलग समय की हैं यहाँ पीतल के तीन घोड़ें पर ढाल, तलवार भाले अदि से सुसज्जित सवार बहुत ही सुंदर दिखाई दिये।

श्री शांतिनाथ जी का मंदिर अचलगढ़ की तलहटी में है , इसे कुमारपाल के नाम से भी जाना जाता है। सड़क से दूर एक छोटी सी टेकरी पर स्थित है। इसमें श्री शांतिनाथ भगवान् की सजीव मूर्ति विराज रही है हमने श्रद्धा पूर्वक उन्हें प्रणाम किया।

बस से आबू रोड जाना

अब धूप नरम पड़ गई थी, हम लोगों को पाँच बजे की बस से आबू रोड जाना था इसलिए बस में बैठ कर वीना होटल आ गये । यहाँ हमें तीन बजे चेक आउट करना था, उस समय शायद हम होटल न आ पाते इसलिए होटल वाले से कह कर काउंटर के बगल में स्थित एक छोटे से खाली कमरे में हमने अपना सामान जमा कर रख दिया था। पहुँच कर जल्दी-जल्दी अपना-अपना सामान् निकाल ही रहे थे कि हमारी बस आ गई जो होटल के सामने ही कुछ मिनट रुक कर सवारी भरती है, हम लोग फुर्ती से उसमें चढ़े, मैंने देवकी दीदी के पास जगह पाई, मेरी बगल में प्रभा दीदी और आस-पास ही सारे साथी । बस अपने समय से आगे बढ़ने लगी। मैने बड़े प्यार से आबू पर्वत को एक बार देखा और अपनी थकी पलके मूँद ली। आबू रोड स्टेशन तक पहुँचते-पहुँचते आँखों के सामने स्याह अंधेरा फैल चुका था। पेड़ों के साये रास्ते की गाड़ियों के उजाले में छेद कर पलों के लिए झिलमिला कर दूर हो जाते, अंधेरे में वे हिलते डुलते प्रेत से जान पड़ते थे।

आबू रोड रेलवे स्टेशन

आबू रोड रेलवे स्टेशन एक बड़ा स्टेशन हैं । यहाँ आकर हम लोग एक खाली जगह देख कर बैठे। बत्तियों की जगमगाहट में सब कुछ साफ दिखाई दे रहा था। सामान बेचने वाले ,आ जा रहे थे। यात्रियों का आना-जाना लगा हुआ था। हमारे साथी तिवारी जी और शर्मा जी स्टेशन के पास ही शाकाहारी भोजनालय का पता लगा कर भोजन कर आये थे अतः उन्हे देवकी दीदी और वेदमती भाभी के पास बैठा कर हम लोग खाना खा आये। भोजन में रोटी दाल और आलू की सब्जी थी , हम लोगों ने दोपहर में भोजन नहीं किया था इसलिए भी बहुत अच्छा लगा सब कुछ। स्टेशन आकर हम चादर बिछा कर आराम से बैठ गये , जो लोग रह गये थे उनके लिए हम लोग पार्सल बंधवा कर ले आये थे। हेमलता ने भाभी को भोजन कराया। देवकी दीदी ने भी भोजन किया हम लोग कुछ आप बीती कुछ जग बीती में लगे थे। हमारी गाड़ी 11 बजे यहाँ से छूटने वाली थी थोड़ा समय और बचा था उसके आने में ।

-तुलसी देवी तिवारी

शेष अगले भाग में-

भाग-16 अहमदाबाद यात्रा

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