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जरथुश्त्र: ईरान के महान् पैगम्बर और मज़द-उपासना के प्रवर्तक

जरथुश्त्र: ईरान के महान् पैगम्बर और मज़द-उपासना के प्रवर्तक

इतिहास में ऐसे कई महापुरुष हुए हैं जिनकी शिक्षाएँ समय की सीमाओं को पार कर हमेशा जीवित रहती हैं। भारत में जैसे बुद्ध और महावीर ने जीवन का मार्ग दिखाया, वैसे ही प्राचीन ईरान की धरती पर जरथुश्त्र (Zarathustra या Zoroaster) प्रकट हुए। उन्होंने न केवल एक धर्म की नींव रखी, बल्कि नैतिकता और मानवता का ऐसा संदेश दिया जो आज भी प्रासंगिक है।

मानव इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हुए हैं जिन्होंने समय की सीमाओं को पार कर पूरी सभ्यता की दिशा बदल दी। प्राचीन ईरान के पैगम्बर जरथुश्त्र (Zarathustra) उन्हीं में से एक थे। उनका जीवन रहस्यों, दिव्यता और गहन आध्यात्मिक अनुभवों से भरा रहा।

उनकी शिक्षाएँ केवल धर्म तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि जीवन जीने की कला, नैतिकता और मानवता का अमर संदेश भी देती हैं।

जन्म और प्रारम्भिक जीवन

जरथुश्त्र के जन्म का सही समय विवादित है—कुछ विद्वान उन्हें 6000 ईसा पूर्व का मानते हैं, तो कुछ सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व का। उनका जन्म ईरान के अजरबैजान क्षेत्र, तख़्त-ए-सुलेमान में हुआ। पिता का नाम पुरुशास्पो और माता का नाम दुखदहवो था।

उनके जन्म के साथ कई किंवदंतियाँ जुड़ी हैं। कहा जाता है कि उनके जन्म के समय प्रकृति उल्लासित हो उठी—नदियाँ कल-कल करने लगीं, फूल खिले और वृक्षों में हरियाली छा गई। पर दुष्टात्माएँ भय से काँप उठीं। और सबसे अद्भुत घटना यह रही कि शिशु जरथुश्त्र ने रोने के बजाय हँसते हुए संसार में कदम रखा।

बचपन से ही वे साधारण बच्चों की तरह नहीं थे। वे विद्वानों के साथ चर्चा करते, धर्म-विरोधी कर्मों की आलोचना करते और ज्ञान की ओर आकर्षित रहते। कई बार शत्रुओं ने उन्हें मारने की कोशिश की, लेकिन हर बार ईश्वर की कृपा से वे बच गए।

साधना और दिव्य अनुभव

सोलह वर्ष की आयु में उनमें वैराग्य का बीज अंकुरित हुआ। सांसारिक सुख-दुख ने उन्हें कभी आकर्षित नहीं किया। वे सभी प्राणियों के प्रति दयालु थे और करुणा से भरे हुए थे।

बीस वर्ष की उम्र में उन्होंने गृह-त्याग कर तपस्वी जीवन अपनाया। वे वनों और पर्वतों की गुफाओं में रहते, ध्यान करते और मिताहार से जीवन बिताते। उनका लक्ष्य था—सत्य की खोज और ईश्वर से मिलन।

पर्वत सबाताम पर साधना करते समय उन्हें ब्रह्माण्ड के अधिपति अहुरमज़दा का साक्षात्कार हुआ। यहीं उन्हें दिव्य अंतर्दृष्टि और सातfold ज्ञान की प्राप्ति हुई। तीस वर्ष की आयु में उन्हें पैगम्बर की उपाधि मिली।

उनके दिव्य अनुभव यहीं समाप्त नहीं हुए। उन्होंने कई महान् देवदूतों से प्रत्यक्ष संवाद किया—

  • वोहुमानाह (शुद्ध विचार का देवदूत)
  • अश वहिश्त (धर्म और पवित्र अग्नि का देवदूत)
  • स्पेन्ता अरमैथ (पृथ्वी और शालीनता का देवदूत)
  • हउरावतात और अमेरेतात (स्वास्थ्य और अमरत्व के देवदूत)

इन साक्षात्कारों से उन्हें यह अनुभूति हुई कि संसार का आधार केवल ईश्वर-भक्ति नहीं, बल्कि प्रकृति और जीव-जगत की रक्षा भी है।

संघर्ष और सफलता

जरथुश्त्र ने समाज में फैले अंधविश्वास, प्रेत-पूजा, जादू-टोना और मादक पेय ‘होम’ के दुरुपयोग का विरोध किया। लेकिन यही उनके विरोध का कारण बना। पारंपरिक पुरोहितों—कवीस और करपान—ने उनके खिलाफ षड्यंत्र रचे।

उन्होंने सम्राट विशतास्प को भी यह विश्वास दिलाया कि जरथुश्त्र जादूगर हैं। नतीजा यह हुआ कि पैगम्बर को कारागार में डाल दिया गया। लेकिन नियति ने उनका साथ दिया।

कहा जाता है कि उसी समय सम्राट का प्रिय घोड़ा गंभीर रोग से पीड़ित हो गया। जरथुश्त्र ने चमत्कार दिखाते हुए घोड़े को स्वस्थ किया और बदले में चार शर्तें रखीं—

  1. सम्राट को उनके धर्म को स्वीकारना होगा।
  2. उसका पुत्र इस्फेन्दियार इस धर्म की रक्षा करेगा।
  3. महारानी हुताओसा को दीक्षित करने की अनुमति दी जाएगी।
  4. उनके खिलाफ षड्यंत्र करने वालों को दंडित किया जाएगा।

सम्राट ने यह सब स्वीकार कर लिया। इसके बाद अहुरमज़दा के दूत प्रकट हुए और विशतास्प को उनके धर्म की सच्चाई का अनुभव हुआ। उसने जरथुश्त्र को ईरान का पैगम्बर मान लिया। राजकीय संरक्षण के बाद यह धर्म तेजी से फैला और राजधर्म बन गया।

हालाँकि इसके कारण ईरान और तूरान के बीच भयंकर युद्ध हुए। अंततः तूरान के सम्राट अर्यास्प को हराकर ईरान ने अपनी सत्ता मजबूत की।

लेकिन जीवन के अंतिम दिनों में भी जरथुश्त्र को शांति न मिली। जब वे एक मंदिर में प्रार्थना कर रहे थे, तब एक तूरानी योद्धा ने उन पर हमला कर उनकी हत्या कर दी। उस समय उनकी आयु 77 वर्ष थी। किंवदंती है कि उन्होंने हमलावर पर अपनी माला फेंकी और उससे ज्वाला निकली जिसने उसे भस्म कर दिया।

शिक्षाएँ और विरासत

जरथुश्त्र का सन्देश बेहद सरल लेकिन गहन था—

  • अच्छे विचार सोचो।
  • अच्छे शब्द बोलो।
  • अच्छे कर्म करो।

उन्होंने सिखाया कि धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं है, बल्कि एक नैतिक जीवनशैली है। करुणा, दया और ईमानदारी ही सच्चे धर्म के स्तंभ हैं।

उनकी शिक्षाएँ आज भी पारसी समुदाय के धर्मग्रंथ अवेस्ता में जीवित हैं। उन्होंने अग्नि-मंदिरों की स्थापना की, रोगियों का इलाज किया और समाज से बुरी परम्पराओं को दूर करने का कार्य किया।

निष्कर्ष

जरथुश्त्र का जीवन हमें यह संदेश देता है कि सच्चा धर्म कभी विभाजन नहीं करता, बल्कि करुणा और सत्य के मार्ग पर सबको एकजुट करता है। उनका जीवन संघर्षों से भरा था, लेकिन उन्होंने कभी सत्य और धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा।

आज भी जरथुश्त्र की वाणी हमें यही प्रेरणा देती है—
👉 धर्मपरायणों से प्रेम करो, दुखियों पर दया करो और नैतिक जीवन जियो।

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